समर्थन मूल्य के झमेले का सत्य

बचपन में एक किस्सा सुना करते थे कि कुछ लोग बेहद बचकाना हरकते करते हैं जैसे कि अगर कोई यह कहे कि कौव्वा कान ले गया तो अपने कान को छुए बिना ही कौव्वे के पीछे दौड़ पड़ते हैं। हाल ही में जब सरकार द्वारा विवादास्पद कृषि कानून बनाए जाने व देश में फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म किए जाने की बातों पर देशव्यापी किसान आंदोलन शुरु होने की खबर पढ़ी तो यह बात याद हो आई।  किसान व तमाम दलों के नेता मांग कर रहे हैं कि सरकार कानूनन न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर किसानों की उपज खरीदने के प्रावधान को लागू रखे व यह व्यवस्था करे कि वे उसे जहां भी बेचे खरीददार को उनकी उपज को एमएसपी पर तो खरीदना ही होगा जबकि सच्चाई कुछ और ही है। यहां पर याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि सरकार ने लंबे अरसे से राज्यों में किसानों की तमाम उपज की एमएसपी (एग्रीकल्चर प्रोसेस मार्केट) द्वारा खरीदे जाने की व्यवस्था को समाप्त करते हुए कहा है कि अब भविष्य में किसान अपने उत्पादन को देश में कहीं भी किसी भी बाजार में बेच सकेंगे।

उनके उत्पादन को कहीं लाने ले जाने पर किसी तरह की पाबंदी नहीं रहेगी जबकि किसान चाहते हैं कि सरकार द्वारा एमएसपी पर अनाज खरीदे जाने की व्यवस्था जारी रहे। सच्चाई तो यह है कि वास्तव में एमएसपी 2014 के आम चुनाव के दौरान हर नागरिक के खातों में लाखों रुपए आने के जुमले से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि कानून में एमएसपी जैसी किसी चीज का कोई प्रावधान नहीं है और न ही नए कानून में इसकी कोई व्यवस्था की गई है न तो तमाम किसान को अपना उत्पाद एमएसपी पर बेचने का कोई अधिकार है और न ही कानूनन यह सरकार के इस दाम पर कृषि उपज को खरीदने के लिए बाध्य करता आया है।इसीलिए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ताल पीट कर कह रहे हैं कि नए कानून का एमएसपी से कुछ लेना देना नहीं है। न तो एमएसपी किसी कानून में कभी जिक्र था और न ही आगे ऐसा होगा। यह पूरी तरह से सही है। यहां याद दिलाना जरुरी हो जाता है कि पिछली यूपीए सरकार ने 2013 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया था। यह सरकार कांग्रेस के नेतृत्व में काम कर रही थी मगर इस कानून का भी एमएसपी से कुछ लेना देना नहीं था। उसके जरिए तो महज सार्वजनिक वितरण प्रणाली को कानूनी आधार दिया गया था। इस कानून के जरिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली या पीडीएस दिया जाने का अधिकार बना दिया।

इस कानून में यह व्यवस्था की गई थी कि सरकार द्वारा प्राथमिकता के परिवार की श्रेणी में आने वाले हर परिवार को हर माह सरकार द्वारा सस्ती दरों पर पांच किलो अन्न उपलब्ध करवाया जाएगा। इसके तहत ऐसे परिवारों को दो रुपए प्रति किलो की दर से गेहूं व तीन रुपए प्रति किलो की दर से चावल उपलब्ध करवाया जाएगा। उसके बाद प्राथमिकता वाले परिवार की परिभाषा को संशोधन किया गया ताकि देश के 75 फीसदी ग्रामीण व 50 फीसदी शहरी जनता को इसके तहत सस्ता अनाज पाने का हकदार बनाया जा सके।जहां एक ओर इस योजना के तहत जनता को सस्ती दरों पर अनाज दिए जाने का कानूनी प्रावधान किया गया वहीं आम किसान के लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर अनाज खरीदे जाने की कोई गारंटी नहीं दी गई। यह वास्तव में कोई कानून नहीं बल्कि सरकार के एक प्राशसनिक आदेश के जरिए अस्तित्व में आया था। यह तो सरकार की एक नीति का नतीजा था। कानूनन सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदने के लिए बाध्य नहीं है।

इसकी कहानी भी काफी रोचक हैं। जब देश आजाद हुआ तो आम किसान के हालात बहुत खराब थे। हमें लंबे अरसे तक अपनी जरुरत का अनाज विदेशों से खरीदते रहना पड़ा। यह एक अमेरिकी कृषि विशेषज्ञ डा. फ्रैंक डब्लू पारकर की सोच का परिणाम था व अमेरिकी एजेंसी यूएसएडी के प्रमुख थे जो कि अंतर्रराष्ट्रीय विकास के लिए काम कर रही है। उसके भारतीय मिशन का प्रमुख होने के कारण उन्हें भारत सरकार ने खाद्य एवं कृषि मंत्रालय में सलाहकार नियुक्त कर दिया।सलाहकार रहते हुए उन्होंने भारतीय किसान के खराब हालात का अध्ययन करने के बाद तत्कालीन खाद्य मंत्री अजीत प्रसाद जैन को पत्र लिखकर सूचित किया कि किसानों की दुर्दशा व खराब कृषि उत्पादन के पीछे किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य न मिल पाना है। उन्हें अपनी उपज का इतना कम दाम मिलता है जिसके कारण वे कृषि के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश कर ही नहीं सकते थे। वे बेहतर बीज, खाद आदि खरीदने से कतराते है। अगर उन्हें अपनी उपज का सही दाम मिले तो वे कृषि में बेहतर निवेश कर पाएंगे।

उन्होंने कहा कि सरकार को फसल बोए जाने के पहले ही किसान की उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान करना चाहिए ताकि वे उस फसल को बोने के लिए उत्साहित हो। सालों तक उनके इस सुझाव पर ध्यान नहीं दिया पर जब सी सुब्रमण्यम, 1964 में कृषि व खाद्य मंत्री बने तो उन्होंने इस पर ध्यान दिया। उस समय जाट नेता सर छोटू राम व पश्चिमी तमिलनाडु के किसान नेता भी बेहतर कीमत के लिए आंदोलन कर रहे थे। सी सुब्रमण्यम ने कहा कि बेहतर तकनीक, बीज, उर्वरक का इस्तेमाल करके ही कृषि उत्पादन बढ़ाए जाने के साथ-साथ देश में आधे से ज्यादा पिछड़े इलाकों में खेती का उत्पादन बढाया जा सकता है।

यह तभी संभव है जबकि किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने की व्यवस्था हो। यह काम सरकारी खरीद के जरिए ही हो सकता है। इस मुद्दे पर तत्कालीन कैबिनेट में गरमा गरम बहसों के दौरान उन्होंने किसानों का पक्ष जमकर रखा सिर्फ तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी ने उनके प्रस्ताव का विरोध किया। उनकी दलील थी कि इससे मंहगाई बढ़ेगी। तत्कालीन लाल बहादुर शास्त्री ने उनका जमकर समर्थन किया। उन्होंने इस काम को सफल बनाने के लिए कृषि मूल्य आयोग स्थापित करवाया।

इसका नाम आज कृषि लागत व मूल्य आयोग कर दिया गया है। उसका काम खेती में आने वाली लागत के आधार पर उसकी उपज का मूल्य तय करना था। पहली बार 1966-67 में गेहूं के लिए 54 रु प्रति क्विटंल एमएसपी तय किया गया। इसके साथ उन्होंने भारतीय खाद्य निगम बनाने में मदद की ताकि देश भर में एमएसपी पर अनाज खरीदकर उसको जनता तक पहुंचाया जा सके। मगर कभी भी इसको कानूनी जामा नहीं पहनाया गया। आज किसान को डर है कि जब उसका दाम आज भी एमएसपी से कम पर अक्सर खरीदा जाता है तो उसके न रहने पर तो उसके असली आफत शुरु हो जाएगी। इसीलिए वे इस मुद्दे पर आंदोलनरत हैं।

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