सरकार अपनी जीत न देखे!


यूं ही हमेशा उलझती रही है जुल्म से खल्क, न उनकी रस्म नई है न अपनी रीत नई, यूं ही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल, न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई। फैज की एक मशहूर नज्म की ये लाइनें इन दिनों किसान आंदोलन के समर्थन में खूब सुनने को मिल रही हैं। फैज की ज्यादातर शायरी संगीनों के साये में पले पाकिस्तानी लोकतंत्र में या सीधे सैनिक तानाशाही के दौरान लिखी गई है। इसके बावजूद अगर वे लिख रहे थे कि खल्क यानी आम लोगों की जीत की रस्म पुरानी है तो इसका मतलब है कि सत्ता चाहे कैसी भी रही हो, अंतिम जीत अंततः आवाम की होती है। इसलिए किसी भी सत्ता को खल्क से टकराने से बचना चाहिए और आम लोगों के सामने अपनी जीत देखने की जिद से भी बचना चाहिए।

दुर्भाग्य से केंद्र सरकार किसान आंदोलन में गणतंत्र दिवस के बाद आए एक अल्पविराम को अपनी जीत के तौर पर देख रही है और ऐसे अलोकतांत्रिक रास्ते अख्तियार कर रही है, जिनसे उसे लगता है वह निर्णायक जीत हासिल कर सकती है। लेकिन ऐसा सोचना बड़ी गलती होगी क्योंकि यह आंदोलन किसी राजनीतिक लक्ष्य को ध्यान में रख कर नहीं हो रहा है। यह एक सामाजिक और बहुत हद तक आर्थिक आंदोलन है। अगर किसानों को अन्नदाता न भी कहें तब भी यह उस कृषि क्षेत्र से जुड़ा आंदोलन है, जो आज भी देश के 65 फीसदी लोगों को रोजगार देता है। यानी देश की 80 करोड़ आबादी अब भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि क्षेत्र से जुड़ी है और यह आंदोलन उसको बचाने के लिए हो रहा है। ऐसे आंदोलन हार के साथ खत्म नहीं होते हैं। बलपूर्वक दबा दिए जाने के बाद भी ऐसे आंदोलन सतह के नीचे अपनी समस्त ऊर्जा के साथ जीवित होते हैं और समय आने पर ज्वालामुखी की तरह फटते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समय आने का मतलब चुनाव होता है।

चुनावों में विपक्षी पार्टियों को हराने या केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर अपने विरोधियों को परास्त करने की आदी हो गई सरकार ने किसानों के आंदोलन में भी जीत हासिल करने की जिद पाल ली है। उसे लग रहा है कि वह राजनीति के हथकंडों से या सत्ता की ताकत से किसानों के आंदोलन को दबा देगी और इसमें भी जीत हासिल कर लेगी। सरकार को यह भी लग रहा है कि अगर उसने किसानों की मांग मान ली और कानूनों को वापस लिया तो यह उसकी हार होगी और इससे प्रधानमंत्री की 56 इंच की छाती वाली छवि को नुकसान होगा। लेकिन असल में ऐसा नहीं होता है क्योंकि यह हार-जीत का मामला ही नहीं है। किसान खुद ही कह रहे हैं कि उनको प्रधानमंत्री की गरिमा का सम्मान करना है और अगर प्रधानमंत्री इस देश के सभी 138 करोड़ लोगों को अपना मानते हैं तो उन्हें भी आंदोलन कर रहे किसानों का सम्मान करना चाहिए। किसानों की बात मानने से उनकी छवि बिगड़ेगी नहीं, बल्कि और बड़ी होगी। लेकिन अगर वे अपनी गढ़ी हुई छवि के दायरे में कैद रहते हैं तो उसका बड़ा नुकसान होगा।

कम से कम अभी ऐसा ही लग रहा है कि सरकार किसानों के आंदोलन को दबा कर या खत्म कर जीत हासिल करना चाहती है। अगर ऐसा नहीं होता तो दिल्ली की सीमाओं पर सरकार को ऐसी किलेबंदी कराने की जरूरत नहीं होती है, जैसी अभी की जा रही है। दिल्ली की पुलिस सात-सात स्तर की बैरिकेडिंग कर रही है। सड़कों पर जेसीबी के जरिए गड्ढे खोदे जा रहे हैं। दुश्मन देश की सीमा पर जिस तरह से कंटीले तारों की बाड़ लगती है, वैसी बाड़ दिल्ली की सीमा पर लगाई जा रही है। सड़क पर सीमेंट की ढलाई करके बड़ी बड़ी कीलें रोपी जा रही हैं। सोचें, जो किसान पूरी मानवता का पेट भरने के लिए अनाज रोपते हैं उनके रास्ते में कीलें रोपी जा रही हैं! किसानों का रास्ता रोकने के लिए सड़कों पर पक्की दीवारें खड़ी की जा रही हैं और पुलिस के जवानों के हाथों में तलवारें दी जा रही हैं, यह सोचे बगैर कि ये जवान आंदोलन कर रहे किसानों के ही बेटे हैं। दिल्ली की सीमा पर पुलिस की जैसी तैयारी दिख रही है उससे लग रहा है कि सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ जंग की तैयारी कर रही है और जब जंग की ऐसी तैयारी होती है तो उसका लक्ष्य जीतना ही होता है!

किसानों के साथ छेड़ी गई अपनी जंग जीतने के लिए सरकार और भी तिकड़में कर रही है। गणतंत्र दिवस की घटना के बाद किसान आंदोलन में थोड़ी मायूसी आई तो इसे अवसर जान कर सरकार ने आंदोलन की जगह पर पानी और बिजली की सप्लाई बंद कर दी। अपने लोगों को स्थानीय नागरिक बना कर भेजा और किसानों पर हमला कराया। यह धारणा बनाने का प्रयास किया गया कि सड़कों पर बैठे किसानों से स्थानीय लोग नाराज हैं। हकीकत यह है कि अपने कुछ लोगों को लेकर गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन खत्म कराने पहुंचे भाजपा के लोनी के विधायक नंदकिशोर गुर्जर का पांच गांवों ने बहिष्कार किया है। यानी बात उलटी है। लोग आंदोलन के साथ हैं और किसानों का विरोध करने वालों का बहिष्कार कर रहे हैं पर मीडिया समूहों की मदद से सरकार यह धारणा बनवा रही है कि लोग किसानों से खफा हैं।

जब यह दांव नहीं चला तो सरकार ने यह प्रचार शुरू किया है कि किसानों के रास्ता बंद करने से खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे महंगाई बढ़ रही है और सब्जियों का उत्पादन करने वाले किसानों को नुकसान हो रहा है। अफसोस की बात है कि खुद किसान कल्याण मंत्री इस अफवाह को हवा दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की बनाई तीन सदस्यों की एक कमेटी है, जिसके सामने पता नहीं कहां-कहां से किसान संगठन आ रहे हैं और कृषि कानूनों की तारीफ कर रहे हैं। इनमें से किसी किसान संगठन का नाम नहीं बताया जा रहा है। जाहिर है यह भी किसानों से जंग जीतने की तिकड़म का ही हिस्सा है। ऐसी ही तिकड़म गणतंत्र दिवस के दिन की गई थी पर उसमें भी आंशिक कामयाबी ही मिल पाई। वह कामयाबी भी किसान आंदोलन के नई लहर के साथ हवा में उड़ गई है।

सरकार जब तक किसान आंदोलन को ताकत या तिकड़म के दम पर खत्म करा देने के मुगालते में रहेगी, तब तक उसे कामयाबी नहीं मिलेगी। उसने पहले दिन से इस आंदोलन की तीव्रता और इसके दायरे को समझने में गलती की है। पहले वह कहती रही कि यह पंजाब के किसानों का आंदोलन है। तभी इसे खालिस्तान समर्थकों का आंदोलन ठहराने का बेहूदा प्रयास हुआ। उसके बाद इसे पंजाब-हरियाणा के जाट-सिख किसानों का आंदोलन कहा गया। अब इसका दायरा पंजाब, हरियाणा की भौगोलिक सीमाओं से निकल देश के दूसरे कई राज्यों में पहुंच गया है। अब आंदोलन का केंद्र गाजीपुर बॉर्डर है, जहां उत्तर प्रदेश के किसान बैठे हैं। सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर अगर पंजाब और हरियाणा के किसान बैठे हैं तो शाहजहांपुर-खेड़ा बॉर्डर पर राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के किसान बैठे हैं। देश के दूर-दराज के हिस्सों में भी छोटे-छोटे गाजीपुर, सिंघु और टिकरी बन गए हैं। बिहार, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु तक किसान आंदोलित हो रहे हैं।

तभी सवाल है कि अगर सरकार किसान आंदोलन को जंग मान रही है तो क्या वह पूरे देश को जंग के मैदान में तब्दील कर देगी? कोई भी लोकतांत्रिक और यहां तक की तानाशाह सरकार भी ऐसा नहीं कर सकती है। इसलिए सरकार को चुनावी राजनीति की चालबाजियां बंद करनी चाहिए और अपने ही लोगों के खिलाफ जीत हासिल करने की जिद छोड़ कर ईमानदारी और सद्भाव के साथ बातचीत की पहल करनी चाहिए। यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि जन आंदोलन न तो पुलिस की ताकत से दबाए जा सकते हैं, न राजनीतिक तिकड़मों से खत्म कराए जा सकते हैं और न अदालतों के पूर्वाग्रह भरे फैसले से समाप्त किए जा सकते हैं, संपूर्ण क्रांति आंदोलन में देश ने यह सब देखा हुआ है!


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