आधी रोटी खाएं पर पहले बचें।

न आएं सरकार के बहकावे में। त्योहारी सीजन में न धंधा बनना है और न कमाई होनी है इसलिए बेहतरी है जीवन को पूरी तरह आधी रोटी की न्यूनतम जरूरत में दो-तीन साल के लिए बांध दें। भूल जाएं कि भारत जल्दी‘नॉर्मल दिनों’ में लौट आएगा और लोग घरों से निकलेंगे, सिनेमा ह़ॉल मे फिल्म देखने जाएंगे या पैसे ले कर निकलेंगे और त्योहारी खरीदारी होगी। अपना मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे सरकार को कंगला बनाया है वैसे अब वे लोगों की जमा पूंजी और भारत की कैपिटल मतलब दुकानदारों, सिनेमाहॉल मालिकों, स्कूल मालिकों से ले कर कल-कारखानों वाले उद्यमियों को और खाली करवा देने की तरफ बढ़ रहे हैं। सरकार का हर कदम आर्थिकी के ताबूत पर लगातार कीले ठोंकना है।

सोचें, इस बेसिक बात पर कि जब वैश्विक हल्ला वायरस का है तो जन्मजात डरपोक हिंदुस्तानी क्या वायरस के आगे बेखौफ हो सकते हैं? क्या वे पहले की तरह हवाई यात्रा कर रहे हैं? क्या पहले की तरह सिनेमा हॉल, शॉपिंग मॉल भरे हो सकते हैं? क्या खरीदारी पुराने मूड में लौट सकती है? कतई नहीं। तब इसका अर्थ है कि जो उद्यमी सिनेमा हॉल खोल कर बैठेगा वह घाटा खाता जाएगा, बरबाद होगा। एयरलाइंस भले उद्यमी चला रहे हैं लेकिन इन्हें क्या अपनी कैपिसेटी जितने यात्री मिल रहे हैं? चांदनी चौक या जौहरी बाजार, सर्राफा बाजार, कनाट पैलेस में क्या वह ग्राहकी है, जिससे दुकानदार के किराये, बिजली, सेल्समेन आदि का खर्चा निकल जाए? दिखने को सब सामान्य दिखेगा, भीड़ दिखेगी, ग्राहक घूमते मिलेंगे लेकिन मांग नहीं, मुनाफा नहीं तो यह सिलसिला कितने महीने, कितने साल चल सकता है?

तभी अपनी शुरू से दलील है कि यदि महामारी (जिसे हमने पहले तो 21 दिन में ताली-थाली-दीये से खत्म कर दिया था।) है तो उससे टेस्ट, ट्रेस, रिस्पोंस के मूल मंत्र से लड़ना नंबर एक प्राथमिकता होनी चाहिए। उससे लगातार लड़ते हुए, कंट्रोल बनाए रख सरकार को नागरिकों में वर्गवार, जरूरत अनुसार न्यूनतम मदद से जिंदा रखना चाहिए और उसी अनुपात में आर्थिकी को चलाए रखना चाहिए। इसके उदाहरण में जर्मनी, स्वीडन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड से लेकर इटली, स्पेन जैसे मैं नाम बताऊंगा तो कहा जाएगा कि ये तो विकसित देश हैं हम और हमारी सरकार भला कैसे वैसी रीति-नीति अपना सकते हैं?तब बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड, पाकिस्तान जैसी रीति-नीति में ही मोदी सरकार चलती? आर्थिकी और कामधंधे तो चलते रहते!

दिक्कत यह है कि नरेंद्र मोदी ने नोटंबदी से लक्ष्मीजी की चंचलता को भारत में पहले से ही खत्म किया हुआ है। फिर बिना आगा-पीछे सोचे ऐसा लॉक़ड़ाउन बनाया, जिसमें न तो वायरस-इलाज के लिए टेस्ट-ट्रेंस-रिस्पोंस का स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर बना और न उस दौरान आर्थिकी पर असर का अनुमान लगा। इसे विदेश के उदाहरण से समझें। जर्मनी की चांसलर ने महामारी की चुनौती और आर्थिकी की चिंता पर सोच-समझ कर, बुद्धि के इस्तेमाल से जो रीति-नीति बनाई उससे दुनिया में सर्वत्र माना जा रहा है कि विकास दर भले गिरी रहे लेकिन वैक्सीन से सुरक्षा बनी नहीं कि जर्मनी वापिस सामान्य हो जाएगा।

बहरहाल, त्योहारी तिमाही में मोदी सरकार ने महामारी के कुएं को जैसे अनलॉक किया है उसके बहकावे में लोगों को, व्यवसायियों, पेशेवरों को नहीं आना चाहिए। वह खरीद होगी ही नहीं जो स्टॉकिस्ट त्योहारी सीजन में सामान स्टॉक करके रिकार्ड तोड़ बिक्री से पूरे साल का खर्चा निकाल लें। त्योहारी-शादी के पूरे सीजन में डिमांड न्यूनतम रहेगी। लोगों का मनोविज्ञान संभला, घबराया हुआ है तो आधी रोटी खा कर जिंदा रहना 138 करोड़ की नियति है तो समझदारी भी। फिर भले सरकार सरकारी कर्मचारियों को दस तरह के झुनझुने दे उसके बहाने देश के बहकाए कि त्योहारों का वक्त है सो खर्च करो। ऐसे झांसे में कतई न आएं। एक-एक पैसा बचाए रखें। कोई जरूरत नहीं है दीवाली पर गिफ्ट, मिठाई, पटाखों की सोचने की।

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