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जवाब की जरूरत है

इस बात पर ध्यान दें कि पिछले चार साल में कई अरब रुपये खर्च करने के बावजूद खेतों में फसल कटाई के बाद लगाई जाने वाली आग से होने वाले प्रदूषण को कम नहीं किया जा सका है। जबकि 2018 में भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने का पूरे जोर शोर से एलान किया था। farmers stubble burning pollution

दिवाली से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बढ़े प्रदूषण की मात्रा में मामूली गिरावट के बाद एक बार फिर समस्या सघन हो गई है। शुक्रवार और शनिवार को दिल्ली और एनसीआर पर घना स्मॉग छाया रहा। अब प्रदूषण पर नजर रखने वाली सरकारी एजेंसी सफर ने कहा है कि इसकी वजह आसपास के राज्यों में किसानों का पराली जलाना है। हालांकि यह बात भी उन्होंने ही बताई है कि एनसीआर के प्रदूषण में पराली जलाने के कारण आए धुएं का हिस्सा 35 फीसदी ही है। यानी 65 प्रतिशत परिवहन और पटाखों की वजह से है। बहरहाल, अभी हम पराली की समस्या पर गौर करें। इस बात पर ध्यान दें कि पिछले चार साल में कई अरब रुपये खर्च करने के बावजूद खेतों में फसल कटाई के बाद लगाई जाने वाली आग से होने वाले प्रदूषण को कम नहीं किया जा सका है। 2018 में भारत सरकार ने इस समस्या से निपटने का पूरे जोर शोर से एलान किया था। किसानों को धान के भूसे से निपटने के लिए मदद करने के वास्ते एक फंड स्थापित किया गया। चार साल में इस फंड में 22.49 अरब रुपये खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन किसानों को आग लगाने से रोककर हवा की गुणवत्ता में सुधार की कोशिश कामयाब नहीं हो पाई है।

किसानों ने मीडिया से कहा है कि इस योजना में कई खामियां हैं, जिन्हें अधिकारी दूर नहीं कर पाए। उनके मुताबिक भूसा हटाने के लिए जो मशीन सुझाई गई है, उसकी कीमत इतनी ज्यादा है कि वे ना उसे खरीद पा रहे हैं ना किराये पर ले पा रहे हैं। यानी कागजों पर तो सरकार की सब्सिडी की यह योजना अच्छी है, लेकिन व्यवहारिक समस्याओं का हल इससे नहीं निकला है। कुछ सरकारी अधिकारियों ने मीडिया से बातचीत में माना है कि योजना का असर नहीं हुआ है। तो इस बारे में जवाब कौन देगा? एनसीआर के लोगों को जो सेहत का नुकसान और दूसरी दिक्कतें हो रही हैं, उसकी जवाबदेही कौन लेगा? गौरतलब है कि सब्सिडी तो केंद्र सरकार से मिलती है। इसके अलावा पंजाब सरकार भी फसल के बचे हुए हिस्से के प्रबंधन पर 10.45 अरब रुपये खर्च चुकी है। लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात हैँ। इसकी वजह इस योजना का खराब डिजाइन है। किसानों का कहना है कि मशीन के तीन के साथ तीन ट्रैक्टर और दो ट्रॉली भी खरीदनी पड़ती हैं। सब्सिडी में ट्रैक्टर ट्रॉली की कीमत शामिल नहीं है।

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