मैं गया नीरज शर्मा का चुनाव देखने!

कई दशकों की अपनी पत्रकारिता के जीवन में मैंने दसियों चुनावों में रिपोर्टिंग की है। इनमें लोकसभा के आम चुनावों से लेकर विधानसभा चुनाव व दर्जनों उप चुनाव तक शामिल थे। मैं तत्कालीन प्रधानमंत्रियों व मंत्रियों तक के साथ चुनाव कवरेज पर गया। उनकी रैलियों की रिपोर्टिंग की। जब वीपी सिंह राजीव गांधी के खिलाफ प्रचार कर रहे थे तो व्यासजी ने मुझे उनकी पहली चुनाव यात्रा से ही उनके साथ जोड़ दिया था। तब तीन पत्रकार लगातार उनके साथ चुनाव में शामिल रहे। ये थे इंडियन एक्सप्रेस की नीरजा चौधरी,, टाइम्स ऑफ इंडिया से भारत भूषण व जनसत्ता से मैं।

मैंने अनेकों बार नेताओं के साथ-साथ यात्रा करने, एकांत में उनके साथ समय बिताने के बावजूद खुद से भी किसी चुनाव या उसके उम्मीदवार की जीत-हार में रूचि नहीं ली। न ही उसके जीतने या हारने को लेकर ज्यादा रूचि ली। मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। हुआ यह कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में फरीदाबाद (एनआईटी) विधानसभा चुनाव से अपने परिचित नीरज शर्मा चुनाव लड़ रहे हैं। अतः उनका चुनाव प्रचार व उसका हाल जानने के लिए मैंने ही नहीं, बल्कि पत्नी या पूरे परिवार के मन में उत्सुकता थी। वजह यह है कि जब नीरज से मेरी दोस्ती हुई तो वह अक्सर घर आने लगे व मेरी पत्नी को बहनजी कहने लगे। मेरी पत्नी तीन भाईयो में अकेली बहन है। उनके दो छोटे भाई दिवंगत हो गए व तीसरा बड़ा भाई सिर्फ नाम का ही भाई है। अतः जब नीरज ने उन्हें बहनजी कहा तो वे उससे व उसके शिष्टाचार से बहुत प्रभावित हुई।

नीरज उनका असली भाई बन गया और परिवार में इतना घुल मिल गया कि जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह एक भाई की भूमिका निभाते हुए सपरिवार मामा की तरह बेटी के लिए भात लेकर आया। नीरज बेहद व्यवहार कुशल है। पहले उसने अपने पिता पंडित शिवचरण लाल जी शर्मा की जीत में अहम भूमिका अदा की और उनके न रहने के बाद वह उनकी सीट से चुनाव लड़ रहा है। इसे संयोग ही कहेंगे कि तमाम कोशिशों के बावजूद उसके पिता ने पहली बार चुनाव लड़ा तो कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया और वे नीरज के कहने व उसकी मेहनत से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े व तत्कालीन कांग्रेसी उम्मीदवार को हरा कर जीते। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि कांग्रेस को बहुमत के लिए छह विधायकों की जरूरत थी व उस चुनाव में छह निर्दलीय विधायक ही जीते थे। सोनिया गांधी ने बाप-बेटे को बुला कर सरकार में शामिल होने का आग्रह किया और वे हुड्डा सरकार में मंत्री बने।

मंत्री बनने के बाद भी नीरज शर्मा व पंडित शिवचरण लाल शर्मा ने फरीदाबाद (एनआईटी) की जवाहर कालोनी स्थित अपने पुराने घर को नहीं छोड़ा, जहां वे दशकों से रह रहे थे। यह एक पुनर्वास कॉलोनी जैसी है, जिसमें ज्यादातर फरीदाबाद औद्योगिक शहर की फैक्टकरियों में काम करने वाले श्रमिक रहते हैं। पूरा ही परिवार लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गया क्योंकि सुबह से ही उनके घर पर लोग अपनी समस्याओं को लेकर आ जाते थे। उसके परिवार से फरीदाबाद के पार्षद, उप मेयर से लेकर विधायक व मंत्री तक बने। उस परिवार की लोकप्रियता का पता तो मुझे तब चला जब पिछले वर्ष नीरज पिता के निधन की खबर मिलने पर मैं सुबह वहां गया तो पाया कि बाहर की गलियों से लेकर घर तक भीड़ का अंबार था।

खैर अब नीरज उनकी जगह चुनाव लड़ रहा है। इलाके में उसके पिता व उसकी तस्वीर वाले पोस्टर लगे हैं, जिन पर लिखा है कि ‘बाबा तेरे सपने अधूरे, हम सब मिल कर करेंगे पूरे’। कुछ पोस्टरों पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा की भी तस्वीर है मगर एकाध तस्वीरों में लगी पासपोर्ट साइज फोटो को छोड़ दें तो कहीं भी सोनिया व राहुल गांधी की न तो तस्वीर है और न उनका जिक्र है। न ही कांग्रेस का कोई बड़ा नेता उसके क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए आया। कांग्रेस तो वैसे भी अपने उम्मीदवारो की कोई ज्यादा आर्थिक मदद नहीं कर रही है। इस पार्टी में एक बड़े नेता ने कभी कहा था कि हम लोगों का मानना है कि जब सत्ता में रहो तो कमाओ ऐसे कि जैसे कल ही मरना है और जब पैसे खर्च करने हो तो सोचो की हमारी तीन पीढ़ियों को तीन सौ साल जीना है।

बहरहाल, नीरज अपने परिवार व मित्रों की मदद के बल पर चुनाव लड़ रहा है। फरीदाबाद गूजर बहुलता वाला इलाका है। जहां से भाजपा के सांसद कृष्णपाल गुजर ने काफी वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। पर नीरज को सबसे बड़ी खुशी यह है कि उसके खिलाफ भाजपा ने इनेलो से आए नगेंद्र भड़ाना को टिकट दिया है, जो कि पिछली बार वहां से चुनाव जीते हैं। उन्होंने इलाके में कोई काम नहीं किया जो कि इस औद्योगिक क्षेत्र की सड़कों में पड़े बड़े-बड़े गड्डे व कीचड़ देख कर पता चल जाता है।

ध्यान रहे दूसरे राज्यों की तरह हरियाणा भी जबरदस्त जाति राजनीति से प्रभावित है। यहां जहां एक वर्ग किसी प्रभावशाली जाति जैसे जाट,, गूजर, यादव आदि के साथ हो जाता है तो बाकी सब उसके खिलाफ लामबंद हो जाते हैं। भाजपा ने फरीदाबाद सहित अनेक सीटों पर दूसरे दलों से आए लोगों को टिकट दिया है, इससे भी उसके स्थानीय कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है। भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं में नाराजगी है तो प्रधानमंत्री भी बगल की सीट पर रैली करके चले गए। मनोरंजन के शौकीन स्थानीय और प्रवासी मतदाताओं को सपना चौधरी व मनोज तिवारी सरीखे चर्चित और भाजपा से जुड़े कलाकारों का इंतजार था पर वे भी प्रचार के लिए नहीं पहुंचे।

वैसे भी सत्तारूढ़ दल होने के कारण भाजपा को उसका नुकसान होना स्वाभाविक है। नीरज न केवल स्थानीय उम्मीदवार है, बल्कि अपने इलाके के हर मतदाता को उनके नाम से जानता है व नाना, दादा कहकर पुकारता है। अहम बात तो यह है कि इस चुनाव क्षेत्र में वह बड़ी ही समझदारी से काम कर रहा है न तो वह अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर बोल रहा है और न ही भाजपा के राष्ट्रीय व प्रदेश नेतृत्व के खिलाफ बोल रहा है। नीरज का प्रचार राष्ट्रीय मुद्दों की बजाय स्थानीय मुद्दों और अपने दिवंगत पिता के किए कामों पर हो रहा है। उसने नीरज शर्मा बनाम नगेंद्र भडाना का चुनाव बनाया है। अब देखना है कि अपने ऊपर थोपे गए इनेलो में रहे बाहरी उम्मीदवार की तुलना में लोग नीरज का कितना समर्थन करते हैं?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares