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फिर शुरू किसान आंदोलन

किसानों को संभवतः यह महसूस हुआ है कि उनके पास अपनी मांगें मनवाने का एक कारगर मॉडल है। एक समय आम आदमी पार्टी ने इस मॉडल का समर्थन किया था। लेकिन अब मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि किसानों का आंदोलन गैर-जरूरी है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को अब अहसास हुआ होगा कि सत्ता में ना रहने पर समाज के किसी भी वर्ग के असंतोष और आंदोलन का समर्थन करना कितना आसान होता है। उधर पंजाब के किसानों को भी यह अहसास हो रहा है कि कोई पार्टी सिर्फ नाम रख लेने भर से आम आदमी की समर्थक नहीं हो जाती। इन अहसासों का कारण पंजाब खड़ा हुआ ताजा टकराव है। पंजाब के सैकड़ों किसान अब राज्य के बाहरी इलाके चंडीगढ़ बॉर्डर पर जुट गए हैं। उनका ये जुटाव उसी तर्ज पर है, जिसके जरिए उन्होंने केंद्र सरकार को तीन कृषि कानूनों को वापस लेने पर मजबूर किया था। इस बार उनकी एक मांग गर्मी के कारण गेहूं की फसल की बर्बादी झेलने वाले किसानों को 500 रुपये प्रति क्विंटल का मुआवजा देने की है। उनकी अन्य प्रमुख मांगों में मक्का, बासमती और मूंग की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा शामिल है, जिसका चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने वादा किया था। किसानों को इस बात पर भी आपत्ति है कि राज्य सरकार ने अचानक 18 जून से धान की रोपाई शुरू करने का आदेश जारी कर दिया।

मंगलवार को किसानों ने पंजाब सरकार के खिलाफ मार्च निकाला और चंडीगढ़ की ओर जाने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। जिसके बाद किसान चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर ही धरना देकर बैठ गए। इसके पहले पिछले हफ्ते पंजाब के बिजली मंत्री हरभजन सिंह के साथ किसान यूनियन की बातचीत विफल हो गई थी। उसके बाद यूनियन नेताओं ने धरने की घोषणा की थी। धरने पर बैठे किसान अपने साथ राशन, गैस सिलेंडर, खाना पकाने का सामान, बिस्तर और कूलर लेकर आए हैं। जाहिर है, उनका इरादा लंबे समय तक डेरा डालने का है। किसानों को संभवतः यह महसूस हुआ है कि उनके पास अपनी मांगें मनवाने का एक कारगर मॉडल है। एक समय आम आदमी पार्टी ने इस मॉडल का समर्थन किया था। लेकिन अब मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा है कि किसानों का आंदोलन गैर-जरूरी है। अब अगर किसान इसे वादाखिलाफी मान रहे हों, तो इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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