चाणक्य बुद्धी में खालिस्तानी किसान!

उफ! संघ, भाजपा, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और सोशल मीडिया के लंगूर! किसी भी कोण से समझ नहीं आ रहा है कि संघ परिवार में वह कौन चाणक्य है जिसने पंजाब के किसान आंदोलन के पीछे खालिस्तानी, टुकड़ा-टुकड़ा सेकुलर गैंग और मुसलमानो की साजिश का नैरेटिव बनवाया। मैं नहीं मानता कि हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के दिमाग का ओरिजनल आईडिया है जो उनके मुंह से खालिस्तानी शब्द निकला। यह भाजपा की सामूहिक बुद्धी में कही चाणक्य मंथन था जिसने किसानों के एक सहज आंदोलन को नीला-हरा रंग-रूप दिलाया और उसे देशद्रोहियों की साजिश के प्रोपेंगेंडा में गुत्था गया।

दरअसल, फिलहाल सत्ता का मिशन इस ध्येय, इस चिंता में है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जो हिंदू वोट है वे जैसे भी हो भक्त बने रहे। उनमें कोई किंतु, परंतु, शक, अविश्वास, बहस, सवाल पैदा न हो। जब भक्ति का सत्संग, कीर्तन चल रहा है तो जो भी विध्न डाले तो उसे राष्ट्र विरोधी राक्षश करार दे कर हिंदुओं को सोचने-विचारने की तरफ न भटकने दिया जाए।

तभी ज्योंहि पंजाब के किसानों ने दिल्ली चलों का आव्हान किया तो बिना आगा-पीछा सोचे हल्ला बना दिया गया कि दिल्ली के पृथ्वीराज चौहान की सत्ता को चुनौती देने के लिए खालिस्तानी, टुकडा-टुकड़ा गैंग के मुसलमानों की साजिश में दिल्ली मार्च शुरू हुआ है। आंदोलन देश विरोधी है और दिल्ली की सीमा पर दूसरा शाहीन बाग बना दिया है। देखों उस पगड़ी के नीचे मुसलमान का चेहरा, देखों वह बुजुर्ग महिला बिलकिस या देखों, कनाड़ा-ब्रिटेन के ये खालिस्तानी नेता भारत विरोधी माहौल बनाते हुए।

आजाद भारत के के हिंदुस्तान में क्या पहले कभी हुआ कि कोई किसान या मजदूर आंदोलन हुआ हो और उसे दिल्ली की हूकूमत ने देशविरोधी करार दिया हो!  फिर सिक्ख धर्म के आस्थावान सिक्खों के लिए ऐसी बात! वह सिक्ख धर्म जो हिंदुओं की रक्षा के लिए बना था जो पंजाब के हिंदू परिवार के बड़े बेटे को केशधारी बनाने याकि सिक्ख बनाने की परंपरा से विस्तारित हुआ है। उस धर्म के गांव-देहात के आम जन सिक्ख की समस्या के मसले में भाजपा, संघ परिवार, राष्ट्रीय मीडिया ने जो नैरेटिव बनाया, जैसे आंदोलन को बदनाम किया गया वह प्रमाण है इस बात का कि हिंदुओं को सचमुच राज करना नहीं आता। सिक्ख तीन महिने पंजाब में आंदोलन करते रहे। मोदी सरकार के कान में जूं नहीं रेंगी। वे जब दिल्ली को रवाना हुए तब भी उन्हे रोकने के लिए बातचीत करने की बजाय लाठी- पानी बरसाया गया। पृथ्वीराज चौहान की सत्ता इस अंहकार में रही कि इन्हे हरियाणा पार नहीं करने देंगे। वही से किसानों को खालिस्तानी कह कर बदनाम करना शुरू हुआ और ये कथित खालिस्तानी जब दिल्ली की सीमा पर पहुंचे तो पृथ्वीराज चौहान की सत्ता के होश उड गए और फिर बातचीत की समझ बनी!

इसलिए लाख टके का सवाल है कि भाजपा की चाणक्य बुद्धी की बिसात में खालिस्तानी’ शब्द से आगे क्या राजनीति पकेगी? क्या इससे हिंदू किसान भ्रमित होंगे। शेष भारत के हिंदू किसान क्या मोदी के दिवाने बने रहेंगे? वे कृषि सुधारों को मोदी चमत्कार का प्रसाद मान रहे है या वे खालिस्तानी, टुकड़ा-टुकड़ा गैंग, सेकुलरों की साजिश में बहक रहे है? 

कितना त्रासद है एक लोकतांत्रिक आंदोलन को ऐसे जुमलों और साजिश की इन थ्योरी में सोचना और एक समुदाय को, सिक्खों को ऐसे बदनाम बनाना!

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