समाधान निकलना ही नहीं था

अब ये साफ है कि सरकार और आंदोलनकारी किसान संगठनों के बीच बातचीत टूट चुकी है। बातचीत के पहले दिन से अंदाजा था कि यही होगा। सरकार की मंशा पहले आंदोलन को थकाने की थी। इसमें कामयाबी मिलती ना देख उसके समर्थक जमातों और मीडिया ने आंदोलन को बदनाम की रणनीति अपनाई। खालिस्तानी से लेकर विपक्ष प्रेरित और कम्युनिस्टों से संचालित होने के इल्जाम आंदोलन पर मढ़े गए। लेकिन इससे भी आंदोलन का मनोबल नहीं टूटा, तो फिर आंदोलनकारियों के आगे एक चारा फेंका गया। या इसे ऐसे कहा जा सकता है कि उन्हें फेस सेविंग यानी चेहरा बचाने का एक रास्ता दिया गया। सरकार ने कहा कि वह तीनों विवादित कृषि कानूनों पर अमल डेढ़ साल के लिए रोक देगी। लेकिन गजट में अधिसूचित कानूनों के मामले में ऐसा वह किस कानून के तहत करेगी, यह नहीं बताया गया।

बहरहाल, किसान इस पर कैसे मान जाते कि जिसे वे अपनी मौत का फरमान मानते हैं, वह अब डेढ़ साल बाद आएगा। तो चूंकि सरकार की मंशा कानून बदलने या उन्हें फिर से बनाने की संसदीय प्रक्रिया में जाने की नहीं थी, तो बातचीत टूट गई। अब क्या होगा, कहना मुश्किल है। एक संभावना ताकत के इस्तेमाल की है। लेकिन उसके क्या परिणाम होंगे, यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है। फौरी सच्चाई यह है कि किसान नेता तीनों नए कृषि कानूनों को पूरी तरह वापस लिए जाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी दिए जाने की अपनी मांग पर पहले की तरह अड़े हुए हैं। इन कानूनों के विरोध में लगभग दो महीने से हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मानना है कि संबंधित कानून किसानों के खिलाफ और कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में हैं। अगर ये कानून लागू हुए तो जैसाकि वे कहते हैं, वे “अंबानी- अडानी के गुलाम” बन जाएंगे। कहा जाता है कि लोकतंत्र में आम सहमति बनाना और लोगों के भ्रमों को दूर करना भी सरकार की जिम्मेदारी होती है। लेकिन मौजूदा सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है। पहले भी नहीं रहा है। तो उसने अपने रुख में कड़ाई लाते हुए कहा कि अगर किसान यूनियन कानूनों को निलंबित करने के उसके प्रस्ताव पर चर्चा के लिए सहमत हों तभी दोबारा बातचीत होगी। इस तरह संवाद भंग हो गया है।

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