किसान आंदोलन में पेंच ही पेंच!

आलेख लिखे जाने तक, हजारों की संख्या में आक्रोशित किसान दिल्ली से सटी सीमा पर धरना दे रहे है। मोदी सरकार नाराज़ किसान से वार्ता कर रही है। अब इसका क्या परिणाम निकलता है, यह देखना शेष है। यक्ष प्रश्न यह है कि आखिर किसान क्रोधित क्यों हुए?

निसंदेह, समाज में अन्य वर्गों की भांति किसानों की भी अनेकों समस्या है, जिसपर केंद्र और राज्य सरकार समय समय पर ध्यान देती भी रही है। सामाजिक प्राणी होने के कारण और बदलते दौर में किसानों की भी महत्वकांशाएं बढ़ी है। इसकी झलक किसान आंदोलन में भी देखनों को मिली है। मुंशी प्रेमचंद के किस्से-कहानियों में जिस प्रकार किसानों की स्थिति का वर्णन किया गया है, उसकी तुलना में प्रदर्शन में शामिल हुए कृषक- ट्रैक्टरों के साथ-साथ लंबे-चौड़े मोटर-वाहनों, आधुनिक परिधान, महंगे स्मार्टफोन्स और तीन-चार महीने का राशन इत्यादि लेकर शामिल हुए है। विडंबना यह है कि अधिकांश किसान प्रदर्शनकारी पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश से है, जबकि शेष देश जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, प.बंगाल, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और केरल के किसान अपनी खेतीबाड़ी में व्यस्त है।

किसानों की हालिया नाराजगी की जड़े इस वर्ष सितंबर में संसद द्वारा पारित कृषि सुधार संबंधित तीन विधेयक है, जो अब कानून बन चुके है। यह सही है कि इन महत्वपूर्ण कानूनों को लागू करने से पहले केंद्र सरकार को संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-परामर्श करना चाहिए था। यदि ऐसा हुआ होता, तो संभवत: इस अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता था। किंतु इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि उपरोक्त कानूनों से मेहनती किसानों का किसी भी प्रकार से अहित या शोषण होगा। विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ हेतु इन कृषि कानूनों को लेकर कई प्रकार भ्रम फैलाए जा रहे है, जिससे कृषकों और उनके आश्रितों में ऊहापोह की स्थिति बनी रहे और उनके आंदोलन से कई निशाने साध दिए जाए।

निष्पक्ष दृष्टि से इन कृषि कानूनों को देखें, तो किसानों को अतिरिक्त सुविधा और विकल्प दिए गए है और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी पूर्ववर्ती व्यवस्था को यथावत रखा है। एपीएमसी के अधिकार पहले की तरह बरकरार है। अब स्वतंत्र अंतरराज्यीय व्यापार की स्वीकृति दी गई है। अनुबंध खेती के लिए निजी कंपनियों के साथ भी साझेदारी कर सकते हैं, जिसमें निजी एजेंसियों को किसानों के उत्पाद खरीदने की अनुमति देगी। यह अनुबंध केवल उत्पाद के लिए होगा। सच तो यह है कि कृषि कानून किसानों की आमदनी बढ़ाने की दिशा में यह पहला सार्थक कदम है। किंतु उनमें वर्तमान कौतूहल संवाद के आभाव के कारण उपजा है। जबतक सरकार किसानों के कानून संबंधित बिंदुवार आशंकाओं को दूर नहीं करेगी, तबतक उनके लिए संभवत: इस कानून से होने वाले लाभ को समझना थोड़ा कठिन है।

इस विरोध-प्रदर्शन में शामिल किसान दो प्रकार के दिख रहे है। इसमें से पहला वर्ग उन भोलेभाले, मेहनती और देशभक्त किसानों का है- जिन्हे सरकार समय रहते कृषक कानून के लाभ समझाने में चूक गई। इन किसानों के मन में जो भी शंकाएं है, वह चाहे आधारहीन ही न क्यों हो- वह सभी स्पष्ट होने के बाद किसान अपने काम पर लौटना चाहेंगे।

दूसरा वर्ग उन लोगों का है, जो समझता और जानता सब है। किंतु किसान आंदोलन का उपयोग समाज में वैमनस्य उत्पन्न, दंगा-फसाद, देश की विकास गति को बाधित और शेष विश्व में भारत की छवि कलंकित करने हेतु कर रहा है। इसमें उनका निहित स्वार्थ और अपना विशुद्ध राजनीतिक एजेंडा है, जिसे सोशल मीडिया में वायरल वीडियो को देखकर सहज समझा भी जा सकता है। किसान आंदोलन में शामिल अराजक तत्व यहां तक कहते दिख रहे है- “…जब हमनें इंदिरा ठोक दी, तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।”

इसी बीच 29 नवंबर को एक और वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ, जिसमें एक तथाकथित प्रदर्शनकारी “जय हिंद”, “भारत की माता की जय” बोलने से इनकार कर रहा है। किसान के भेष में पहुंचा वह “प्रदर्शनकारी” कहता दिख रहा है- मोदी भले ही भारत माता की जय बोलें, लेकिन वो सिर्फ मुसलमान, मुस्लिम और ईसाई कौम का नारा लगाएगा। जब यह सब चल रहा था, तब दिल्ली में ओखला से आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान वहीं उपस्थित थे। स्पष्ट है कि स्वघोषित सेकुलरिस्टों के आशीर्वाद से देशविरोधी शक्तियां किसान आंदोलन को अपने निहित उद्देश्यों के लिए “हाईजैक” करने का प्रयास कर रही है। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ भी इन्हीं वाम-इस्लामी शक्तियों ने देश के कई हिस्सों में प्रदर्शनों को हिंसक रूप दे दिया था और बाद में राजधानी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़काकर जान-माल को भयंकर क्षति पहुंचाई थी।

यह सब एकाएक नहीं हुआ है। इनकी बौखलाहट का कारण उन निर्णयों में छिपा है, जहां सनातन भारत की मूल बहुलतावादी वैदिक पहचान और परंपराओं को पुनर्स्थापित करने की दिशा में संभवत: पहली बार विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही है, तो प्रत्येक मोर्चे पर देश की एकता, अखंडता और सुरक्षा को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। चाहे सीमापार से कश्मीर में पाकिस्तानी हरकतों पर उचित प्रतिकार (सर्जिकल स्ट्राइक सहित) करने की सैन्य स्वतंत्रता हो या फिर डोकलाम-लद्दाख में साम्यवादी चीन की आक्रमकता का उसी की भाषा में भारतीय सेना का उत्तर। यह सब राष्ट्रवादी परिवर्तन देश में सामान्य नागरिकों की भांति सभी संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग को रास नहीं आ रहे है।

इसके अतिरिक्त, वर्तमान भारतीय नेतृत्व द्वारा तीन तलाक विरोधी अधिनियम, धारा 370-35ए का संवैधानिक क्षरण, शीर्ष अदालत के निर्णय के बाद राम मंदिर निर्माण में तेजी, नागरिकता संशोधन कानून और कृषि सुधार संबंधित कानून आदि शामिल है- जिसने देशविरोधी ताकतों को खुलकर बाहर आने पर विवश कर दिया है। सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के दौर में इन विकृत लोगों की हरकतें कैमरे में कैद भी हो रही है।

यह अकाट्य सत्य है कि किसानों की स्थिति (आय बढ़ाने सहित) में सुधार हेतु अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। किंतु वर्तमान दौर में जब पिछले लगभग एक वर्ष से जारी वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण भारत सहित शेष दुनिया की अर्थव्यवस्था ढह गई है, सभी उद्योग-धंधों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा है- तो उस स्थिति में भारतीय कृषक अपवाद कैसे हो सकते है?देश में किसान समस्या के कई कारण है। उनके संकट की जड़ें उस ‘असंतुलित’ व्यवस्था में है, जो गांव-देहात में रहने वाले लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं, सीमित संसाधनों और समेकित विकास के आभाव में सिकुड़ते अवसरों के कारण उपजी है। पिछले सात दशकों में जहां भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 56.5 प्रतिशत से घटकर 16-17 प्रतिशत रह गया है। किंतु आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित लोगों की संख्या में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। आज भी देश की आधी आबादी खेतीबाड़ी से संबंधित रोजगारों पर निर्भर है।

इस स्थिति को और भी बुरा बनाने का काम निरंतर छोटे होते खेती योग्य जमीन ने भी किया है। इसका सबसे प्रमुख कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमीन का बंटवारा होना है। अर्थात् खेती की जमीन सीमित ही है, लेकिन उसपर किसानों के साथ अन्य आश्रितों, जो स्वयं को किसान कहते है- उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र में छिपी ‘बेरोजगारी’ को उजागर करती है। इस दुष्चक्र से बाहर निकालना है, तो उन्हे कौशल रोजगारों से जोड़ना जरूरी है।

निसंदेह, किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होना चाहिए। क्या यह बिना यथावत स्थिति को बदले संभव है? किसी भी परिवर्तन से स्थापित स्वार्थों को स्वाभाविक कष्ट होता है। नए कृषि कानूनों के लागू होने पर ऐसा ही हुआ है, जिसमें दशकों से “निहित स्वार्थ” रख रहे समूहों को गहरी चोट पहुंची है। वह लोग किसानों के एक वर्ग को गुमराह करने में फिलहाल सफल हो गए है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह इन कानूनों को लेकर ईमानदार और मेहनती किसानों की आशंकाओं को दूर करें और कृषक असंतोष के माध्यम से अपना घोषित राजनीतिक एजेंडा (जिहादी-खालिस्तानी सहित) लागू करने में जुटे लोगों को बेनकाब करें।

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