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त्योहार भूलें, घर बैठें

यदि आप मनुष्य हैं तो मोदी सरकार के झांसे में कतई नहीं आएं। न फिल्म देखने सिनेमा हॉल जाएं और न बच्चों को स्कूल भेजें। आज से नवरात्रि है तो घर बैठ कर पूजा-पाठ करें। न मंदिर की लाइन में खड़े होना चाहिए और न रामलीला आयोजन करें या उसे देखने वरावण दहन में जाएं। न दुर्गापूजा, दशहरा, दिवाली, धनतेरस की खरीदारी की भीड़ बनाएं और न खरीदारी करें। न सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें और न उसकी घोषणाओं पर। आपको ईश्वर ने बुद्धि दी हुई है तो बुद्धि इस सत्य को उद्घाटित किए हुए है महामारी सभी तरफ व्याप्त है। हम उस महामारी में जी रहे हैं, जिसके आगे विकसित-अमीर देश भी लाचार हैं। उन देशों में जब वायरस लगातार, बार-बार फूट रहा है और दुनिया चार करोड़ लोगों के संक्रमण की संख्या की और बढ़ रही है तो भारत में तो हम लोग सर्वाधिक असुरक्षित हैं। बुद्धि के कोने में इस तथ्य को पैठाए रखें कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। यह भी सोचे रखें कि बिहार के विधानसभा चुनाव में क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह वैसे घूमते, जनसभाओं में भाषण करते दिख रहे हैं, जैसे सन् 2015 के विधानसभा चुनाव में थे! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तमाम मंत्री घरों में घुसे हुए हैं। ये घर में बैठ, आभासी, वर्चु्अल तौर-तरीकों से भारत सरकार को चला रहे हैं। वायरस से कई मंत्री-सांसद-विधायक मर चुके हैं और असंख्य अस्पतालों में हैं या अस्पतालों में भर्ती रह कर लौटे हुए हैं।

इस सबको लिखने की जरूरत इसलिए है क्योंकि भारत सरकार मौत के कुएं को चारों तरफ से अनलॉक कर दे रही है। त्योहारों के नाम पर, वायरस को घटता बतला कर लोगों को फुसलाने के लिए सिनेमा हॉल का आकर्षण बना दिया है तो सैर-सपाटे के लिए रेल परिवहन आदि से लोगों को भेड़-बकरी की तरह महामारी के कुएं में कूद पड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इसलिए कि लोग घरों से बाहर निकलेंगे, सामान्य दिनों की तरह त्योहार-उत्सव मनाएंगे तो सरकार की कमाई बनेगी। सरकार दिवालिया है। उसका पूरा साल मतलब वर्ष 2020-21 की रेवेन्यू 15 अक्टूबर से 15 जनवरी के तीन महीनों में लोगों को महामारी के मध्य जश्न में झोंकने से होनी है। लोग मरें तो मरें, लोग बीमार हो कर बरबाद होते हों तो हों सरकार को तो अस्पताल, दवा-दारू की खरीद से ले कर दीये जलवाने तक की कमाई चाहिए।

तभी भारत दुनिया में बेशर्मी और झूठ का वैश्विक रिकार्ड बनाने की ओर है। दुनिया के हर देश में सर्दियों के आते महामारी को ले कर चौकन्नापन्न है। यूरोप का हर देश, हर तरह का प्रशासन एक-एक दिन को मॉनिटर कर लॉकडाउन, कर्फ्यू जैसे फैसले ले रहा है और सब तरफ संक्रमण की संख्या बढ़ रही है वहीं भारत में सरकारे आंकड़े घटा रही है। रैपिड टेस्ट आदि के झांसों से देश में टेस्टिंग के नाम पर धूल में लट्ठ में वह कर दे रही है, जिससे देश उस दुष्चक्र की और बढ़ेगा, जिससे न केवल गांव-गांव, धाणी-धाणी वायरस फैलेगा, बल्कि चुपचाप वह ऐसे पकेगा कि उसका मवाद जब फूटेगा तो सन् 1918-20 की महामारी के किस्से भी हल्के लगने लगेंगे।

क्या गजब बात है कि अंग्रेजों ने भारत के लोगों को महामारी से डराने का अभियान चला कर लोगों को समझाना चाहा था कि लापरवाही नहीं बरतें। बावजूद इसके भारतीयों की लापरवाही से तब करोड़ों लोग मरे। आज उलटा है सरकार ने हल्ला-प्रचार बनवाया है कि चिंता न करो सिनेमा देखने जाओ। जिम करो, मॉल जाओ, सैर-सपाटा करो, मेट्रो में सफर करो। दुनिया के तमाम सभ्य देशों में फरवरी से अब तक हर दिन के अनुभव अनुसार महामारी से लड़ने की दिन-प्रतिदिन रणनीति बनती है। मतलब कभी लॉकडाउन और कभी अनलॉक। संक्रमण आंकड़ा बढ़ा तो पाबंदी और घटा तो फिर छूट। चीन के किसी प्रांत में संक्रमण के 16 मामले आए तो 24 घंटे में तीस लाख टेस्ट और तीन दिन में कंट्रोल। जर्मनी, फ्रांस, आदि यूरोप के तमाम देश सर्दियों की शुरुआत में संक्रमण बढ़ने की वैज्ञानिकों की थीसिस में चौकन्ने हो टेस्टिंग की एप्रोच में हैं। नतीजों में ज्योंहि आंकड़े बढ़े त्योंहि लॉकडाउन, कर्फ्यू, आवाजाही पर रोक।

ठीक विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने वायरस शुरू हुआ तब तो होली नहीं मनाने की घोषणा हुई और अब प्रतिदिन 60 हजार के आंकड़े में भी लोगों से आह्वान की त्योहार मनाओ! भारत वह देश है, जब वैश्विक पैमाने के अनुसार मार्च-अप्रैल में भी टेस्ट नहीं के बराबर थे और आज भी या तो नहीं के बराबर हैं और जो हैं उसमें रैपिड टेस्ट किट के दिखावे वाली टेस्टिंग की भरमार से है। तब भी भारत भगवान भरोसे था और आज भी है। मोदी सरकार अब हर वह कोशिश कर रही है, जिससे लोग मान लें कि यह मलेरिया जैसी बीमारी है। मतलब सबको हर्ड इम्युनिटी वाले भेड़-बकरीजीवन का आदी बना डालो अपने आप वायरस खत्म हो जाएगा।

जो हो, अपना अपनों से, सुधी जनों से आग्रह है कि सरकार के झांसे में कतई नहीं आएं। अगले छह महीने सर्दियों के चलते और बरबादी है। जितना संभव हो घर में रहें और अपने को बचाएं। निःसंदेह इस बात पर मेरे लिए भी अमल कर सकना मुश्किल है लेकिन जितना संभव हो अपनी तह कोशिश करनी चाहिए।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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