आखिर ये कैसा समाज है!

कोरना वायरस का डर लाजिमी है। लेकिन इस डर को अज्ञान भरे पूर्वाग्रह का रूप नहीं लेना चाहिए। उससे लाभ तो कोई नहीं होगा, नुकसान बहुतेरे होंगे। क्या यह हैरतअंगेज नहीं है कि कोरोना से लड़ रहे जिन डॉक्टरों और नर्सों के लिए 22 मार्च को सारे देश ने करतल ध्वनि की, अब उनके ऊपर ही मरीजों का इलाज करने का कहर टूट पड़ा है। उनके साथ सामाजिक दुर्व्यवहार हो रहा है। डॉक्टरों की परेशानी इतनी बढ़ गई कि हारकर उन्हें गृह मंत्री को पत्र लिखना पड़ा। इनमें कई ऐसे डॉक्टर हैं, जिन्हें उनके मकान मालिकों ने घर खाली करने के लिए कहा। दिल्ली स्थित एम्स के डॉक्टरों की चिट्ठी के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने एम्स रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के मुख्य सचिव से बात की। शाह ने आश्वासन दिया कि इस मामले को ‘गंभीरता’ से लिया जाएगा। इससे मामले को लेकर उन्होंने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से बात की। उन्होंने डॉक्टरों व नर्सों को तंग करने वाले मकान मालिकों पर सख्त कार्रवाई करने को कहा। ये प्रशंसनीय रुख है। मगर मुद्दा यह है कि हाउसिंग सोसायटियों के लिए यह क्यों मान रहे हैं कि डॉक्टर या अन्य स्वास्थ्य कर्मी कोरोना वायरस के वाहक हैं? ये हाल सिर्फ दिल्ली के डॉक्टरों का नहीं है।

देशभर के डॉक्टरों को इस परेशानी से दो चार होना पड़ रहा है। गुजरात के डॉक्टरों ने शिकायत की है कि उनकी हाउजिंग सोसायटियों के लोग उन्हें हिट लिस्ट में रख रहे हैं, क्योंकि कि वो सिविल अस्पताल में काम कर रहे हैं। इसके पहले ऐसी ही शिकायत एअरलाइन्स के कर्मचारियों ने जताई थी। कहा था कि उनकी सोसायटीज में उनका बहिष्कार किया जा रहा है। एअर इंडिया ने तो इस संबंध में बाकायदा दिल्ली पुलिस को शिकायत भेजी थी और अपने कर्मचारियों को सुरक्षा देने की मांग की थी।

पूर्वाग्रह और नफरत का आलम यह है कि पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को सीधे निशाना बनाया जा रहा है। वायरस चीन से फैला और शक्ल-सूरत के कारण ऐसे लोगों को चीन से जोड़ कर देखा जा रहा है। दिल्ली के मुखर्जी नगर में मणिपुर की एक छात्रा को कथित तौर पर ‘कोरोना’ कहकर उस पर थूकने का मामला सामने आ चुका है। पुलिस ने मामला दर्ज किया। तो स्थिति गंभीर है। इससे अपने समाज की बेहद बदसूरत छवि सामने आती है।

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