यह पशुता नहीं तो क्या? - Naya India father stan swamy
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यह पशुता नहीं तो क्या?

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मैं बतौर हिंदू शर्मसार हूं। बहुत विचलित और निराश! हम हिंदुओं को यह कहना छोड़ देना चाहिए कि धर्म की जीत हो, अधर्म का नाश हो। कैसे आरएसएस और उसके मोहन भागवत, दत्तात्रेय, अरूण कुमार और प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह बतौर हिंदू यह जस्टिफाई कर सकते हैं कि लगभग बहरा, पार्किंसन्स की बीमारी में कंपकंपाता 84 साल का बूढ़ा देश (हिंदुओं) और उनके हिंदू राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा था! इसलिए हमारा राष्ट्र धर्म, हिंदू धर्म है जो एनआईए के पुलिसिया अफसरों ने father stan swamy को जेल में डाला और बिना इलाज के मरने दिया। भला ऐसी शिक्षा-ऐसी समझ किस हिंदू शास्त्र से है? हम मानवता के सनातन धर्म की जीत के पालक हैं या पशुता के?

तभी स्टेन स्वामी की मौत हिंदुवादियों की राजसत्ता का कलंक है। यह न धर्म है, न संविधान है और न कानून-व्यवस्था व सभ्य कौम का इंसान होना। हर हिंदू को (यदि वह धर्म की जीत, अधर्म का नाश और मानवता की जय में आस्था रखता हो), हर उस हिंदू को ग्लानि, गुस्से में प्रायश्चित करना चाहिए जो मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भगवान मानते हैं। क्या राम के आदर्शों वाले रामराज्य में, धर्म और जीवन की हिंदू व्याख्या में स्टेन स्वामी की मौत का सत्य पशुता नहीं है?

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मुझे समझ नहीं आ रहा है कि भागवत, दतात्रेय, मोदी, शाह, डोवाल आंखों पर कैसी हिंदू पट्टी बांधे हुए हैं, जो इतनी सुध नहीं कि उनकी करनियों से आधुनिक दुनिया में हिंदू होना बुरा बन रहा है। कभी अखलाक की लिंचिंग, कभी एक 23 साला लड़की को टूलकिट में देशद्रोही करार देना तो कभी गंगा में लाशों के बहने या हिंदू लाशों को टायर-घासलेट में फूंकने की फोटो, कभी कश्मीर में लगातार महीनों इंटरनेट बंद रखने की चर्चा तो कभी ट्विटर पर थानेदारी और कभी नताशा, देवांगना जैसी सहज आंदोलनकारियों को देशद्रोही धाराओं में जेल में डालने के एक के बाद एक मामले क्या भारत को दुनिया में बदनाम बनवाने वाले नहीं हैं? हां, हकीकत है दुनिया के तमाम वैश्विक थिंक टैंक व अमेरिका, ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देश लगातार अब सोचते हुए हैं कि जिस भारत में मानवाधिकारियों, पीयूसीएल जैसे संगठन, बूढ़ों-नौजवानों-आंदोलनकारियों के लिए जगह नहीं है उसे कैसे लोकतंत्र के तकाजे में चीन और पाकिस्तान से अलग मान उसकी मदद करें!

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क्या नरेंद्र मोदी और अजित डोवाल राष्ट्रपति बाइडेन या उनके अधिकारियों के आगे जस्टिफाई कर सकते हैं कि फादर स्टेन स्वामी शहरी नक्सलवाद वाले कम्युनिस्ट थे? 84 साल की उम्र में भी यह बूढ़ा देश को अस्थिर बनाने वाला खतरा था! आदिवासियों में धर्मांतरण करवा रहा था! क्या है कोई प्रमाण? और यदि है तब भी मनुष्य होने के नाते क्या हिंदू का यह मानव धर्म नहीं है जो एक बूढ़े आदमी के पार्किंसन्स से कांपते हाथों में पानी पीने के लिए ‘स्ट्रॉ’ और ‘सिपर’ दे! कैसा वीभत्स-घिनौना है यह तथ्य कि इस बूढ़े को मोदी सरकार ने अक्टूबर में कस्टडी में लिया था लेकिन एनआईए ने पूछताछ के लिए उसकी पुलिस हिरासत नहीं मांगी। कोर्ट की कस्टडी में जेल में डाला। और जब महाराष्ट्र की तलोजा जेल में बंद स्टेन स्वामी ने बीमारी के हवाले अदालत में याचिका दायर करके ‘स्ट्रॉ’ और ‘सिपर’ की मांग की थी तो एनआईए ने अदालत से कहां कि वो यह नहीं दे सकते।

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क्या इस सबकी खबर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अजित डोवाल ने नहीं थी? इतना ही नहीं गंभीर बीमारी में हाई कोर्ट में जब स्टेन स्वामी ने अंतरिम जमानत देने का अनुरोध करते हुए कहा कि अगर ऐसा ही रहा तो वे ‘बहुत जल्दी मर जाएंगे’ तो इस पर एनआईए ने हलफनामा दायर कर न केवल जमानत याचिका का विरोध किया, बल्कि बताया कि उनकी बीमारी के ‘ठोस सबूत’ नहीं हैं। सोचें, कैसी पशुता जो पूछताछ की जरूरत नहीं फिर भी बुजुर्ग को गिरफ्तार करके जेल में डालो। बेल नहीं होने दो। जेल में न बुढ़ापे का लिहाज और न बीमारी की चिंता। अदालत इसलिए लाचार क्योंकि देशद्रोही वाली धाराएं और सरकार जिद्द पर अड़ी हुई कि जमानत न दो। तभी यशवंत सिन्हा का यह गुस्सा गलत नहीं कि उनकी मौत “हत्या” है।

क्यों ऐसा होने दिया गया? क्या इसलिए कि अपढ़ हिंदू यह सोच कर दिवाने हों कि वाह मोदीजी आपने राष्ट्रीय सुरक्षा में, हिंदुओं की रक्षा में आदिवासियों का धर्मांतरण कराने वाली ईसाई लॉबी और वामपंथियों-सेकुलरों-मानवाधिकारियों को औकात दिखला दी! बोलो, भारत माता की जय!

पता नहीं भारत माता क्या सोचती हुई होंगी? एक वक्त आरएसएस, नरेंद्र मोदी, अमित शाह भी अन्याय, अमानवीयता, पशुता का रोना रोते हुए थे। वे उसी के हवाले हिंदुओं को जगाते हुए थे। आईपीएस पुलिसिया अफसरों ने तब नरेंद्र मोदी और अमित शाह को रूलाने का हर रगड़ा मारा था। उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल अभी जिस केंद्रीय पुलिस एजेंसी, एनआईए से बूढ़े लोगों, नौजवान लड़के-लड़कियों को राष्ट्रद्रोह, देश की अस्थिरता का दोषी, आंतकी, अर्बन नक्सलवादी करार दे कर झूठे जेल में डलवाए हुए हैं उसी एजेंसी ने कांग्रेस के राज में हिंदू आतंकवाद का झूठ फैलाने के लिए साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसों से पशुतापूर्ण बरताव किया था। तब या तो उसके बदले की पशुता है या यह वह दिवालियापन है, जिसका अल्टीमेट नुकसान हर हिंदू को देश के अंदर और विदेश में होना है!

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हां, आरएसएस, भाजपा और नरेंद्र मोदी, अमित शाह कालजयी नहीं हैं। ये सदैव सत्ता में नहीं रहेंगे। सत्ता में लगातार वह सिस्टम रहना है, वे कोतवाल, वे आईपीएस रहने हैं, जिनमें यह मामूली मानवीय संस्कार नहीं, सत्य पर अडने का साहस नहीं कि नौजवान महिला साध्वी या एक 23 साला दिशा रवि को कैसे हिंदू आंतकवादी या देशद्रोही करार दें? यही हिंदू अनुभव का सनातनी सत्य है। मुगलों के राज में भी दिल्ली की चांदनी चौक का कोतवाल हिंदू नागरिकों-सेठों को मुर्गा बना बैठाए रखता था तो नरेंद्र मोदी भी दसियों घंटे पानी पी-पी कर पुलिसिया झूठ की जबरदस्ती के आगे जवाब देते हुए थे। वे और अमित शाह झूठ के सिस्टम की पशुता को कम झेले हुए नहीं हैं। गनीमत थी जो तब कांग्रेस और चिदंबरम ने पुलिस से गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, (यूएपीए) की धाराओं की एफआईआर बनवा कर मोदी-शाह को लपेटे में नहीं लिया। पर लेना असंभव नहीं था। इसलिए कि भारत का कोतवाल हमेशा लाल किले के काल से बादशाह की मंशा और इच्छा बूझ कर काम करता है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह आज यदि अधिक बेशर्मी व बदला लेने के अंदाज में काम कर रहे हैं तो वैसा चिदंबरम भी कर सकते थे। इसलिए मोदी-शाह, आरएसएस-भाजपा का क्या यह पहला राष्ट्र-हिंदू धर्म नहीं होना चाहिए कि सदियों की कोतवाल गुलामी से हिंदू जीवन को आजाद, गरिमापूर्ण बनवाएं! वे सिस्टम को सुधारें न कि सिस्टम में पशुता बनवाएं।

मैं लगातार मनुष्य से मनुष्य की तरह व्यवहार के मानवाधिकारों का हिमायती रहा हूं। इस विश्वास में रहा हूं कि लोकतंत्र से बेहतर कुछ नहीं और उसमें यदि बहुसंख्यकों को भाव नहीं है तो न कौम बन सकती है और न देश। यह भी मानता रहा हूं कि भारत में हिंदू की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और इतिहास की ग्रंथियों को समझे-सुलझाए बिना राष्ट्र बन नहीं सकता। तभी आरएसएस, भाजपा, नरेंद्र मोदी, अमित शाह आदि जिन दिनों अछूत थे और हिंदू आंतकवाद, काली-सफेद दाढ़ी के झूठे नैरेटिव में फंसे हुए थे तब मैं कांग्रेस, वामपंथियों, सेकुलरों को चेताते हुए था कि यह हिंदू भावनाओं को भड़काना-पकाना है। इसी ‘नया इंडिया’ में, इसी पहले पेज पर आठ-नौ साल पहले साध्वी प्रज्ञा-कर्नल पुराहित, हिंदू आंतकवाद के नैरेटिव को, इसरत जहां जैसे मामलों में अमित शाह को फंसाए जाने जैसे प्रकरणों के खिलाफ मैंने लिखा था। तब में साध्वी-कर्नल पुरोहित के साथ एनआईए की अमानवीयता पर लिखते हुए था और आज?…. 84 वर्षीय फादर स्टेन स्वामी पर!

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सचमुच मुझे वह वक्त याद आ रहा है जब मुंबई हमलों के बाद सन् 2008 में चिदंबरम ने आतंकवाद मामलों की जांच के लिए नई एजेंसी एनआईए के गठन का आइडिया बनाया था तो मैंने अपने गपशप कॉलम में लिखा और ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम में डिस्कस किया था कि नई पुलिसियां एजेंसी से उलटे गड़बड़ी होनी है। वह सोचना कुछ ही समय बाद कथित हिंदू आंतकवाद के मामलों से सही साबित हुआ। लेकिन तब कांग्रेस-सेकुलर-वामपंथी दुनिया में हिंदू आंतकवाद की बदनामी बनवाते हुए थे और अब हिंदुवादी सरकार उसी एजेंसी से हिंदुओं की, भारत की बदनामी करवाती हुई है।

तब भी हिंदू की बदनामी और आज भी हिंदू की बदनामी। तब चिदंबरम थे और आज अमित शाह हैं। दोनों ने अपने आपको न जाने क्या साबित करने के लिए हिंदू को जेल में सड़ाया और हिंदुओं की वैश्विक बदनामी! लिबरल हिंदू और हिंदुवादी हिंदू दोनों के राज में कोतवाल सिस्टम वाली पशुता का स्थायी सिलसिला।

क्या मैं गलत लिख रहा हूं?

इसलिए चिदंबरम, कांग्रेस और प्रगतिशील जमात को भी सोचना चाहिए कि उन्होंने सिस्टम में झूठ-दमन और पशुता के लिए जो किया क्या वह सही था? तो आरएसएस, नरेंद्र मोदी, अमित शाह को समझना चाहिए कि वे जो कर रहे हैं वह भारत का, हिंदुओं का मान-सम्मान बनवाने वाला नहीं है, बल्कि कालिख पुतवाना है। वक्त जब बदलेगा तो इसी एनआईए से वापिस हिंदू विचार का कोई बूढ़ा, एक्टिविस्ट, मानवाधिकारी वैसे ही मरेगा, जेल में सड़ेगा जैसे फादर स्टेन स्वामी मरे हैं और असंख्य एक्टिविस्ट, नागरिक अभी जेलों में हैं। ऐसा ब्रिटेन, अमेरिका या किसी भी सभ्य लोकतंत्र में नहीं होता। क्यों? यही तो फर्क है गुलाम-पशु सभ्यता बनाम मानवीय सभ्यता में! भारत राष्ट्र-राज्य में, खासकर मौजूदा हिंदू राष्ट्र में आए दिन पशुता के अनुभवों में यदि हम गुजरते हुए हैं और बाकी सभ्य सभ्यताओं में ऐसा नहीं है तो आरएसएस, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अजित डोवाल को क्या ये बेसिक मानवीय संस्कार सिस्टम में नहीं बनवाने चाहिए कि बूढ़े बीमार को यों ही जेल में न डाला जाए। मासूम लड़की दिशा या नताशा जैसी नौजवान जिंदगियों को बिना ठोस प्रमाण के जेल में नहीं रखा जाए। हम हिंदुओं के देश को मानवीय और सभ्य बनाए।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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