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एक्जिट पोल का तमाशा!

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दुनिया भर के विकसित देशों में एक्जिट पोल असली नतीजों से पहले उसका संकेत देने के लिए होता है लेकिन भारत में पैसा कमाने, किसी खास दल के प्रति निष्ठा दिखाने, टीआरपी बढ़ाने या विशुद्ध रूप से तमाशे के लिए होता है। मीडिया समूह और सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां या तो चुनावी हवा या चर्चा के आधार पर अपने आंकड़े तैयार करती हैं या अपने वैचारिक रूझान के मुताबिक नतीजों का अनुमान जाहिर करती हैं या किसी लाभ के लिए किसी खास दल के पक्ष में अनुमान जताती हैं। एकाध गौरवशाली अपवादों को छोड़ दें तो इसमें कोई वैज्ञानिकता या वस्तुनिष्ठता या ईमानदारी नहीं होती है। यही वजह है कि भारत में ओपिनियन और एक्जिट पोल दोनों तमाशा बन कर रह गए हैं।

इस तमाशे को समझने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है। दिल्ली नगर निगम के वास्तविक नतीजों का मिलान अगर एक्जिट पोल के अनुमानों से कर लें तो सारी तस्वीर साफ हो जाएगी। लगभग सभी मीडिया समूहों और सर्वे एजेंसियों ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी की भारी भरकम जीत का अनुमान जताया था। कई एजेंसियों ने तो नगर निगम की ढाई सौ सीटों में से 170 से 190 तक सीटें आप को दी थीं लेकिन वह उससे काफी नीचे अटक गई। किसी ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर का अनुमान नहीं लगाया था। लेकिन दोनों के बीच नजदीकी मुकाबला रहा। राजनीतिक पार्टियां इस तमाशे से कैसे प्रभावित होती हैं उसकी भी मिसाल दिल्ली नगर निगम का चुनाव है। एक्जिट पोल के अनुमानों के आधार पर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता का आभार जता दिया और नतीजे आने से पहले पूरी दुनिया में पोस्टर और होर्डिंग लगा कर वादा कर दिया कि अगले पांच साल बहुत अच्छे होंगे।

ओपिनियन और एक्जिट पोल करने वाली एजेंसियों और उनका प्रसारण करने वाले मीडिया समूहों को पता है कि राजनीतिक पार्टियों को उनकी जरूरत है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण से पार्टियों को चुनावी हवा बनानी होती है तो एक्जिट पोल का इस्तेमाल किसी न किसी स्तर पर नतीजों को प्रभावित करने के लिए होता है। सो, पार्टियां अलग अलग एजेंसियों के सहारे अपने पक्ष में हवा बनवाती हैं। आमतौर पर सत्तारूढ़ दल को या सबसे ज्यादा विज्ञापन देने या पैसा खर्च करने वालों के पक्ष में ओपिनियन और एक्जिट पोल के नतीजे आते हैं। इस वजह से सर्वे करने वाली एजेंसियां बुरी तरह से गलत साबित होती हैं फिर भी उन्हें शर्म नहीं आती है। अगली बार फिर वे इसी तरह का प्रायोजित सर्वेक्षण पेश कर रहे होते हैं।

ध्यान रहे ओपिनियन और एक्जिट पोल में बहुत फर्क होता है। ओपिनियन पोल मतदान से पहले होता है और उसमें गड़बड़ी की संभावना रहती है क्योंकि कई बार मतदान करने जाते समय तक मतदाता अपना मन बदलता है। लेकिन एक्जिट पोल वोट डालने के बाद का सर्वे होता है और इसलिए यह परफेक्ट होना चाहिए। उसमें किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए और अलग अलग एजेंसियों के आंकड़ों में ज्यादा फर्क भी नहीं होना चाहिए। लेकिन न सिर्फ एक्जिट पोल पूरी तरह से गलत होते हैं, बल्कि सारी एजेंसियों के आंकड़ों में भी फर्क होता है। इससे पता चल जाता है कि किस एजेंसी का रूझान किस पार्टी की ओर है। वह रूझान किसी भी कारण से हो सकता है। मिसाल के तौर पर पिछले साल हुए पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में एक बड़े राष्ट्रवादी पत्रकार के न्यूज चैनल ने भाजपा को 192 सीट मिलने का अनुमान जताया था और कहा था कि तृणमूल कांग्रेस को 88 सीटें मिलेंगी। वास्तविक नतीजों में भाजपा 77 सीट पर रह गई और तृणमूल को 214 सीटें मिलीं। लगभग सभी चैनलों ने बंगाल में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी बनने का अनुमान जाहिर किया था। इसी तरह 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में लगभग सभी एजेंसियों ने आम आदमी पार्टी की सरकार बनने का अनुमान जताया था। इस तरह के अनेक चुनावों की मिसाल दी जा सकती है, जहां एक्जिट पोल के बिल्कुल उलट वास्तविक नतीजे आए।

असल में भारत में कभी भी ओपिनियन और एक्जिट पोल सही साबित हो ही नहीं सकते हैं। इसके तीन-चार बुनियादी कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि भारत में जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां वैचारिक रूप से ईमानदार नहीं हैं उसी तरह मतदाताओं में भी वैचारिक ईमानदारी की कमी है। किसी खास दल के लिए प्रतिबद्धता रखने वाले मतदाताओं की संख्या बहुत कम है। ज्यादातर मतदाता किसी न किसी असर में वोट डालते हैं। अंतिम समय में उनका वोट किसी भावनात्मक मुद्दे की वजह से बदल जाता है तो कभी जाति व धर्म पर बदल जाता है तो कभी किसी लालच में या दबाव में बदल जाता है। दुनिया के जिन विकसित देशों से चुनाव सर्वेक्षण का विज्ञान भारत आया है उन देशों में पार्टियों के रजिस्टर्ड मतदाता होते हैं। वे चुनाव से पहले जो बात कहते हैं वही बात चुनाव से बाद भी कहते हैं। इसलिए वहां ओपिनियन और एक्जिट पोल और वास्तविक नतीजों में ज्यादा अंतर नहीं होता है।

दूसरा कारण यह है कि भारत में सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां, उनका प्रसारण करने वाले मीडिया समूह और उनके संपादक-पत्रकार आदि किसी न किसी तरह के पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं। ज्यादातर लोग अपने काम के प्रति ईमानदार नहीं होते हैं। वे अपनी वैचारिक या राजनीतिक निष्ठा के आधार पर चुनाव पूर्व या चुनाव बाद के सर्वेक्षण के नतीजे तैयार करते हैं। तीसरा कारण यह है कि चुनाव सर्वेक्षण करना एक तरह का विज्ञान है लेकिन भारत में विज्ञान का कोई सिद्धांत अप्लाई नहीं किया जाता है। सभी मीडिया समूहों और सर्वे करने वाली एजेंसियों के पास अपने टेम्पलेट होते हैं, जिनमें आंकड़े भर लिए जाते हैं। जिसको जहां से फायदा होता दिखता है वह उसकी जीत दिखा देता है। अगर किसी को कहीं से फायदा नहीं हो रहा है तो वह हवा का रुख देख कर अपने आंकड़े तैयार कर लेता है। देश का शायद ही कोई मतदाता होगा, जिसके पास कभी सर्वे करने वाले पहुंचे होंगे। कई बार इनका आकलन सही भी होता है लेकिन वह संयोग होता है। ध्यान रहे कोई भी विज्ञान संयोगों के सहारे नहीं चलता है लेकिन अनुमान संयोगों के सहारे सही या गलत होते हैं। वहीं भारत में चुनावी सर्वेक्षणों के साथ होता है। इसलिए इस तमाशे को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। हां, मतदान समाप्त होने और नतीजे आने के बीच दो-तीन दिन का समय होता है, उस बीच मनोरंजन के लिए इसे देखा और इस पर चर्चा की जा सकती है।.

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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