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Monday, April 19, 2021
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आजादी की भारत सच्चाई!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

फिल्मकार अनुराग कश्यप और अभिनेत्री तापसी पन्नू के यहां आय कर विभाग का छापा पड़ा तो सोशल मीडिया में बड़ी दिलचस्प प्रतिक्रिया पढ़ने को मिली। किसी ने लिखा- आप बोलने के लिए आजाद हैं, लेकिन उसके बाद आपको किसी किस्म की आजादी नहीं है। एक दूसरे व्यक्ति ने लिखा- आपको बोलने की आजादी है पर ईडी, सीबीआई और आय कर विभाग की कार्रवाई के लिए भी तैयार रहें! यह वर्तमान भारतीय समय की ऐसी सचाई है, जिसे दुनिया भी बहुत साफ-साफ देख रही है। तभी अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस ने लोकतंत्र और आजादी को लेकर जारी की गई अपनी ताजा रैंकिंग में भारत का स्थान नीचे कर दिया है। फ्रीडम हाउस ने भारत को फ्री यानी आजाद मुल्क की श्रेणी से हटा कर पार्टली फ्री यानी आंशिक आजादी वाले देशों की श्रेणी में डाल दिया है। इसने 211 देशों की रैंकिंग की है, जिसमें भारत की रैंकिंग 83 से घटा कर 88 कर दी गई है और एक सौ में से भारत को 67 अंक मिले हैं। पिछली बार भारत को 71 अंक मिले थे।

फ्रीडम हाउस की इस रिपोर्ट से एक महीना पहले दो फरवरी को द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट ने अपना सालाना डेमोक्रेसी इंडेक्स जारी किया था। उसमें भी भारत दो स्थान नीचे गिर कर 53वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत को 10 में से 6.61 अंक मिले। पिछले साल 6.69 फीसदी अंक मिले थे और 2014 में जब भारत की स्थिति सबसे अच्छी थी तब उसे 7.92 अंक मिले थे। यानी 2014 के बाद से भारत में लोकतंत्र की स्थिति क्रमशः बिगड़ती जा रही है। द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट ने दुनिया के देशों को चार श्रेणी में बांटा है। उसने 167 देशों की सूची बनाई है, जिसमें 23 देशों को पूर्ण लोकतंत्र का दर्जा दिया है और 53 देशों को ‘फ्लॉड डेमोक्रेसी’ यानी खामियों वाले लोकतंत्र की श्रेणी में रखा है। भारत को इसी श्रेणी में जगह मिली है। अपने देश के लोगों के लिए खुश होने की बात यह हो सकती है कि अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम, ब्राजील आदि देश भी इसी श्रेणी में हैं। उसने दुनिया के 35 देशों को हाइब्रीड मॉडल और 57 देशों को एकाधिकारवादी या तानाशाही मॉडल वाला बताया है।

चाहे फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट हो या द इकोनॉमिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट का इंडेक्स हो, दोनों में भारत के बारे में कई बातें एक जैसी कही गई हैं। दोनों ने कहा है कि भारत में लोकतंत्र नीचे गिरता जा रहा है और आम लोगों की आजादी पर हमले हो रहे हैं। नागरिकता संशोधन कानून से लेकर कोरोना वायरस को रोकने के लिए अपनाई गई रणनीति तक में ऐसी बारीकियों को एजेंसी ने पकड़ा है, जिनसे यह जाहिर हुआ है कि नागरिकों की आजादी को बाधित किया जा रहा है। फ्रीडम हाउस ने अपनी रिपोर्ट में भारत के बारे में चिंता जताते हुए कहा है कि देश में बोलने की आजादी के मामले में भारत की रैंकिंग लगातार तीन साल से गिर रही है। उसने इंटरनेट की सेवा बंद करने, सरकार से असहमति की आवाजों को दबाने या उनकी साख बिगाड़ने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया में लक्षित हमले करने और राजनेताओं द्वारा गलत या अधूरी सूचनाओं का व्यापक प्रसारण करने के तीन खतरों का जिक्र किया है।

ये खतरे काल्पनिक नहीं हैं और न इन्हें बढ़ा-चढ़ा कर बताया गया है। यह हकीकत है कि इंटरनेट की सेवा बंद करने के मामले में भारत दुनिया का नंबर एक देश बन गया है। एक आंकड़ा तो यह भी है कि पिछले साल पूरी दुनिया में जितनी बार इंटरनेट की सेवा बंद की गई है उसमें 70 फीसदी मामले अकेले भारत के हैं। नई दिल्ली की एक संस्था सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर ने इंटरनेट सेवा बंद किए जाने का डाटा इकट्ठा किया है। इसके मुताबिक 2020 में देश में 132 बार इंटरनेट की सेवा बंद की गई। 2019 में 106 बार और उससे पहले 2018 में सबसे ज्यादा 134 बार इंटरनेट की सेवा बंद की गई थी। मनमोहन सिंह के कार्यकाल के आखिरी तीन साल में सिर्फ 14 बार इंटरनेट की सेवा बंद की गई थी। जिस समय कई बातों के लेकर देश में आंदोलन चल रहा था तब भी आंदोलनकारियों की आवाज दबाने या उनके नैरेटिव के बरक्स सरकारी प्रचार को आगे बढ़ाने के लिए इंटरनेट सेवा या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल नहीं किया गया था। 2012 में सिर्फ तीन बार इंटरनेट की सेवा बंद हुई थी। 2013 में पांच बार और 2014 में छह बार इंटरनेट की सेवा बंद हुई थी।

एक तथ्य यह भी है कि 2016 के बाद से भारत में हर साल दुनिया के किसी भी दूसरे देश के मुकाबले ज्यादा बार इंटरनेट की सेवा बंद की गई है। हर बार इसके दो कारण बताए जाते हैं-  नागरिकों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था। इसके लिए केंद्र सरकार ने 2017 में इंडियन टेलीग्राफ एक्ट में संशोधन किया और यह प्रावधान कर दिया कि संचार सेवाओं को अस्थायी तौर पर निलंबित किया जा सकता है। तब से लगातार संचार सेवाएं निलंबित की जा रही हैं। इन दिनों दिल्ली की सीमा पर देश के कई राज्यों के किसान आंदोलन पर बैठे हैं। केंद्र के बनाए तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों का आंदोलन पांच मार्च को एक सौ दिन का हो जाएगा। इस दौरान कई बार पुलिस ने कानून व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट सेवा निलंबित की या धीमी की। इंटरनेट की सेवा यह सोचे बगैर बंद की गई कि इन दिनों सारे स्कूल-कॉलेज बंद हैं और बच्चे इंटरनेट के जरिए ही ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक नागरिकों के इंटरनेट एक्सेस करने की आजादी पर भारत में दुनिया के कई एकाधिकारवादी देशों जैसे म्यांमार, बेलारूस, अजरबैजान आदि से भी ज्यादा पाबंदी है। असल में यह नागरिकों की सुरक्षा या कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। ऐसा नहीं है कि सरकार को कुछ नहीं सूझ रहा है तो इंटरनेट बंद कर दिया जा रहा है। असल में एक सुविचारित योजना के तहत इंटरनेट की स्पीड धीमी की जा रही है या इसकी सेवा बंद की जा रही है। चाहे जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने का मामला हो या नागरिकता संशोधन कानून लागू करने का मामला हो या कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन का मामला है, हर मौके पर सरकार ने इंटरनेट की सेवा बंद करने की सहूलियत का इस्तेमाल किया। सरकार ने इसका इस्तेमाल लोकप्रिय विमर्श को प्रभावित करने के लिए किया। इंटरनेट की सेवा को प्रतिबंधित करके सरकार ने लोकप्रिय विमर्श को नियंत्रित किया और इस कारण लोगों ने वहीं देखा-सुना, जो सरकार दिखाना या सुनाना चाहती थी। यह हकीकत है कि भारत सबसे धीमे ब्राडबैंड स्पीड वाले देशों में शामिल हैं, देश में इंटरनेट की पहुंच भी 50 फीसदी के आसपास है और ऊपर से इंटरनेट सेवा बंद करने वाले देशों में लगातार चार साल से भारत अव्वल है।

जब इतने से भी बात नहीं बनी तो अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया को नियंत्रित करने का कानून लाया जा रहा है। सरकार ने इसका मसौदा जारी कर दिया है और अगले तीन महीने में इसे कानून बना दिया जाएगा। इस कानून के लागू होने के बाद ओवर द टॉप यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और संचार सेवा से जुड़ी इंटरमीडियरी कंपनियों जैसे कंटेंट प्रोवाइडर्स, इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स आदि को कई तरह से पाबंद किया जाएगा। डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था द इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने इस कानून के मसौदे को ‘अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक’ बताया है। इतने उपाय करने और पाबंदियों के बावजूद अगर कोई कुछ ऐसा लिख या बोल देता है, जो सरकार को पसंद नहीं है तो उसकी स्थिति प्रबीर पुरकायस्थ, गीता हरिहरन, अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू वाली होती है।

 

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