फर्जी पत्रकार और उनकी हिम्मत

एक मित्र ने मुझे कुछ फर्जी पत्रकारो की गिरफ्तारी के बारे में सूचनाएं भेजी हैंऔर बताया है कि कुछ लोग पत्रकार न होते हुए भी फर्जी पत्रकार बनकर हालात का फायदा उठा रहे हैं। यह सिर्फ इन दिनों ही नहीं हो रहा है। मैंने महसूस किया है कि हमारे समाज में हमेशा ही एक वर्ग ऐसे लोगों का रहा जोकि हालात के मुताबिक उसका फायदा उठा लेते थे। कई बार समझ में नहीं आता है कि ऐसे लोगों को क्या कहा व माना जाए। हम उन्हें मौके का फायदा उठाने वाला धोखेबाज कहे या उद्यमी?

दरअसल मेरे अनुभव मिले-जुले हैं। जोकि मैंने हाल के कारनामों और पुराने अनुभवो के आधार पर बनाए हैं। हाल ही में एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे एक खबर भेजी। उसके मुताबिक महज तीसरी कक्षा तक पढ़ा हुआ एक कबाडी 2100 रुपए देकर पत्रकार बन गया और एक तथाकथित अखबार का प्रेस कार्ड हासिल कर लिया व उसे यह धंधा इतना ज्यादा पसंद आया कि वह फिर खुद प्रेस के कार्ड बेचने लगा। उसने अपने इलाके के लोगों को 260 प्रेस कार्ड बेचकर उन्हें पत्रकार बना दिया।

अब उस कथित अखबार के मालिक व इस धंधे में शामिल पांच और लोगों की तलाश जारी हैं। वें लोग आईएनएस मीडिया नाम से प्रेस कार्ड जारी कर रहे थे। लॉकडाउन के दौरान प्रेस कार्ड लेकर वे लोग पुलिस व प्रशासन पर रोब गांठते थे। दिल्ली में भी ऐसे फर्जी पत्रकारो की कमी नहीं है। वे लोग अपनी कार पर फर्जी प्रेस लिखवाकर नियम तोड़ते हुए घूमते हैं। उनके परिचय पत्र भी फर्जी संस्थान द्वारा जारी किए गए होते हैं।

जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पुलिस ने लॉकडाउन के दौरान एक फर्जी पत्रकार को पकड़ा तो उसने खुलासा किया कि वह तो महज तीसरी कक्षा तक पढ़ा हुआ है। कार पर प्रेस का कार्ड लगाकर लॉकडाउन के दौरान घूमने वाले इस कथित पत्रकार का नाम सलमान था। जब वह खुद को पत्रकार बताकर पुलिस पर रोब गांठने लगा तो पुलिस वाले उसे थाने ले गए। उसकी पैरवी करने के लिए कुछ कथित पत्रकार थाने पहुंचे व उनके फर्जी पाए जाने पर पुलिस ने सबको गिरफ्त में ले लिया। जांच-पड़ताल में पता चला कि सलमान, सतेंद्र, चंद्रभान, सुरेंद्र अमित व प्रवेश कुमार नाम के ये कथित पत्रकार लोग ही 2100 रुपए लेकर उन्हें दिल्ली क्राइम नाम अखबार का आईकार्ड प्रेस का लोगो को बेच रहे थे। उन्हें ऐसा करके 260 लोगों को यह कार्ड बेचे थे। खबर के मुताबिक इस मामले में एसएसपी अभिषेक यादव ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि इन कथित पत्रकारो में से कोई पंचर जोड़ता था तो कोई रिक्शा चलाता था व किसी की प्रेस की दुकान थी।

जब कई दशक पहले मैं एक रिपोर्टिंग के सिलसिले में आगरा गया तो मुझे वहां के तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट से मिलने उनके घर पर जाना पड़ा। जाड़े का मौसम व सुबह का समय था। उनके सरकारी लॉन में एक बुजुर्ग बैठे थे। उन्होंने मेरा परिचय पूछने के बाद घर के नौकर को आपने व मेरे लिए दो चाय व मक्खन टोस्ट लाने को कहा। मुझे लगा कि वे बुजुर्ग मजिस्ट्रेट के पिता आदि होंगे। वे जिस अधिकार के साथ आदेश दे रहे थे उससे तो यही लगता था कि वे घर के सम्मानित सदस्य हैं।

नौकर चाय ले आया और मैंने पहली चुस्की लेने के बाद अपना परिचय देने के बाद उनसे पूछा कि क्या वे मजिस्ट्रेट के पिता या कोई बुजुर्ग संबंधी हैं तो उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि आजकल पिताजी को कौन पूछता है। आजकल तो पत्रकारो का जमाना है। मैं साप्ताहिक उड़ते फरिश्ते का संपादक हूं। तभी मेरी इतनी इज्जत होती हैं। तुम्हारी खबरो का प्रबंध करवाऊं तुम तो दिल्ली की पत्रिका से संबंध रखते हो। मैं उनकी हैसियत व कारगुजारी देखकर दंग रह गया। तभी वहां तैयार होकर जिला मजिस्ट्रेट आए व उन्होंने उस संपादक को बहुत इज्जत के साथ अभिवादन करते हुए पूछा कि आमने चाय पी या नहीं। मैं संपादक का दुस्साहस देखकर दंग रह गया।

कुछ वर्ष पहले जब मैं पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था भारतीय प्रेस परिषद का सदस्य चुना गया तो मुझे बहुत गजब का अनुभव हुआ। प्रेस परिषद में अखबारों के खिलाफ शिकायतो की सुनवाई होती है। इसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश होते हैं व यह हाईकोर्ट के बराबर होती है। एक बार मैं परिषद की सुनवाई में हिस्सा ले रहा था। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति का था जिसने अपने जिले के पुलिस अधीक्षक व मजिस्ट्रेट के खिलाफ शिकायत की थी।

हमारे अध्यक्ष दक्षिण भारतीय थे व मामला गाजियाबाद का था। अब उन्होंने मुझसे सवाल पूछने को कहा। मैंने जब शिकायतकर्ता से पूछा कि वह क्या काम धंधा करते हैं तो उसने कहा कि मैं रिक्शा चलाता हूं। इसलिए ये लोग मुझे परेशान कर रहे हैं। मैंने उससे पूछा कि तुम रिक्शा चालक होकर अखबार निकालते हो तो उसने छूटते ही कहा कि संविधान में यह कहां लिखा है कि रिक्शा चालक अखबार नहीं निकाल सकता है व संपादक बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए? मैं उसकी बात सुनकर दंग रहा या व आज तक दंग ही हूं।

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