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सरकार का पूरा फोकस, ध्यान भटकाओं!

समकालीन दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक बौद्धिकों में से एक और पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बौद्धिक असहमति की आवाजों के प्रतीक रहे नोम चोमस्की ने मीडिया द्वारा मैनिपुलेशन के दस नुस्खों के बारे में बताया है भारत के मौजूदा संदर्भ में वैसे तो नोम चोमस्की के बताए सारे नुस्खे आजमाए जाते हुए दिख रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा जिस नुस्खे को आजमाया जा रहा है वह डायवर्जन का यानी ध्यान भटकाने का नुस्खा है।

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एक बहुत पुरानी कहानी है, जिसे गांवों में रहने वाले लोग निजी अनुभवों से जानते हैं और शहरों में भी बहुत से लोगों ने पढ़ा या सुना होगा। गावों में पुराने जमाने में लोगों के पास धन के नाम पर सिर्फ पशुधन होता था और तब पशुओं की चोरी ही बड़ी चोरी मानी जाती थी। जब चोर गांव में आते थे सबसे पहले पशुओं के गले में बंधी घंटी खोलते थे। फिर एक चोर घंटी लेकर एक दिशा में जाता था और बाकी चोर पशुओं को लेकर दूसरी दिशा में जाते थे। गांव के लोग घंटी की आवाज का पीछा करते थे। थोड़ी दूर जाकर चोर घंटी फेंक कर लापता हो जाता था और तब तक चोर पशुओं को लेकर दूर निकल जाते थे। घंटी दूसरी तरफ लेकर जाना ध्यान भटकाने का नुस्खा था, जिसकी चोरों को बहुत जरूरत पड़ती है।

आधुनिक समय की मिसाल देनी हो तो बेहद लोकप्रिय स्पेनिश वेब सीरिज ‘मनी हाइस्ट’ की मिसाल दी जा सकती है। इसमें अपराध को अंजाम देने से पहले अपराधियों का गिरोह शहर के ऊपर हवाई जहाज से नोटों की बरसात करता है और पूरा शहर नोट लूटने में और प्रशासन-पुलिस लोगों को संभालने में लग जाते हैं। नोटों की बारिश ध्यान भटकाने का नुस्खा है।

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समकालीन दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक बौद्धिकों में से एक और पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बौद्धिक असहमति की आवाजों के प्रतीक रहे नोम चोमस्की ने मीडिया द्वारा मैनिपुलेशन के दस नुस्खों के बारे में बताया है, ‘10 स्ट्रेटजीज ऑफ मैनिपुलेशन’ में पहला ही नुस्खा ध्यान भटकाने के उपाय करने का है। उन्होंने लिखा है पहला नुस्खा ‘द स्ट्रेटजी ऑफ डायवर्जन’ है। अगर आप भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री, उनकी सरकार और उनकी पार्टी के कामकाज को देखेंगे तो चोमस्की के बताए लगभग सारे नुस्खों की झलक उसमें दिखेगी। जैसे चोमस्की ने एक नुस्खा ‘क्रिएट प्रॉब्लम, देन ऑफर सॉल्यूशन’ का बताया है। एक नुस्खा ‘यूज द इमोशनल साइड मोर दैन द रिफ्लेक्शन’ का है और एक रणनीति ‘कीप द पब्लिक इन इग्नोरेंस एंड मेडियोक्रिटी’ की है। उन्होंने एक नुस्खा ‘सेल्फ ब्लेम स्ट्रेंथेन’ का भी बताया है, जो अभी कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान लोगों को ही जिम्मेदार बताने के प्रयासों में दिखी है। नोम चोमस्की ने बताया है कि सरकारें किस तरह से मीडिया का इस्तेमाल मैनिपुलेशन के लिए करती हैं। सरकारों के खास नुस्खें हैं कि मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाओ, समस्या खड़ी करो, फिर उसका समाधान उपलब्ध कराओ, भावनात्मक पक्ष का इस्तेमाल करो और लोगों को मूढ़ व अज्ञानी बनाए रखो।

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भारत के मौजूदा संदर्भ में वैसे तो नोम चोमस्की के बताए सारे नुस्खे आजमाए जाते हुए दिख रहे हैं। लेकिन सबसे ज्यादा जिस नुस्खे को आजमाया जा रहा है वह डायवर्जन का यानी ध्यान भटकाने का नुस्खा है। इस समय किसी से भी पूछा जाए कि देश के सामने सबसे बड़ा संकट क्या है और सरकार को और उसके साथ साथ मीडिया को भी किस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए तो जवाब होगा कि कोरोना महामारी और आर्थिक संकट। इस समय भारत के सामने ये दो बड़े संकट हैं, लेकिन देश के मीडिया के लिए क्या ये दो मुद्दे सबसे ऊपर हैं? असल में  मीडिया के लिए कई सारे दूसरे मुद्दों में ये दो मुद्दे भी हैं और ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार ऐसा चाहती है। उसने मीडिया को ढेर सारे ऐसे मुद्दे उपलब्ध करा दिए हैं, जिसमें देश के नागरिकों को भी उलझा दिया गया है और बहस दूसरी दिशा में चली गई। उस दिशा में जिस दिशा में चोर घंटी लेकर जाता था।

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कोरोना और देश के आर्थिक संकट से ध्यान भटकाने के लिए नारद स्टिंग ऑपरेशन का मामला भारत सरकार का खड़ा किया हुआ वितंडा है। यह स्टिंग ऑपरेशन सात साल पहले हुआ था और पांच साल पहले 2016 के चुनाव के समय इसे दिखाया गया था। उसके एक साल बाद मुकदमा दर्ज हुआ था। लेकिन अभी ‘पिंजरे में बंद तोते’ की उपाधि वाली केंद्रीय एजेंसी सीबीआई ने ऐसा दिखाया है, जैसे तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को तुरंत गिरफ्तार करके जेल में नहीं डाला गया तो आसमान टूट पड़ेगा। सो, पिछले एक हफ्ते से नारद स्टिंग ऑपरेशन से जुड़े मुकदमे का नाटक चल रहा है। सीबीआई का ममता बनर्जी के नेताओं को गिरफ्तार करना, ममता का धरना देना, विशेष अदालत में और फिर आधी रात को हाई कोर्ट में ड्रामा और फिर सुप्रीम कोर्ट तक सुनवाई। यह सब ध्यान भटकाने के लिए किया गया है।

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एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का ड्रामा ध्यान भटकाने के नुस्खे के इस्तेमाल की बेहतरीन मिसाल है। रामदेव के जरिए सरकार और मीडिया दोनों यह खेल रचे हुए हैं। पहले रामदेव ने डॉक्टरों और एलोपैथी के खिलाफ बुरी से बुरी बात कही। उस पर उनके खिलाफ मुकदमा होना चाहिए था और आपदा प्रबंधन कानून के तहत उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए थी। पर उनकी आयुर्वेद दवाओं की लांचिंग करने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने उनको चिट्ठी लिख कर बयान वापस लेने का अनुरोध किया। इसके बाद पूरा मुद्दा भटका दिया गया। रामदेव के ऊपर कार्रवाई की बजाय बहस को एलोपैथी बनाम आयुर्वेद का बना दिया गया। रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण ने इसे अलग ही रूप दे दिया। उन्होंने कहा कि एलोपैथी का प्रचार पूरे देश को ईसाई बनाने के प्रयास का हिस्सा है। सोचें, आयुर्वेद का मुद्दा लाकर पहले इसे भारत की संस्कृति से जोड़ा गया और फिर इसे धर्म के साथ भी जोड़ दिया गया। भारत का मीडिया खुशी-खुशी ध्यान भटकाने के इस अभियान में शामिल हो गया। इससे पतंजलि समूह का प्रचार हो रहा था और मीडिया को पैसे मिल रहे थे। सबने देखा कि कैसे आईएमए के पूर्व व मौजूदा पदाधिकारियों के साथ बहस करते हुए कैसे रामदेव ने अपने सामने कोरोना की कथित दवा कोरोनिल का पैक रखा हुआ था।

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कांग्रेस के कथित टूलकिट और ट्विटर के खिलाफ कार्रवाई भी ध्यान भटकाने की रणनीति का एक हिस्सा है। पहले एक टूलकिट का प्रचार किया गया, जो बाद में फर्जी साबित हुआ और उस पर जब ट्विटर ने कार्रवाई की तो उसके बंद ऑफिस में छापा मारने के लिए पुलिस भेज दी गई। एलोपैथी बनाम आयुर्वेद की बहस खत्म होने से पहले ही इसे शुरू कर दिया गया। सो, कोरोना वायरस की महामारी, आर्थिक संकट, चीन के जमीन कब्जाने और अलग अलग हिस्सों में आए तूफान की घटनाओं के बीच नारद स्टिंग, एलोपैथी बनाम आयुर्वेद और टूलकिट-ट्विटर का विवाद मीडिया में खड़ा कराया गया।

सरकार को लगा कि इतने से काम नहीं चलेगा तो महामारी के बीच प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारी की बैठक करने लगे। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पदाधिकारियों के साथ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की बैठक की खूब चर्चा हुई। विपक्षी पार्टियों खास कर कांग्रेस ने भी इसका विरोध किया, बिना यह समझे कि ये मुद्दा उनको दिया ही इसलिए गया है वरना अभी ऐसी बैठक की क्या जरूरत थी, जिसमें उत्तर प्रदेश का कोई नेता शामिल ही न किया जाए! ध्यान भटकाने की इस रणनीति की खास बात यह है कि सब कुछ सामान्य प्रक्रिया के तहत होता दिखाई देगा, लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। असल में सब कुछ सुनियोजित होता है, कुछ भी अनायास नहीं होता है। जैसे सीबीआई निदेशक की नियुक्ति, उसमें चीफ जस्टिस के दखल से सरकार के दो चहेते अधिकारियों के रेस से बाहर होने की प्रायोजित खबरें या लक्षद्वीप के प्रशासक का वहां की मुस्लिम बहुल आबादी पर असर डालने वाले फैसले करना जैसे अनगिनत काम रूटीन के नहीं हैं, इन सबका इस्तेमाल जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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