खेती पर अंबानी-अडानी की पुरानी नजर! - Naya India
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खेती पर अंबानी-अडानी की पुरानी नजर!

किसान बनाम मोदी-अडानी-अंबानी-3 : अंबानी-अडानी के धंधे का रामबाण नुस्खा भारत की 138 करोड़ आबादी पर कंट्रोल है। धीरूभाई अंबानी ने साठ के दशक में इंदिरा दरबार से धागे के आयात का लाइसेंस ले कर कपड़े याकि टेक्सटाइल क्षेत्र पर कब्जे के बिजनेस प्लान में काम किया तो वह भीड़ की सस्ते कपड़े की जरूरत से था। बाद में ईंधन की जरूरत में रिफाइनरी लगा सरकार को ही तेल बेच कर बेइंतहा कमाई की। संचार क्रांति का वक्त आया तो भीड़ को पहले अनिल अंबानी ने सस्तेपन से उल्लू बनाया फिर मुकेश अंबानी ने। नेताओं को चांदी की जूती, दिल्ली दरबार को करप्ट करके कंपीटिटरों को हर तरह से मारा। फिर कंपीटिटर वाडिया सेठ हों या सरकारी आईपीसीएल कंपनी या बीएसएनएल या वोडोफोन कोई भी। इन दिनों अडानी को भारत के परिवहन, पोर्ट, एयरपोर्ट, रेल के जरिए भीड़ की बेसिक जरूरत पर मोनोपोली बनानी है तो वे भी दूसरे सेठों, सरकार से औने-पौने दामों में संपत्तियां खरीद रहे हैं। अंबानी-अडानी न विदेशी कंपनियों को जमने देंगे और न देशी कंपनियों को बरदाश्त करेंगे। यह मामला कुछ वैसे ही है जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा करने का आधार जब जमा तो न डच, फ्रेंच कंपनियां भारत मे टिक पाईं और न भारत के देशी साझेदार याकि बंगाल के जगत सेठ जैसे मारवाड़ी सेठ-बैंकर आदि ईस्ट इंडिया कंपनी से लोहा ले पाए। अंबानी ने पेट्रोल की वैश्विक कंपनी शेल के पंप नहीं खुलने दिए और तब तक विदेशी रिटेल कंपनियों को अनुमति नहीं मिलने दी जब तक खुद रिटेल स्टोर नहीं खोल लिए।

सबके पीछे 138 करोड़ की भीड़ पर वर्चस्व का मकसद। इसमें खाने-पीने के सामान वाली खेती पर कब्जा हो जाए तो फिर कहना ही क्या! वे खेती कराएं, फसल पैदा कर सीधे खरीदें, फिर भंडारण, ट्रांसपोर्टेशन और अपने शॉपिंग मॉल में, खुदरा सामान की दुकानों-स्टोर से बिक्री से लेकर अंतरराष्ट्रीय जिंस बाजार में सट्टे-सौदे के धंधे में भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को ढाल दें तो अपने आप बीस-तीस सालों में इस पृथ्वी की सबसे बड़ी आबादी के वे इतिहासजन्य बादशाह होंगे! कल्पना करें भविष्य के उस वक्त को जब 150 करोड़ भारतवासी अंबानी-अडानी के पैदा करवाए अनाज, फल-सब्जी को इन्हीं की दुकानों से खरीदते हुए होंगे। इनकी बिजली-ईंधन सप्लाई से खाना पकाते हुए तो इनकी ट्रेन, इनके एयरपोर्ट, बंदरगाह, इनकी टोल सड़कों से चलते हुए होंगे। अंबानी-अडानी के इंटरनेट से, फोन से, एप से आबादी को पेमेंट भी तो इनके बैंकों से लोन (हां, मोदी सरकार कॉरपोरेट बैंक प्रस्ताव बना रही है) भी। अंबानी की टीवी चैनलों, मीडिया, फेसबुक, गूगल पर ही 150 करोड़ लोग सूचना-जानकारी-बुद्धि के लिए आश्रित। कपड़ा अंबानी से, रोटी अंबानी से, खरीदारी अंबानी से शिक्षा, बैकिंग, पूंजी आदि भी अंबानी-अडानी के नेटवर्क से!

उफ! क्या सिनेरियो है। लेकिन यदि हिंदुओं का मौजूदा राज अगले बीस-तीस साल ऐसे ही चला तो तय मानें अंबानी-अडानी की पीढ़ियां 150 करोड़ लोगों के जीवन को नियंत्रित किए हुए होंगी। इसके लिए अंबानी-अडानी को कुछ भी नहीं करना है। ये चीन से निर्मित वस्तुएं आयात करेंगे, अमेरिका-यूरोप से इनोवेशन लेंगे और लोगों से खेती करा कर, कुली-मजदूर-नौकर बना कर उस व्यापारी की तरह धंधा करेंगे, जिसे केवल बेचना है, लोगों की आवश्यकता का मनमानेपन से, मोनॉपोली में मनमानी शर्तों, दाम पर दोहन करना है। लोगों को अडानी-अंबानी की बिजली लेनी ही होगी, फिर वह चाहे जिस रेट पर हो। अनाज-फल-सब्जी रिलांयस स्टोर से ही लेनी होगी क्योंकि खेत से वह सीधे पहुंची हुई होगी। मंडी या ठेले के सब्जी वाले के जरिए सेब याकि एपल मिले इसकी गारंटी नहीं होगी क्योंकि संभव है अडानी ग्रुप हिमाचल के सभी सेब फार्म में कांट्रेक्ट से सेब की खेती कराता हुआ हो।

खेती का सपना अंबानी-अडानी का पुराना है। आप गूगल पर सर्च करें तो इन दोनों सेठों के खेती से कमाई के ग्रांड सपने की इनकी कई एग्रो कंपनियों के अते-पते मिलेंगे तो एग्रीकल्चर बिजनेस प्लान की लंबी-चौड़ी रपटें भी मिलेंगी। बिजनेस अखबार ‘बिजनेस, स्टैंडर्ड’ में 20 जनवरी 2013 को छपी रिपोर्ट में मुकेश अंबानी ने बताया था कि रिलायंस ने गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश के किसानों से ऊंची क्वालिटी, टिश्यू-कल्चरल केले के पौधों से खेती शुरू कराई है, जिससे 35-40 किलो प्रति बंच केला पैदा होता है, जबकि पुरानी खेती में 20 किलो ही होता है। किसानों से रिलायंस केले सीधे खरीद रहा है, उन्हें ज्यादा कीमत मिल रही है। रिलायंस औद्योगिक-सेवा क्षेत्र के बाद कृषि और ग्रामीण क्षेत्र पर फोकस बनाने वाली पहली भारतीय कंपनी होने वाली है। आर्थिक अवसर बनाने के लिए रिलायंस किसानों के साथ काम करेगी।

अंबानी की यह बात सात साल पहले सन् 2013 की है। सन् 2014 में एक अन्य बिजनेस अखबार ‘द मिंट’ में 2 दिसंबर को खबर थी कि मुकेश अंबानी ने नए निवेश चक्र के संकेत दिए। जियो के बाद अंबानी कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य के धंधे पर फोकस बनाएंगे। इसी अखबार में 21 जनवरी 2015 में- अडानी का धीरे मगर सामरिक दांव कृषि में बढत बनवाने वाला (Adani in slow, strategic bid to stay ahead in agriculture) शीषर्क से खबर थी। अडानी ग्रुप ने कृषि का इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक बैकबॉन बना लिया है और सुधारों की इंतजार में है। उस खबर अनुसार अस्सी के दशक में कॉमोडिटी धंधे में जमने के साथ गौतम अडानी ने विदेश में जमीन खरीद कर खेती कराने की सोची थी। ग्रुप के अनुसार कृषि बिजनेस दरअसल इंफ्रास्ट्रक्चर का खेल है। अनाज के स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क का धंधा अडानी ने सन् 2007 में शुरू किया। दस हजार करोड़ रुपए के निवेश से गोदाम बनाने की शुरुआत हुई। अडानी एग्रीफ्रेस लिमिटेड व अडानी विलमर कंपनी के धंधे में खाने के तेल के देश के सबसे बड़े ब्रांड के साथ ताजा फलों और अनाज के लिए लॉजिस्टिक चैन का वह ढांचा, वह रोडमैप अडानी ग्रुप ने दस सालों से जो सोचा हुआ है उसी में पंजाब-हरियाणा, मध्य प्रदेश में उसके विशाल अनाज स्टोरेज बने हैं। ये फिलहाल सरकारी एफसीआई के ठेके में काम कर रहे हैं लेकिन ये पंजाब के मोगा, हरियाणा के कैथल से रेल रास्ते (अडानी के अपने रेल रैक, पटरी, डिपो के नेटवर्क) मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, कोयंबटूर, बेंगलुरू और बदंरगाहों तक अनाज पहुंचाने के बंदोबस्तों के साथ हैं। हिमाचल के सेब बागत के लिए स्टोरेज बना उन्हें देशी-विदेशी बाजार में अपने ब्रांड से पहुंचाने का भी अडानी का ढांचा बना हुआ है।

जाहिर है अंबानी अपनी दुकानों से अनाज-फल-सब्जी बेचने का अखिल भारतीय नेटवर्क बना चुके हैं तो अडानी अपने अनाज भंडारण के विशाल सेलो, कोल्ड स्टोरेज, रेल नेटवर्क और उससे तुरत-फुरत अनाज अपने ही बंदरगाह पहुंचा अंतरराष्ट्रीय जिंस, कॉमोडिटी बाजार में सौदा करने, बेचने का ढांचा तैयार किए हुए है। ऐसी किसी दूसरे घराने-सेठ की तैयारी जब नहीं है तो कृषि सुधार के ये बिल किसके लिए सोने की खान हैं? अडानी अस्सी के दशक से वैश्विक जिंस बाजार में सट्टे का अनुभव लिए हुए हैं। मतलब सप्लाई-डिमांड के खेल के साथ जिंस बाजार के सट्टे, मुनाफे सब में गुरू हैं तो वे क्यों नहीं अपनी मोदी सरकार से कृषि के वे सुधार करवाएगें, जिससे विश्व डिमांड के अनुसार उत्पाद हो, जितना चाहें अपना भंडार बनाएं और कीमत-मुनाफे के खेल में अपने को और खरबपति बनाएं?

दलील है कि अंबानी-अडानी की कारपोरेट खेती से किसान भी अमीर होंगे। तब कोई जवाब दे कि क्या पेप्सी कंपनी की कांट्रेक्ट खेती या ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा कराई नील की खेती से किसान अमीर हुए? इन नए कृषि कानूनों में अंबानी-अडानी का मकसद छुटकर मुनाफे वाले आढ़तियों को आउट कर सरकार की जगह अपनी खरीद, अपनी दुकानों से खाद्यान बेचने, अपने स्टोरेज से कृषि जिंस की जमाखोरी और वैश्विक मंडी में अपनी दादागिरी से सट्टा खेलने के खुले खेल का वह लाइसेंस है, जिनके आगे जरा सोचें कि बेचारे किसानों की क्या औकात रहेगी? जब अंबानी के आगे नुस्ली वाडिया, वोडाफोन जैसे देशी-विदेशी सेठ और अडानी की दादागिरी के आगे मुंबई एयरपोर्ट के मालिक रेड्डी अपने को बचा नहीं सके तो पंजाब का किसान हो या यूपी का गन्ना पैदा करने वाला या महाराष्ट्र का प्याज पैदा करने वाला किसान कैसे अपनी खुद्दारी, ‘उत्तम खेती’, और अपनी जमीन को बचा पाएगा? तभी तीनों कानून देश की साठ प्रतिशत आबादी, किसानी पर अंबानी-अडानी, क़ारपोरेट का परोक्ष मालिकाना बनवाने वाला है, जिसमें एक बार किसान फंसा तो न घर का रहेगा न घाट कर। तभी तो किसान तीनों कृषि बिलों को मौत का वारंट मान रहा है। (जारी)

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By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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