हंसराज भारद्वाजः छोटे वकील, बड़े मंत्री!

कभी कांग्रेस की जानी-मानी हस्ती रहे हंसराज भारद्वाज के नहीं रहने की खबर पढ़ी तो पुरानी यादें ताजी हो आई। जब मैं कांग्रेस की रिपोर्टिंग करता था जब उनसे लगातार मुलाकात होती रहती थी। वे हम रिपोर्टरों के लिए तो मानों कांग्रेस की जानकारी का चलता-फिरता मीडिया थे। फिर उनसे अपने दिवंगत बुजुर्ग मित्र व कांग्रेसी नेता ब्रजमोहन के साथ यूनाइटेड कामन हाउस में अक्सर मुलाकातें होने लगी।

हंसराज भारद्वाज कोजोड़-तोड़ में बेहद माहिर माना जाता था। वे पहले बंसीलाल व फिर उनके जरिए इंदिरा गांधी परिवार के संपर्क में आए व उनके निजी मुकदमें देखने लगे व बाद में उनके कानूनी सलाहकार बन गए। वे उस समय शाह कमीशन में चल रहे आपातकाल में इंदिरा गांधी के मामले देखते थे। इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा में भेजा व दिसंबर 1984 में राजीव गांधी ने उन्हें कानून मंत्री बनाया।

इस पद पर वे दोबारा सरकार बनने पर भी बने रहे। देश के इतिहास में पहली बार बिना सांसद बने किसी व्यक्ति को मंत्री बनाया गया था। उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली लागू करके सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति का नियम बदला। वे लगातार 27 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने कभी कोई सीधा चुनाव नहीं लड़ा। वे राजीव गांधी के बहुत भरोसे के आदमी थे। जब राजीव गांधी अमेठी से अपना चुनाव का पर्चा भरते तो वे उनके साथ वहां जाते थे।

वे पार्टी में बेहद प्रभावशाली हो गए थे व प्रधानमंत्री तक से टकराव लेने में नहीं घबराते थे। पीवी नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहते हुए अटार्नी-जनरल पद पर पूर्व अटार्नी जनरल वरिष्ठ वकील के पारासरन को नियुक्त करना चाहते थे मगर भारद्वाज इस पद पर मिलन बनर्जी को लाना चाहते थे। इस मुद्दे पर दोनों में टकराव हुआ और अंततः मिलन बनर्जी की नियुक्ति हुई। जब 2004 में भारद्वाज फिर कानून मंत्री बने तो उन्होंने मिलन बनर्जी को पुन अटार्नी जनरल नियुक्त करवा दिया।

कांग्रेस पार्टी में ही न्यायपालिका से जुड़े कई नेता उन्हें पसंद नहीं करते थे। एक बार मैंने एक वरिष्ठ नेता से पूछा कि भारद्वाज की लोकप्रियता का कारण क्या उनका जनाधार है तो उन्होंने जवाब दिया कि वे तो हरियाणा के हैं मगर उन आला नेताओं के बीच उनका आधार है जिनका जनाधार है। शायद यही वजह थी कि कभी रोहतक की छोटी अदालत से वकालत शुरू करने वाले भारद्वाज पांच बार राज्यसभा सदस्य रहे। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने देश के इतिहास में सबसे ज्यादा समय तक कानून मंत्री बने रहने का रिकार्ड बनाया। वे पहले राजीव गांधी व फिर पीवी नरसिंहराव की सरकार में कानून मंत्री रहे। वे कहते थे कि वे तो पार्टी के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं। उनका मंत्री रहते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव से टकराव हो गया था।

उन्होंने मंत्री रहते हुए न सिर्फ साहस दिखाया बल्कि वे पार्टी में दुस्साहसी माने जाने लगे। पहले वे कानून राज्यमंत्री थे मगर सोनिया गांधी ने यूपीए-1 की मनमोहन सिंह सरकार में 2004 से 2009 के बीच कानून का कैबिनेट मंत्री बनवाया। इस पद पर रहने के बाद उन्होंने अपने जीवन का सबसे दुस्साहसी व विवादास्पद कदम उठाया व उन्होंने बोफोर्स कांड के मुख्य अभियुक्त ओटावियो क्वात्रोची के विदेशों में स्थित बैंक खातों पर लगी सील को हटवा कर उन्हें पूरा पैसा निकाल लेने की छूट दे दी और वह आराम से बरी हो गया।

सुप्रीम कोर्ट में चल रहे रामसेतु प्रकरण में उन्होंने यह हलफनामा दाखिल करवाया था कि इस वाद का कोई वैज्ञानिक या ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि राम पैदा हुए थे। इससे मनमोहनसिंह सरकार की फजीहत हुई। जब 2009 में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई तो उन्हें कानून मंत्रालय से हटाकर वीराप्पा मोइली को कानून मंत्री बना दिया गया। इस कदम से वे बौखला गए।

उन्हें शांत रखने के लिए उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया। वे पार्टी के इस कदम से बहुत नाराज थे व बातचीत में कहा करते थे कि यह पार्टी कृतघ्न है। मैंने बोफोर्स मामले में इनकी जैसे मदद की कोई वैसा करने की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इसके बावजूद इन्होंने मुझे कानून मंत्रालय से हटाकर राज्यपाल बनाकर दिल्ली से इतनी दूर कर्नाटक में पटक दिया। उस समय कर्नाटक में बीएस येदीयुरप्पा की सरकार थी। राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल विवादों से भरा रहा। उन्होंने दो बार येदीयुरप्पा सरकार को बर्खास्त किए जाने की सिफरिश की मगर केंद्र की उनकी अपनी सरकार ने उनकी सिफारिशें ठुकरा दी।

भाजपा लगातार उन्हें राज्यपाल पद से बर्खास्त करने की मांग करने लगी। कर्नाटक के अनेक विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलारों की नियुक्ति के मुद्दे पर उन्होंने विवाद पैदा किए। उन्होंने तब सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया था कि मैं पहले कांग्रेसी व फिर राज्यपाल हूं। मैं गांधी परिवार का निष्ठावान सेवक हूं। उन्हें लगता था यह पढ़-सुनकर सोनिया गांधी उन्हें दोबारा कैबिनेट में शामिल करवा देगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। भाजपा नेताओं अरूण जेटली ने तो यहां तक कहा था कि भारद्वाज का काम करने का तरीका व उनकी भाषा तक उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। मगर जब 2014 में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए तो भारद्वाज राजनीतिक पटखनी मानते हुए उनकी तारीफ व कांग्रेस की आलोचना करनी शुरू कर दी।

मोदी सरकार ने उनका कर्नाटक में कार्यकाल नहीं बढ़ाया व खुद सत्ता से गई कांग्रेस सरकार ने उन्हें जरा भी अहमियत नहीं दी। तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तो उनकी विदाई के समय उन्हें छोड़ने के लिए हवाई अड्डे तक नहीं गए। वे दिल्ली लौट आए और अलग-थलग पड़ गए। राहुल गांधी ने भी उन्हें घास नहीं डाली। पार्टी उनकी उपेक्षा करने लगी। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के मानहानि विधयेक पर चर्चा हो रही थी तो एक कार्यक्रम में उनका अरूण शोरी से टकराव हो गया। उन्होंने शोरी से कहा कि तुम्हें मेरे बारे में बोलते समय थोड़ा सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। शेखर गुप्ता के मुताबिक जब अरूण शोरी के पिता रोहतक में मजिस्ट्रेट थे तब भारद्वाज ने उनकी अदालत में वकालत करी थी। इस पर शोरी ने उनसे कहा कि इतना कानून तो आप जैसे मुफस्सिल वकील को भी पता होना चाहिए।

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