यह देश का आंदोलन है!


केंद्र सरकार क्या किसान आंदोलन को इसी तरह चलते रहने देगी? दो अक्टूबर या उससे आगे तक? यह लाख टके का सवाल है, जिसका जवाब किसी के पास नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहल करके कह चुके हैं कि सरकार बातचीत के जरिए समाधान निकालने को तैयार है तो दूसरी ओर किसान संगठनों ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे प्रधानमंत्री की गरिमा का सम्मान करते हैं और बातचीत के लिए तैयार हैं। इसके बावजूद बातचीत नहीं शुरू हो रही है। प्रधानमंत्री ने 30 जनवरी को कहा था कि सरकार एक फोन कॉल की दूरी पर है। हैरानी की बात है कि नौ दिन बाद भी वह फोन कॉल न आई है और न गई है, जिससे किसानों और सरकार के बीच की दूरी मिटे। उलटे सरकार की ओर से ऐसे बयान दिए गए हैं, जिससे किसान नाराज हुए हैं और दूरी बढ़ी है।

केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि यह आंदोलन एक राज्य का आंदोलन है। शनिवार को किसानों द्वारा चक्का जाम किए जाने के बाद सरकारी प्रबंधन के जरिए यह प्रचार किया गया कि ‘यह देश का आंदोलन नहीं है’। एक साथ सरकार और पार्टी के तमाम नेता, प्रवक्ता और यहां तक मीडिया खास कर टेलीविजन पत्रकारों का एक बड़ा समूह शनिवार को यह ट्विट करने लगा कि ‘यह देश का आंदोलन नहीं है’। ऐसा लगा, जैसे एक सिंगल कमांड से यह लाइन जारी की गई है और कहा गया है कि सारे लोग इसे दोहराएं। किसान नेताओं ने चुनिंदा पत्रकारों की बातों पर तो ध्यान नहीं दिया पर कृषि व किसान कल्याण मंत्री तोमर की बात का उनको बुरा लगा है। वे इस बात से नाराज हैं कि तोमर ने किसानों के देशव्यापी आंदोलन को एक राज्य का आंदोलन कहा।

तोमर ने तथ्यात्मक रूप से गलत बात कही है कि यह एक राज्य का आंदोलन है। दिल्ली में बैठे किसी व्यक्ति की दूर की नजर खराब भी हो तब भी उसे दिखाई देगा कि दिल्ली से सटे कम से कम चार राज्यों में यह आंदोलन बेहद सघन हो गया है। पंजाब और हरियाणा के साथ साथ अब उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी किसान आंदोलन तेजी से फैला है। गणतंत्र दिवस की घटना के बाद हरियाणा की सीमा की बजाय आंदोलन का केंद्र उत्तर प्रदेश की सीमा पर शिफ्ट हो गया। राकेश टिकैत किसान आंदोलन का नया चेहरा बन गए। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फनगर, शामली सहित कई जिलों में सरकार की रोक और पुलिस की सख्ती के बावजूद बड़ी महापंचायत हुई और किसानों से आंदोलन में शामिल होने को कहा गया। गणतंत्र दिवस के बाद जो आंदोलन खत्म होने की कगार पर पहुंच गया था वह सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की वजह से पुनर्जीवित हुआ और आज पहले से ज्यादा मजबूत हो गया। फिर कैसे कृषि मंत्री कह सकते हैं कि किसानों का आंदोलन सिर्फ एक राज्य का है?

किसानों के चक्का जाम के आह्वान के बाद कृषि मंत्री ने यह बात कही। उसके बाद ही ‘यह देश का आंदोलन नहीं है’, अभियान भी शुरू हुआ। क्या कृषि मंत्री को तीन घंटे के चक्का जाम की सफलता की जानकारी नहीं मिली या उन्होंने सोच समझ कर झूठ बोला? किसानों ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को चक्का जाम से बाहर रखा था लेकिन इनके अलावा कम से कम तीन राज्यों- पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में चक्का जाम का जबरदस्त असर दिखा। तीन घंटे तक इन राज्यों के ज्यादातर राजमार्ग बंद रहे। सुदूर दक्षिण में भाजपा शासित कर्नाटक में बड़ी संख्या में किसान सड़कों पर उतरे और चक्का जाम किया। तेलंगाना और तमिलनाडु में भी इसका असर दिखा और बिहार, बंगाल में भी इसका असर दिखा। इसके बावजूद किसान कल्याण मंत्री का कहना है कि यह एक राज्य का आंदोलन है!

किसानों के इस देशव्यापी आंदोलन को एक राज्य का आंदोलन बताने का जो विमर्श भाजपा और केंद्र सरकार खड़ा कर रहे हैं उससे उसको कोई फायदा नहीं होने वाला है। उलटे देश को बड़ा नुकसान हो सकता है, जिसकी ओर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने इशारा किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन लंबा चलता है तो पंजाब में विभाजन के बीज फिर से अंकुरित हो सकते हैं। उन्होंने इशारों में यह बात कही लेकिन सरकार के रवैए और मंत्रियों के बयानों से लग रहा है कि वे जान बूझकर इस आंदोलन को एक राज्य यानी पंजाब और एक कौम यानी सिख का आंदोलन बताने में लगे हैं। इससे सरकार के समर्थकों को आंदोलन को खालिस्तानी साबित करने का मौका मिलता है। इससे सरकार को भी यह मौका मिलता है कि आंदोलन का समर्थन करने वाले हर विदेशी को खालिस्तान समर्थन बताया जा सके। हो सकता है कि वक्ती तौर पर सरकार को इससे कोई फायदा मिल जाए, लेकिन दीर्घावधि में यह देश के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

सरकार को जान बूझकर उन जख्मों को नहीं कुरेदना चाहिए, जो वक्त के साथ भर गए हैं। गनीमत है कि अभी तक इशारों में कहा जा रहा है कि यह एक राज्य का आंदोलन है। जैसे संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों को कपड़े से पहचानने की बात कही गई थी उस तरह अभी तक किसान आंदोलनकारियों को उनके पहनावे से पहचानने की बात नहीं कही गई है। पर यह बात अलग अलग तरीके से कही जा रही है। दिल्ली की सीमा पर बैठे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों के किसानों को खालिस्तानी रंग में रंगने का प्रयास चल रहा है। अगर सरकारी प्रयास इसी तरह जारी रहा तो किसान आंदोलन अपनी रफ्तार से देश के दूसरे राज्यों में फैलता रहेगा पर पंजाब में इसकी दिशा बदल सकती है। इस देश की एकता और अखंडता को बचाने के लिए सरकार को यह नैरेटिव बदलना होगा कि यह एक राज्य या एक कौम का आंदोलन है और इसका मकसद सरकार को कमजोर करना और देश की एकता खंडित करना है। उसे ईमानदारी से इसे किसान आंदोलन के रूप में स्वीकार करना होगा और इसका समाधान निकालने के लिए गंभीर प्रयास करना होगा।

इसके लिए सबसे पहली जरूरत यह है कि सरकार इन कृषि कानूनों के जरिए किसानों का भला करने की जिद छोड़े और स्वीकार करे कि धारणा के स्तर पर वह कृषि कानूनों की लड़ाई हार चुकी है। किसान कल्याण मंत्री ने संसद में कहा कि किसान यूनियन उनको आज तक नहीं समझा पाए हैं कि कृषि कानूनों में क्या काला है। सवाल है कि जब कृषि व किसान कल्याण मंत्री को पता ही नहीं है कि कानूनों में क्या काला है तो वे क्या बदलने का प्रस्ताव किसानों को दे रहे हैं? सरकार ने तीनों कृषि कानूनों में कोई एक दर्जन प्रावधानों को बदलने का लिखित वादा किसानों से किया है। अगर कानून में गड़बड़ी नहीं है तो सरकार क्यों उसे बदलने पर राजी हो रही है? जाहिर है कृषि मंत्री ने या तो किसानों से झूठ बोला है या संसद में गलतबयानी की है।

बहरहाल, सरकार को ईमानदारी से यह स्वीकार करना चाहिए यह आंदोलन देश के बड़े हिस्से में फैल गया है, देश का आंदोलन बन गया है और अगर सरकार अपनी जिद पर अड़ी रहती है तो इसका बड़ा खामियाजा देश को भुगतना पड़ सकता है। सरकार को यह भी स्वीकार करना चाहिए कि कृषि कानूनों के जरिए किसानों का कल्याण करने का जो विमर्श उसने खड़ा किया है वह विफल हो चुका है। किसान या तो इन कानूनों के विरोध में हैं या चुप बैठे हैं। इसके समर्थन में कहीं से किसानों की आवाज नहीं आ रही है। कानूनों का समर्थन करने वाले जो कथित किसान  संगठन सरकार से या सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी से मिल रहे हैं उनके नाम तक जाहिर नहीं किए जा रहे हैं। एक तरफ सरकार की जिद है तो दूसरी ओर किसान आंदोलन है, जिसका हर दिन दायरा बढ़ रहा है और नए आयाम भी जुड़ रहे हैं। तभी सरकार को अपनी साख बचाने के लिए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है, लोकतंत्र के तकाजे में भी इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है और देश की एकता-अखंडता के नजरिए से भी इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।


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