नीति से नहीं नीयत से सुधरेगी शिक्षा

लंबे इंतजार के बाद नई शिक्षा नीति का मसौदा सरकार ने मंजूर किया। अब इस नीति के आधार पर सरकार कानून बनाएगी और जहां जरूरी होगा वहां पुराने कानूनों को बदला जाएगा। अभी नई शिक्षा नीति सिफारिश के स्तर पर ही है, जिसे कानूनी दस्तावेज नहीं बनाया गया है इसलिए अभी से यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि अंत में यह किस रूप में सामने आएगा। यह भी अभी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि सरकार इसमें से किस सिफारिश को किस अंदाज में कानूनी रूप देगी। ऊपर से शिक्षा को भारतीय संविधान की समवर्ती सूची में रखा गया है, जिसका मतलब है कि इससे जुड़ी नीतियां बनाने में राज्य सरकारों की भी भूमिका होती है और कई राज्य सरकारों ने अभी से सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

इससे कोई असहमत नहीं हो सकता है कि भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य ये दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें सुधार सबसे ज्यादा जरूरी है। पर यह सुधार कैसे होगा? क्या सिर्फ नीति बना देने से शिक्षा में बदलाव आ जाएगा? शिक्षा में बदलाव लाने के लिए नीति से ज्यादा नीयत की जरूरत है और सबसे ज्यादा संदेह उसी को लेकर है। नीयत का बड़ा सवाल तो इसी बात को लेकर है कि, जिस नीति पर पिछले पांच साल से विचार हो रहा था और मसौदा दस्तावेज सौंपे जाने के बाद भी एक साल तक इस पर फैसला नहीं हुआ उसे एक वैश्विक महामारी के बीच स्वीकार किया गया है। सरकार की नीयत पर संदेह को सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने जिस नई शिक्षा नीति के मसौदे को मंजूर किया है उसमें चार साल के डिग्री कोर्स का प्रावधान है। इसके साथ ही मल्टीपल एक्जिट-एंट्री की बात कही गई है, जिसे बड़ी बात के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। महज पांच-छह साल पहले भाजपा ने इसी नीति का पुरजोर विरोध किया था।

इस देश में लोगों की याद्दाश्त इतनी कमजोर है कि किसी को यह बात याद नहीं है कि सात साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में चार साल के डिग्री कोर्स की सिफारिश की गई थी। तब भाजपा ने इस नीति का पुरजोर विरोध किया था और 2014 के लोकसभा चुनाव में वादा किया था कि उसकी सरकार बनी तो वह चार साल के डिग्री कोर्स को खत्म कर देगी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के थोड़े दिन बाद ही यह प्रस्ताव वापस भी हो गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के उस समय के कुलपति दिनेश सिंह ने चार साल का जो डिग्री कोर्स लागू किया था, उसमें दो साल के बाद डिप्लोमा, तीन साल के बाद डिग्री और चार साल के बाद ऑनर्स के साथ डिग्री देने का प्रावधान था। यह भी प्रावधान था कि जो छात्र चार साल में डिग्री लेंगे वे एक साल में पोस्ट ग्रेजुएट कर सकेंगे। भाजपा की जिद के कारण जून 2015 में यह प्रस्ताव वापस हुआ था और उसके ठीक पांच साल के बाद उसी नीति को हूबहू लागू किया जा रहा है। क्या इससे नीयत का सवाल नहीं पैदा होता है? जो नीति पांच-छह साल पहले बहुत खराब थी वह आज कैसे बहुत अच्छी हो गई?

नई शिक्षा नीति में कहा गया है कि शिक्षा का खर्च बढ़ाया जाएगा और सरकार जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा पर खर्च करेगी। यह बहुत अस्पष्ट सी बात है। मौजूदा सरकार के पिछले छह साल के कार्यकाल में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है, जिससे यह लगे कि सरकार शिक्षा पर खर्च बढ़ाने जा रही है। उलटे शोध पर होने वाले खर्च में और छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति के फंड में कटौती होने की खबरें हैं। एक तरफ सरकार शिक्षा पर खास कर उच्च शिक्षा और शोध पर खर्च कम कर रही है। उच्च शिक्षा के बेहतरीन केंद्र किसी न किसी बहाने सरकार या सत्तारूढ़ दल के निशाने पर रहे हैं और अब एक दिन अचानक सरकार जीडीपी का छह फीसदी खर्च करने की बात करने लगी है। इसमें एक और पेंच है। सरकार ने 10+2 के पुराने प्रावधान को बदल कर 5+3+3+4 का फॉर्मेट बनाया है। पहले पांच का मतलब है पांचवी कक्षा तक की पढ़ाई, उसमें सबसे शुरुआती पढ़ाई आंगनवाड़ी केंद्रों पर भी हो सकती है। पर यह स्पष्ट नहीं है कि आंगनबाड़ी का बजट उस कथित छह फीसदी खर्च में जुड़ेगा या नहीं। इसका पता भी कानून बनने के बाद ही चलेगा।

इसी नीति में उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वायत्त बनाने का प्रस्ताव भी है। ध्यान रहे उच्च शिक्षण संस्थाओं को स्वायत्त बनाने का प्रस्ताव काफी समय से लंबित है। दिल्ली विश्वविद्यालय सहित कई दूसरे विश्वविद्यालयों के चुनिंदा कॉलेजों को स्वायत्त बनाने का प्रस्ताव कुछ समय पहले आया था पर शिक्षकों और छात्रों के जबरदस्त विरोध की वजह से इसे रोकना पड़ा है। विरोध का कारण यह है कि स्वायत्तता के नाम पर कॉलेजों को सिर्फ फीस बढ़ाने की अनुमति मिलने वाली है। कॉलेज स्वायत्त तभी होंगे, जब वे अपना खर्च फीस के पैसे से निकालने लगेंगे। सोचें, ऐसे कॉलेजों में पढ़ाई कितनी महंगी हो जाएगी। यह असल में शिक्षा के निजीकरण और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण खत्म करने का एक परोक्ष प्रयास है। ऊपर से सरकार की मंशा पर इसलिए भी संदेह होता है क्योंकि इस नीति में यूजीसी और एआईसीटीई को खत्म करके उसकी जगह एक नई रेगुलेटरी बॉडी बनाने की बात कही गई है साथ ही यह भी कहा गया है कि शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में एक परामर्शदात्री समिति बनेगी और यह नई रेगुलेटरी बॉडी उस परामर्शदात्री समिति की सलाह से काम करेगी। इसका क्या यह मतलब नहीं हुआ कि नियंत्रण सरकार का ही रहेगा? संस्थानों को सिर्फ इस बात की स्वायत्तता मिलेगी कि वे फीस बढ़ा सकें और आरक्षण के प्रावधानों की अनदेखी कर सकें!

अगर यह नीति कानून बन जाती है तो विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की मंजूरी मिल जाएगी। जैसे इस समय निजी विश्वविद्यालय खुल रहे हैं वैसे ही विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खुल सकेंगे। सवाल है कि अगर सरकार पिछड़े, वंचित या आदिवासियों की हिस्सेदारी उच्च शिक्षा में बढ़ाना चाहती है तो वह वादा इन विश्वविद्यालयों से कैसे पूरा होगा? जो विदेशी विश्वविद्यालय खुलेंगे उनमें आरक्षण की क्या व्यवस्था होगी, गरीब और वंचितों के दाखिले का क्या प्रावधान होगा और फीस कौन तय करेगा? रिलांयस की यूनिवर्सिटी को खुलने से पहले ही भारत सरकार ने इंस्टीच्यूट ऑफ एमिनेंस का दर्जा दे दिया। अशोका यूनिवर्सिटी, शिव नाडार, जिंदल आदि के यूनिवर्सिटी खुले हैं, जिनमें लाखों रुपए की फीस है। दाखिले से लेकर नियुक्तियों तक में दलित, वंचित, आदिवासी, पिछड़ों को आगे लाने के लिए लागू किए गए एफर्मेटिव एक्शन में से कोई भी इन विश्वविद्यालयों में नहीं लागू होता है। सो, चाहे स्वायत्तता की बात हो या विदेशी संस्थानों को कैंपस खोलने की मंजूरी देने का मामला हो, इनका एक ही मकसद है शिक्षा के निजीकरण और उसके व्यावसायीकरण को ठोस शक्ल देना। मातृभाषा या स्थानीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने और छठी कक्षा से वोकेशनल कोर्स शुरू करने को लेकर भी बहस चल रही है इस पर कल विचार करेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares