सरकार छोड़े ईगो और झूके!

केंद्र सरकार और आंदोलन कर रहे किसान संगठनों के बीच की वार्ताओं से कोई समाधान निकलने की सूरत नहीं दिख रही है। किसानों की जिंदगी और जीविका की जद्दोजहद और सरकार के अहम के बीच टकराव उस मुकाम तक पहुंच गया है, जिसके आगे कोई राह नहीं है। किसान अपने अस्तित्व के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं और सरकार पहली बार में ही ऐसी मिसाल कायम करना चाहती है कि फिर कोई इस तरह से उसके खिलाफ बगावत करने की हिम्मत न करे। यह अनायास नहीं है कि सरकार समर्थक और इस पूरे मामले में तटस्थ या कुछ हद तक किसानों के प्रति सहानुभूति रखने वाले भी यह बात कहते मिल रहे हैं कि अगर सरकार ने आंदोलन के आगे झुक कर कानूनों को निरस्त कर दिया तो गलत नजीर बनेगी और फिर कोई भी इस तरह से सड़क पर बैठ कर सरकार पर कानून बदलवाने का दबाव डालेगा।

यह भी अनायास नहीं है कि दिल्ली की कड़ाके की ठंड और कोढ़ में खाज की तरह हो रही बारिश के बावजूद सरकार की ओर से किसी ने किसानों की सुध नहीं ली है। याद करें कैसे राज्यसभा से निलंबन की कार्रवाई के विरोध में पांच विपक्षी सांसदों ने संसद भवन परिसर में महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने एक रात का अनशन किया था और सुबह राज्यसभा के उप सभापति खुद चाय लेकर अनशन कर रहे सांसदों के पास पहुंचे थे। यह अलग बात है कि सांसदों ने उनकी चाय स्वीकार नहीं की थी, वैसे ही जैसे किसान वार्ता के दौरान सरकार का भोजन और उसकी चाय नहीं स्वीकार कर रहे हैं। पर यह लोकंतत्र का तकाजा है और लोक कल्याणकारी सरकार की जिम्मेदारी है कि वह मुश्किल झेल रहे अपने नागरिकों की सुध ले। हैरानी की बात है कि देश के कई राज्यों के हजारों नहीं लाखों किसान दिल्ली के चारों तरफ की सीमाओं पर 41 दिन से आंदोलन कर रहे हैं और न तो उनकी सुध लेने सरकार की ओर से कोई पहुंचा है और न उनके प्रति सहानुभूति का एक शब्द सुनाई दिया है।

यह संयोग है कि किसानों का आंदोलन उसी इलाके में हो रहा है, जिस इलाके में कांवड़ यात्रा के समय प्रशासन द्वारा हेलीकॉप्टर से फूल बरसाए जाते हैं लेकिन वहीं प्रशासन किसानों के खिलाफ लाठी लेकर खड़ा है। किसानों के ट्रैक्टर रोके जा रहे हैं, जब्त किए जा रहे हैं, नाम पूछ कर नोटिस दिया जा रहा है और हिरासत में भी लिया जा रहा है।

अनेक तरह की विपरीत परिस्थितियों में आंदोलन कर रहे किसानों को पानी की मदद देने भी प्रशासन नहीं पहुंचा है और न भाजपा के स्थानीय विधायकों व सांसदों में इतनी इंसानियत जागी है कि वे किसानों का हालचाल पूछने जाएं। हो सकता है कि इंसानियत जगी भी हो पर अपने सुप्रीमो की नाराजगी झेलने की हिम्मत नहीं जग पाई हो! ऐसी भी कोई खबर नहीं है कि कृषि मंत्री, जिनके मंत्रालय में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘किसान कल्याण’ का जुमला जुड़वाया, उन्होंने भी किसानों की मुश्किलों के प्रति कोई सरोकार दिखाया हो। आंदोलन के दौरान 41 दिन में करीब 60 किसानों की मौत हुई है पर देश के 130 करोड़ नागरिकों की भलाई के लिए दिन रात एक करने वाले प्रधानमंत्री के मुंह से उनके लिए सहानुभूति का कोई शब्द सुनने को नहीं मिला। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार के लिए और पूरी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए आंदोलन कर रहे किसान दुश्मन की तरह हो गए हैं और इसलिए उनके साथ वैसा ही बरताव किया जाना है, जैसे दुश्मन के साथ किया जाता है।

अब तक हुई सात-आठ दौर की बातचीत, सरकारी और सत्तारूढ़ दल के विशाल तंत्र और मीडिया द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार से भी यही अंदाजा लग रहा है कि सरकार सहानुभूति के साथ किसानों की मांगों पर विचार करने को तैयार नहीं है। सरकार की दिलचस्पी किसी तरह से आंदोलन खत्म कराने और किसानों को वहां से हटाने में है। तभी चार जनवरी की बातचीत में चार घंटे तक साथ बैठने के बावजूद वार्ता एक इंच आगे नहीं बढ़ी और वार्ता से निकलने के तुरंत बाद किसान नेताओं ने यह भी कह दिया कि आठ जनवरी की वार्ता से भी कुछ हासिल नहीं होना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि किसानों को सरकार का रवैया समझ में आ गया है। यह साफ दिखा कि सरकार बिना किसी तैयारी के वार्ता में पहुंची थी या कम से कम किसानों के सामने यह दिखाया कि उसे किसानों की पूरी मांगों की जानकारी ही नहीं है।

सरकार ने चार जनवरी को किसानों से कह दिया कि वह सिर्फ उनकी बात सुन कर कानून नहीं बदल देगी। कृषि मंत्री ने कहा कि देश के बहुत से किसान कानूनों के समर्थन में हैं। क्या इससे किसान नेता यह नहीं समझ गए कि सरकार उनके आंदोलन की चिंता नहीं कर रही है? ऐसे ही किसानों ने सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की कानूनी गारंटी देने की बात कही तो कृषि मंत्री ने कहा कि वे इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं। सवाल है कि किसान किस भरोसे पर चर्चा करें, जब आठ दिसंबर को ही केंद्रीय गृह मंत्री किसानों से बातचीत में दो टूक कह चुके हैं कि सरकार सभी फसलों पर एमएसपी नहीं दे सकती है क्योंकि इसके लिए 17 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होगी!

यानी सरकार के जितने मुंह हैं, उतने मुंह से अलग अलग बातें हो रही हैं, जबकि किसानों के 41 संगठनों के नेता सरकार से बातचीत करने जा रहे हैं और सभी एक ही बात कर रहे हैं। यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार टाइम पास कर रही है। उसे लग रहा है कि किसान थकेंगे और टूटेंगे और अंत में जो मिलेगा उसे स्वीकार कर वापस लौट जाएंगे। लेकिन किसानों में कम से कम अभी तक टूटने या झुकने का कोई संकेत नहीं मिल रहा है। मौसम की मार उनको नहीं तोड़ सकी है। जब वे अभी तक की ठंड और बारिश झेल गए तो आगे तो मौसम भी अच्छा ही होने वाला है। इसलिए सरकार की यह उम्मीद तो गलत साबित होने वाली है।

अब इसकी संभावना भी नहीं है कि किसी अदालती फैसले के जरिए जोर-जबरदस्ती किसानों को हटाया जाए। इसलिए अब एक ही रास्ता बचता है और वह रास्ता है समझौते का।

सरकार को अपना अहंकार छोड़ना होगा क्योंकि किसान अपनी जिंदगी और जीविका को तो नहीं छोड़ सकते। सरकार अपना ईगो छोड़े, यह स्वीकार करे कि तीनों कृषि कानूनों में कमी है, किसानों के प्रति सच्ची सहानुभूति दिखाए, उनके खिलाफ दुष्प्रचार बंद करे, कृषि कानूनों के फायदे का झूठा प्रचार भी बंद करे और सचमुच खुले दिल से बात करे तभी कोई रास्ता निकल सकता है। अगर सरकार अपने अहंकार में अपनी जिद पर अड़ी रहती है तो कोई रास्ता नहीं निकलेगा। समय के साथ यह आंदोलन और ऐतिहासिक होता जाएगा। सरकार जितनी देरी करेगी, उसका नुकसान उतना ही बड़ा होगा।

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