विपक्ष के लिए मौका!

जिस तरह खेलों में होता है, वैसे ही राजनीति में भी अच्छा खिलाड़ी अपने लिए मौके बनाता है और उसे अपने फायदे में तब्दील करता है। पिछले साढ़े छह साल का संयोग कुछ ऐसा है कि देश में विपक्ष को मौके तो बहुत मिले लेकिन वह अपने फायदे के लिए उसका इस्तेमाल नहीं कर पाया। उलटे जिन मसलों पर सरकार को घिरना चाहिए था, उससे जवाब-तलब होना चाहिए था, उन मसलों पर भी विपक्ष ही कठघरे में आ गया। अब फिर एक मौका है विपक्ष के पास कि वह सरकार की कमियों को सामने लाए और लोगों को यकीन दिलाए कि सरकार जैसा अपने को दिखा रही है, असल में वैसी है नहीं। उसके खाने के और दिखाने के दांत अलग अलग हैं। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में जो कहते हैं वह शासन की असलियत नहीं है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि ‘देश नहीं बिकने दूंगा’ पर उनकी सरकार में साढ़े छह साल में सबसे ज्यादा सरकारी कंपनियां बिकी हैं या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी बिकी है। विपक्ष यह असलियत देश के लोगों को क्यों नहीं बता सकता है और लोग क्यों नहीं इस पर यकीन करेंगे?

केंद्र सरकार के बनाए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान अपने सीमित साधनों में लोगों को बता रहे हैं कि इन कानूनों का असली मकसद क्या है। अगर यहीं काम विपक्ष करे तो उसका असर ज्यादा होगा। इसमें लोगों को सिर्फ सरकार की असली मंशा बतानी है। कानून का असली मकसद बताना है कि आखिर जब किसानों ने ऐसे किसी कानून की मांग नहीं की थी तो किस मकसद से ये कानून बनाए गए? कोरोना वायरस की महामारी का समय इसके लिए क्यों चुना गया? राज्यसभा में जोर-जबरदस्ती कानून क्यों पास कराया गया? क्या यह महज संयोग है कि सरकार ने आवश्यक वस्तु कानून में बदलाव करके असीमित मात्रा में खाने-पीने की चीजों के भंडारण की इजाजत दी और देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस समूह ने फ्यूचर ग्रुप का अधिग्रहण कर लिया? क्या यह महज संयोग है कि देश के खुदरा कारोबार पर रिलायंस समूह का कब्जा हो गया और अब हर शहर में जियो मार्ट खोले जा रहे हैं?

विपक्ष को सरकार से यह पूछना चाहिए कि यह संयोग है या प्रयोग कि सरकार ने कृषि कानून बनाए उससे पहले पंजाब में अनाज भंडारण के लिए अडानी समूह के बड़े बड़े साइलोज बनाए जाने लगे थे? यह भी क्या संयोग है कि अडानी समूह अब एक एक करके खाने-पीने की सारी चीजें बनाने लगा है और इस बात का विज्ञापन टेलीविजन पर करके बता भी रहा है? क्या यह संयोग है कि भारत सरकार ने एग्रीकल्चर के लिए नहीं एग्री बिजनेस के लिए एक लाख करोड़ रुपए के कर्ज का प्रावधान किया है, जिसका फायदा किसान को नहीं, बल्कि कृषि उत्पादों का कारोबार करने वालों को मिलेगा? कृषि उद्यमिता, स्टार्टअप, एग्री लॉजिस्टिक्स के नाम पर उन्हें ही कर्ज मिलेगा और उनका ही कर्ज माफ होगा। क्या यह भी संयोग है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुंबई गए तो अडानी एग्री कंपनी के एमडी से मिले? विपक्ष ये सवाल क्यों नहीं उठा सकता है? अगर विपक्ष ये सवाल उठाता है, लोगों तक ले जाता है तो क्या लोग इस पर यकीन नहीं करेंगे?

किसानों का आंदोलन असल में विपक्ष के लिए एक बड़ा मौका है, जिसका वह राजनीतिक इस्तेमाल कर सकता है। विपक्ष को किसान आंदोलन का राजनीतिकरण नहीं करना है। अगर यह गलती हुई तो किसानों को बड़ा नुकसान होगा। किसानों का आंदोलन अपनी जगह है, जिसे अपने सीमित साधनों में किसान लड़ रहे हैं। विपक्ष के लिए यह आंदोलन अलग से मौका है। असल में नरेंद्र मोदी की सरकार को लेकर दो तरह की धारणा देश में बनाई गई है। भारी भरकम खर्च, प्रचार आदि के जरिए यह स्थापित किया गया है कि मोदी हमेशा देश के लिए सोचते और काम करते हैं, उनका अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है, उनकी सरकार देशभक्त है। दूसरी, धारणा यह है कि मोदी को पीछे हटाना मुमकिन नहीं है। किसान आंदोलन के सहारे ये दोनों धारणाएं तोड़ी जा सकती है।

विपक्ष बिना किसी खास मेहनत के यह साबित कर सकता है कि केंद्र के बनाए तीनों कृषि कानून किसान के लिए नहीं, बल्कि कारपोरेट के लिए हैं। विपक्ष यह भी साबित कर सकता है कि कारपोरेट में भी सिर्फ दो क्रोनी कैपिटलिस्ट हैं, जिनको फायदा पहुंचाने के लिए ये कानून बनाए गए हैं। कम से कम चार पांच राज्यों के किसान ये मुद्दे उठा रहे हैं और बाकी राज्यों के किसानों का इन मुद्दों पर मौन समर्थन हैं। इसलिए विपक्ष के लिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाना आसान है। राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की सरकार को सूट-बूट की सरकार कहना बंद  कर दिया है। यह किसान आंदोलन उसी सूट-बूट के विमर्श का विस्तार है। फर्क यह है कि इस बार किसान और एक निश्चित संख्या में आम लोग सरकार और सत्तारूढ़ दल के साथ साथ कारोबारियों से भी नाराज हैं। किसान भी सरकार के क्रोनी कारोबारियों का नाम लेकर उन पर हमले कर रहे हैं। सो, यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि कारोबारी विमर्श भी बन गया है। ध्यान रहे कोई भी कारोबारी यह नहीं चाहेगा कि उसके ऊपर ऐसा फोकस बने, जिससे वह आम लोगों की नजर में विलेन बने।

विपक्ष ने पिछले साढ़े छह साल में जो मौके गंवाएं हैं, यह उनकी भरपाई का समय है। वह इन कृषि कानूनों की असलियत सामने लाकर बता सकती है कि केंद्र की सरकार ने अपने चुनिंदा क्रोनी कारोबारियों के लिए ये कानून बनाए हैं। चूंकि किसान खुद ही उन क्रोनी कारोबारियों के नाम ले रहे हैं इसलिए विपक्ष को अपनी बात कहने और लोगों को यकीन दिलाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। इसके बाद इन कानूनों पर सरकार का पीछे हटना महज वक्त की बात होगी। इससे पहले भी भूमि अधिग्रहण बिल में बदलाव के प्रस्ताव पर ही मोदी सरकार पीछे हटी थी। इस बार कृषि कानूनों पर ऐसा हो सकता है। सो, अगर किसानों के बहाने विपक्ष यह साबित करता है कि सरकार कारपोरेट के लिए काम कर रही है, पूंजीपतियों के लिए काम कर रही है, चुनिंदा क्रोनी कारोबारियों के हितों में कानून बना रही है तो देशभक्त बनाम देशद्रोही का पूरा विमर्श बदल सकता है। सरकार देशभक्त है और विपक्ष देशद्रोही, यहीं इस सरकार की अब तक की राजनीतिक सफलता की बुनियाद रही है। किसान आंदोलन से यह मिथक टूट सकता है। इसलिए यह विपक्ष के लिए बड़ा मौका है। उसे आगे बढ़ कर इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए।

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