लंदन की ताजा एक झलक

अब से ठीक 50 साल पहले मैं लंदन पहली बार आया था। उस समय यहां गांधीजी की जन्म शताब्दि (1969) मन रही थी। कई देशों के गांधी भक्त इकट्ठे हुए थे। उनमें मैं सबसे छोटा था लेकिन मुझे भी उस सम्मेलन में बोलने के लिए कहा गया था। इस बार शायद 8-10 साल बाद मेरा लंदन आना हुआ है। वह सिर्फ गांधीजी के डेढ़ सौ साल मनाने के लिए।
50 साल पहले मैं काबुल और मास्को से लंदन आया था, अपने पीएच.डी. के शोधकार्य को पूरा करने के लिए लेकिन इस बार सिर्फ गांधी समारोह के लिए ही आना हुआ। यह समारोह ब्रिटेन की संसद में ‘एनआरआई वेल्फेयर सोसायटी’ ने आयोजित किया था। मेरे साथ अपने तीन-चार मंत्रियों को भी आना था लेकिन चुनावों के कारण वे नहीं आ सके। फिर भी भारत, अमेरिका और यूरोप से कई भारतीय मित्र आए हुए थे।
श्रोताओं में ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्डस और संसद के कई सदस्य भी थे। ब्रिटिश संसद का वह हाल खचाखच भरा हुआ था। चार-पांच प्रवासियों के भाषण हुए लेकिन मुख्य वक्ता के नाते मैंने गांधीजी के सपनों के दक्षिण एशिया के बारे में ही बोला। उस सभा में भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और श्रीलंका के भी कई महत्वपूर्ण प्रवासी लोग आए हुए थे। कुछ प्रवासियों ने ‘दक्षिण एशियाई लोकसंघ’ (पीपल्स यूनियन ऑफ साउथ एशिया) बनाने का भी समर्थन किया।
यहां अपने और पड़ौसी देशों के कई महत्वपूर्ण लोगों से रोज भेंट हो रही है। कल एक कश्मीरी पत्रकार ने लंबी भेंट-वार्ता भी की। इधर लंदन के विश्व प्रसिद्ध बाजारों- हेरोड्स और बिस्टर विलेज- में जाने का भी मौका मिला। 50-50 हजार के जूते, तीन-तीन लाख रु. के कोट, दो-दो लाख रु. के चश्मे, ढाई-ढाई करोड़ के पलंग भी देखे। जो टोपी भारत में 300 रु. में मिलती है, उसकी कीमत यहां दस हजार रु. है। कुछ अदभुत ‘साउंड सिस्टम’ भी देखे। कुमार गंधर्वजी को भी उन पर सुना। यहां से मैंने कुछ भी नहीं खरीदा।
एक गज़ल याद आईं। ‘‘बाजार से गुजरा हूं, खरीददार नहीं हूं। दुनिया में हूं, दुनिया का तलबगार नहीं हूं।’’ कल शाम आक्सफोर्ड स्ट्रीट की सैर भी की। अब और 50 साल में बहुत फर्क आ गया है। यहां गैर-अंग्रेज लोग ज्यादा दिखे। मैं लंदन के प्रसिद्ध हाइड पार्क और मार्बल आर्च के पास ठहरा हूं। इसे लंदन का हृदय कहा जाता है। कल मेरे साथ पढ़े हुए कई अंग्रेज मित्र मिलने आएंगे। आज भी दो-तीन संगोष्ठियों में जाना है। गांधीजी के बहाने पचास साल पुरानी मित्रताएं फिर से नई हो रही हैं। पिछले पचास सालों में लंदन कई बार आया लेकिन कूटनीतिक भेंटों या अकादमिक भाषणों ने कभी इतना अवकाश ही नहीं मिलने दिया कि लंदन को देख सकूं।

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