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वित्त मंत्री के दावे और हकीकत

दुनिया की सभी सरकारों का अपने कामकाज, पिछली सरकारों के कामकाज और विपक्ष के प्रति व्यवहार लगभग एक जैसा होता है। जैसे दुनिया की सभी सरकारें अपने बुरे कामों और गलत फैसलों को भी अच्छा कहती हैं। इसी तरह दुनिया की सभी सरकारें अपनी तुलना पिछली सरकारों के काम से करती हैं और अपने काम को बेहतर बताती हैं। दुनिया की सभी सरकारें कमियों का ठीकरा पहले की सरकारों पर फोड़ती हैं और उसके अच्छे कामों का श्रेय लेती हैं। दुनिया की सभी सरकारें विपक्ष को गैर जिम्मेदार बताती हैं, चाहे विपक्ष वहीं काम क्यों न कर रहा हो, जो सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष में रहते हुए किया हो। ये सब यूनिवर्सल नियम हैं और भारत की मौजूदा सरकार भी अपवाद नहीं है। फर्क सिर्फ डिग्री का है। मौजूदा सरकार ये सारे काम बहुत ज्यादा बड़े पैमाने पर कर रही है या ऐसे भी कह सकते हैं कि सिर्फ ये ही काम कर रही है। प्रधानमंत्री के भाषणों, मंत्रियों की प्रेस कांफ्रेंस और पार्टी प्रवक्ताओं की टेलीविजन बहसों को देख कर इसे समझा जा सकता है।

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक हालिया इंटरव्यू से एक नजीर बनती है कि कैसे आप अपनी सरकार की सबसे बड़ी विफलता को भी उपलब्धि बता सकते हैं या कैसे दूसरी सरकारों के अच्छे कामकाज को गलत ठहरा सकते हैं या कैसे अपने गलत फैसलों को डायनेमिक बता कर उसका बचाव कर सकते हैं। वित्त मंत्री ने पिछले दिनों अंग्रेजी के एक टेलीविजन चैनल को इंटरव्यू दिया। इसकी टाइमिंग का सवाल अहम है। खबर है कि प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद में फेरबदल और विस्तार करने वाले हैं। वित्त मंत्रालय में भी बदलाव की अटकलें काफी समय से लगाई जा रही हैं। इसलिए संभावित फेरबदल से पहले वित्त मंत्री के प्रेस कांफ्रेंस करने और देश में आर्थिक तबाही लाने वाली नीतियों की तारीफ करने का राजनीतिक मकसद भी हो सकता है। लेकिन उसे छोड़ें और वित्त मंत्री की कही बातों का बिंदुवार विश्लेषण करें तो उनके दावों और हकीकत में जमीन आसमान का फर्क दिखेगा।

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वित्त मंत्री ने दावा किया कि 2014 में एनडीए सरकार को ‘नाजुक अर्थव्यवस्था’ मिली थी और प्रधानमंत्री को चार साल लग गए इसे रिकवर करके सुधार करने में। उन्होंने बहुत स्पष्टता के साथ कहा कि 2014 में अर्थव्यवस्था नाजुक अवस्था में थी और 2018 तक प्रधानमंत्री ने उसे बेहतर किया। सोचें, देश की अर्थव्यवस्था 2014 में लगभग आठ फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही थी। मनमोहन सिंह की सरकार से 2014 में जब कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में गई थी उस समय देश की जीडीपी बढ़ने की दर 7.41 फीसदी थी, जो उससे पहले के साल यानी 2013 के मुकाबले 1.02 फीसदी ज्यादा थी। इसके बाद 2015 और 2016 में सकारात्मक ट्रेंड दिखा। 2015 में देश की अर्थव्यवस्था आठ फीसदी और 2016 में 8.26 फीसदी की दर से बढ़ी। जाहिर है अगर अर्थव्यवस्था नाजुक स्थिति में होती तो वह सकारात्मक दर से नहीं बढ़ रही होती। छह साल में पहली बार अर्थव्यवस्था में गिरावट का ट्रेंड 2017 में दिखा, जब जीडीपी में 1.21 फीसदी की गिरावट हुई। वह 2016 में किए गए नोटबंदी के फैसले का असर था। इसके बाद जो गिरावट का दौर शुरू हुआ वह अभी तक नहीं थमा है। 2018 में जीडीपी 0.92 फीसदी गिरी और 2019 में 1.94 फीसदी की गिरावट हुई। वित्त मंत्री के हिसाब से जब प्रधानमंत्री ने देश को नाजुक अर्थव्यवस्था के दौर से रिकवर करा दिया, उसके अगले साल यानी 2019 में देश की जीडीपी की दर 4.18 फीसदी रही। 2008 के बाद पहली बार विकास दर पांच फीसदी से नीचे रही। कोरोना वायरस की महामारी शुरू होने से पहले लगातार 12 तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट का ट्रेंड रहा। वित्त मंत्री के मुताबिक जब जीडीपी की दर तेजी से बढ़ रही थी तो वह नाजुक दौर था और जब गिरने लगी तो वह रिकवरी का दौर था!

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वित्त मंत्री ने यूपीए सरकार के आर्थिकी के जानकारों पर तंज करते हुए कहा कि यूपीए के ‘ग्रेट माइंड्स’ महंगाई नहीं रोक पाए थे। उनका दावा है कि इस सरकार ने महंगाई रोक दी है। ज्यादा पुराने आंकड़ों की बात नहीं करें तो अभी महंगाई के आंकड़े आए हैं। मई में खुदरा महंगाई छह फीसदी से ऊपर थी और थोक महंगाई करीब 13 फीसदी थी। यूपीए के जिन ग्रेट माइंड्स’ का उन्होंने मजाक उड़ाया उनके समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन तब भी देश में पेट्रोल की कीमत 80 रुपए प्रति लीटर से कम रही। आज कच्चे तेल की कीमत 72 डॉलर है और देश में पेट्रोल की कीमत 107 रुपए लीटर है। डीजल का दाम भी सौ रुपए की सीमा पार कर चुका है। पेट्रोलियम उत्पादों की लगातार ऊंची कीमतों की वजह से हर चीज की महंगाई बढ़ी है। लोगों की रसोई का बजट 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है। रसोई गैस की कीमत 425 रुपए से बढ़ कर आठ सौ रुपए हो गई है। खाने के तेल और दालों की कीमत दोगुनी हो गई है। निर्माण सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले सीमेंट और इस्पात की कीमत भी लगभग दोगुनी हो गई है। और सबसे दुखद यह है कि यह महंगाई लोगों की कमाई में हुई बड़ी कमी के बाद आई है- कोढ़ में खाज की तरह!

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वित्त मंत्री ने तीसरा दावा यह किया कि इस सरकार ने मध्य वर्ग की समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया। यह मध्य वर्ग के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है और इस सिद्धांत की बेहतरीन मिसाल है कि ‘बुरा करेंगे, अच्छा कहेंगे’। नोटबंदी से लेकर जीएसटी और कोरोना वायरस की महामारी में जो वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है वह मध्य वर्ग है। अंतरराष्ट्रीय संस्था प्यू रिसर्च के मुताबिक कोरोना महामारी से पहले भारत में 9.90 करोड़ लोग ऐसी स्थिति में थे कि उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर के हिसाब से मध्य वर्ग का कहा जा सकता था। लेकिन अब यह संख्या घट कर 6.60 करोड़ रह गई है। यानी 3.30 करोड़ लोग मध्य वर्ग के दायरे से बाहर होकर निम्न मध्य वर्ग में या गरीब वर्ग में पहुंच गए हैं। प्यू रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक कोरोना से पहले भारत में 5.90 करोड़ गरीब लोग थे, जिनकी संख्या बढ़ कर 13.40 करोड़ हो गई है। यानी कोरोना की अवधि में साढ़े सात करोड़ गरीब बढ़े हैं। पूरी दुनिया में बढ़े गरीबों की संख्या में अकेले भारत का हिस्सा 60 फीसदी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कोरोना की वजह से लोगों के काम-धंधे बंद हुए, नौकरियां गईं, सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की और ऊपर से महंगाई कई गुना बढ़ा दी।

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वित्त मंत्री का चौथा दावा यह है कि महामारी के समय की जीडीपी की तुलना सामान्य समय की जीडीपी से नहीं की जा सकती। इसलिए ऊपर 2019 तक के ही जीडीपी के आंकड़े दिए हैं और उनसे ही हकीकत जाहिर हो गई है। बहरहाल, वित्त मंत्री महामारी की जीडीपी की तुलना  सामान्य समय से नहीं करना चाहतीं लेकिन वे और उनकी सरकार के सारे मंत्री और पार्टी के सारे नेता 21वीं सदी की उपलब्धियों की तुलना पिछली सदी में नेहरू के समय से करते रहते हैं और अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं। अगर इस बात को छोड़ दें तब भी वित्त मंत्री की बात सही नहीं है। महामारी के समय में भी दुनिया के देश तेज रफ्तार से तरक्की कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर अमेरिकी जीडीपी 2020 में माइनस साढ़े तीन फीसदी थी लेकिन 2021 में यह 6.39 फीसदी की दर से बढ़ रही है। भारत में 2020 की जीडीपी माइनस साढ़े सात फीसदी रही थी। भारत के पड़ोसी चीन की अर्थव्यवस्था 2020 में भी 2.3 फीसदी थी और इस साल साढ़े आठ फीसदी की दर से बढ़ रही है।

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वित्त मंत्री के एक दावे की पोल उनके इंटरव्यू के अगले ही दिन पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने खोली। वित्त मंत्री ने कहा कि केंद्र ने सभी राज्यों के जीएसटी बकाए का भुगतान कर दिया है। पर चिदंबरम ने बताया कि पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों सरकारों का मिला कर 17-18 हजार करोड़ रुपया जीएसटी अब भी बकाया है। अंत में वित्त मंत्री ने कोरोना महामारी के दौरान इलाज के प्रोटोकॉल को डायनेमिक बता कर इसका बचाव किया। सोचें, भारत में इलाज का क्या प्रोटोकॉल था? सरकार के झोला छाप सलाहकारों ने कोरोना के इलाज में ऐसे ऐसे उपाय किए, जिनसे ज्यादा लोगों की जान गई, लोगों का बीपी, शुगर बढ़ा और लोग ब्लैक फंगस का शिकार हुए और बाद में सरकार ने लगभग सारे प्रोटोकॉल बदल दिए। यह दावा भी इस बात की मिसाल है कि कैसे गलत नीतियों को डायनेमिक बता कर उनका बचाव किया जाता है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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