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सवाल तो पूछे जाएंगे

चूंकि नाविक इटली के थे और जाहिर है, उसे सोनिया गांधी के मूल से भी जोड़ दिया गया। लेकिन ऐसी अल्पकालिक सोच की अतार्किक राजनीति कभी कभी घूम फिर कर उसी के गले पड़ जाती है, जिसने उसकी शुरुआत की हो। अब यही प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुआ है। अब वे सवालों के घेरे में हैं।

अगर यह अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के सिद्धांतो के अनुरूप हुआ, तो उस पर किसी को एतराज नहीं हो सकता। बल्कि अगर यह कूटनीति का तकाजा भी रहा हो, तो उसे समझा जा सकता है। उसके पीछे भारत सरकार की मंशा पर सवाल उठाने की वजह नहीं बनती। लेकिन ये मुद्दा भारत में संवेदनशील बना, तो उसका एक बड़ा श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। मोदी, जब भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे। तब उन्होंने इतालवी नाविकों के सवाल को भारत की कमजोरी से जोड़ा था। और चूंकि नाविक इटली के थे और जाहिर है, उसे सोनिया गांधी के मूल से भी जोड़ दिया गया। लेकिन ऐसी अल्पकालिक सोच की अतार्किक राजनीति कभी कभी घूम फिर कर उसी के गले पड़ जाती है, जिसने उसकी शुरुआत की हो। अब यही प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुआ है। ये सवाल तो पूछा ही जाएगा कि आखिर उन नाविकों के खिलाफ मुकदमा क्यों बंद कर दिया गया?

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गौरतलब है कि इटली की ओर से भारतीय सुप्रीम कोर्ट की रजिस्टरी में 10 करोड़ का मुआवजा जमा कराने के बाद कोर्ट ने सभी आपराधिक मामलों को बंद करने का आदेश दिया है। 10 करोड़ रुपये केरल हाई कोर्ट को ट्रांसफर किए जाएंगे, जिसके बाद पीड़ित के वारिसों को चार-चार करोड़ रुपये बतौर मुआवजा मिलेगा। बाकी के दो करोड़ रुपये नाव के मालिकों को दिए जाएंगे। तो यहां ये सवाल उठेगा कि क्या भारत ने इस्लामी व्यवस्था जैसी ब्लड मनी के सिद्धांत को अब स्वीकार कर लिया है? वरना, आधुनिक न्याय व्यवस्था तो यही कहती है कि हत्या के आरोपियों को वो सजा होनी चाहिए, जिसका प्रावधान कानून की किताब में है। 2012 की घटना में केरल के तट के पास भारतीय मछुआरों की एक नाव वहां से गुजर रहे इतालवी तेल के टैंकर एनरिका लेक्सी के पास पहुंच गई थी। टैंकर पर तैनात दो इतालवी नौसैनिक सल्वातोरे जिरोने और मासिमिलियानो लातोरे के गोली चलाने से दो भारतीय मछुआरों की मौत हो गई थी। भारतीय नौसेना ने इतालवी नौसैनिकों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। इटली और भारत के बीच दोनों नौसैनिकों पर मुकदमा चलाने को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। अब स्थिति यह है कि अपने पुराने रुख पर भारत ने समझौता कर लिया है। मुद्दा यह है कि क्या इससे भारत की दुनिया में सॉफ्ट देश की छवि नहीं बनेगी? ऐसे सवालों के जवाब आखिर कौन देगा?

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