सबकुछ मजदूर संकट में बदल गया

कहां तो भारत को कोरोना वायरस से लड़ना था और कहां अब सारी लड़ाई मजदूरों के संकट को दूर करने में बदल गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भले कोरोना वायरस के बारे में एलर्ट करने में देरी लगाई या चीन के साथ मिल कर मामले को छिपाया पर एक बात उसने बहुत सही कही थी। उसने कहा था कि कोरोना वायरस का संकट अब मानवाधिकार का संकट बनता जा रहा है। उसकी यह बात सही साबित हुई है। यह मेडिकल का संकट था, जो अब मानवाधिकार के संकट में तब्दील हो गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत न तो मेडिकल के मोर्चे पर इस लड़ाई का डट कर मुकाबला कर पा रहा है और न मानवाधिकार के मोर्चे पर लड़ाई में सफल होता दिख रहा है।

एक तरह से भारत दोनों मोर्चों पर लड़ाई हार रहा है और ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि भारत की केंद्रीय सरकार और ज्यादातर राज्यों की सरकारों ने कोरोना संकट को शुरू में गंभीरता से नहीं लिया और उस संकट से जुड़े सभी पहलुओं के बारे में विचार कर उनसे भविष्य में पैदा होने वाले संकट का अनुमान नहीं लगाया। दुनिया के अनुभव को देखने के बावजूद यह दूरदृष्टि नहीं दिखाई दी कि कोरोना से कैसे लड़ना है। ध्यान रहे भारत में जिस दिन पूरे देश में लॉकडाउन हुआ और कहा गया कि 21 दिन में कोरोना की जंग जीत ली जाएगी, उस दिन चीन के वुहान में लागू लॉकडाउन के 60 दिन पूरे हो रहे थे। यह भी नहीं सोचा गया कि जब चीन में एक शहर को संक्रमण से बचाने के लिए 60 दिन से लॉकडाउन चल रहा है तो भारत में कैसे 21 दिन में लड़ाई जीत ली जाएगी? पर बातों से लोगों को बेवकूफ बनाने की भारतीय राजनीति की गौरवशाली परंपरा के तहत उस दिन से झूठ बेचा जा रहा है।

आनन-फानन में जिस दिन एक साथ पूरी देश में लॉकडाउन लागू किया गया उस दिन अगर ठंडे दिमाग से और दूरदृष्टि के साथ सोचा जाता कि लॉकडाउन का क्या-क्या असर हो सकता है तो शायद आज जितने संकट खड़े हैं ये नहीं खड़े होते। तब सरकार खोली, चॉल, झोपड़पट्टी, कच्ची बस्तियों आदि में रहने वालों को वहां से निकलने का समय देती। उनको घर पहुंचाने का बंदोबस्त करती। तब न ऐसी अफरातफरी मचती और न इतना ज्यादा संक्रमण फैलता। इसके लिए सिर्फ एक मिसाल काफी है कि दिल्ली से बिहार लौट रहे मजदूरों में से 26 फीसदी संक्रमित मिल रहे हैं। अगर ये मजदूर दो महीने पहले गए होते तो उन्हें इतने संकट भी नहीं झेलने होते और न इतना संक्रमण भी नहीं होता। पूरे देश को बंद करते समय जिस तरह से आर्थिकी का भट्ठा बैठने के बारे में नहीं सोचा गया उसी तरह मजदूरों या समाज के सबसे निचले तबके के बारे में भी नहीं सोचा गया।

इसका नतीजा यह हुआ कि कोरोना वायरस की घबराहट में और कामधंधे बंद होने की चिंता में लाखों की संख्या में मजदूर अपने घर जाने के लिए चल पड़े। चूंकि सरकार इसके लिए तैयार ही नहीं थी इसलिए उसके हाथ-पांव फूल गए। मजदूरों का पलायन शुरू होने के एक महीने से ज्यादा समय के बाद सरकार ने ट्रेन और बसें आदि चलवा कर उनको घर पहुंचाना शुरू किया और उसी समय इस संकट को अवसर में बदलने काम भी शुरू कर दिया गया। इस समय समूची सरकार इस मजदूर संकट का इस्तेमाल कोरोना संकट से ध्यान हटाने के लिए कर रही है। असल में यह देश के हर नेता की समस्या है कि वह कोरोना का सामना करने की बजाय उससे ध्यान हटाने का प्रयास कर रहा है। जैसे ममता बनर्जी ने अब कहा है कि चक्रवाती तूफान अम्फान कोरोना से ज्यादा बड़ा संकट है।

बहरहाल, मजदूरों के संकट के बहाने केंद्र सरकार कोरोना वायरस के संकट से ध्यान हटा रही है। यह मैसेज दिया जा रहा है कि सरकार कितने अच्छे तरीके से मजदूरों के संकट को हल कर रही है। यह संकट उसी की अदूरदर्शी नीतियों की वजह से खड़ा हुआ है पर इसकी जवाबदेही लेने की बजाय सरकार इसका श्रेय लेने में जुटी है कि वह मजदूरों को घर पहुंचा रही है। हर दिन कोरोना वायरस के संक्रमितों की संख्या बताने की बजाय सरकार प्रेस कांफ्रेंस में बता रही है कितने प्रवासी घर पहुंचाए गए। मजेदार बात यह है कि रेल मंत्री तो बताते ही हैं कि कितनी ट्रेनें चलीं, आगे कितनी चलेंगी, किस तारीख से और कितनी ट्रेनों की बुकिंग होगी और कितने लोग घर पहुंचा दिए गए, स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी भी प्रेस कांफ्रेंस में यहीं संख्या बताते हैं कि कितने मजदूर घर पहुंचा दिए गए।

सो, कुल मिला कर सरकार ने कोरोनो वायरस के संकट को मजदूरों के पलायन के संकट में बदल दिया है। सरकार का पूरा फोकस इस पर बनवाया गया है कि कैसे मजदूरों को उनके घर पहुंचाया या कैसे उन्हें रोका जाए ताकि आर्थिकी को गति मिले। यानी कोरोना की बीमारी, उसका इलाज, उसकी टेस्टिंग, दवा, टीका, डॉक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के लिए पीपीई किट्स आदि सारी चीजें विमर्श के हाशिए में चली गई हैं और फोकस इस पर बना है कि मजदूरों की समस्या को कैसे सुलझाया जाए और कैसे देश की आर्थिकी की पहिया चलना शुरू हो। कोरोना वायरस के मामले को ढकने, छिपाने का यह मास्टरस्ट्रोक भी दूसरे मास्टरस्ट्रोक की तरह डिजास्टर साबित होने वाला है।

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