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नई योजना, कई सवाल

केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को गांवों में आजीविका के साधन मुहैया कराने के लिए 50,000 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ ‘गरीब कल्याण रोजगार अभियान’ की शुरुआत की है। इस योजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के खगड़िया जिले के एक गांव से की। सरकारी बयान के मुताबिक यह योजना देश के छह राज्यों के 116 जिलों में शुरू की जाएगी। यह ऐसे जिले हैं, जहां कोरोना काल के दौरान शहरों से वापस आने वाले मजदूरों की संख्या 25,000 से ज्यादा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि 125 दिनों तक चलने वाला यह अभियान मिशन मोड के रूप में काम करेगा। इसमें एक ओर प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने और दूसरी ओर देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए अलग-अलग तरह के 25 कार्यों पर तेजी से और केंद्रित अमल किया जाएगा। सरकार का दावा है कि इस योजना से करीब एक तिहाई प्रवासी मजदूरों को लाभ होगा। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या इस योजना के बाद गांवों से गरीबों का पलायन रुक जाएगा? क्या वे अपने गांव ही में रहने लगेंगे या फिर रोजी-रोटी कमाने के लिए उनके शहर जाने की मजबूरी बनी रहेगी? एक सवाल यह भी उठा है कि जब पहले से मनरेगा एक सफल प्रयोग के रूप में मौजूद है, तो सरकार ने ये नई योजना क्यों शुरू की है? क्या इसके पीछे मकसद सियासी है? ये सवाल इसलिए भी उठा है क्योंकि योजना में पश्चिम बंगाल को शामिल नहीं किया गया है, जबकि रिवर्स माइग्रेशन से वहां भी बड़ी संख्या में मजदूर लौटे हैं। जबकि बिहार के 32 जिले और उत्तर प्रदेश के 31 जिले योजना में शामिल हैं।

बिहार में इसी साल चुनाव होना है, जबकि उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक वर्चस्व के लिए एक बेहद जरूरी राज्य है। सरकार के मुताबिक इस योजना के तहत प्रवासी मजदूरों को 125 दिनों तक रोजगार के अवसर मुहैया करवाए जाएंगे। इसमें रोजगार के इच्छुक श्रमिकों को काम मिलेगा। इसके तहत 25 तरह के कार्यो को शामिल किया गया है। इसके तहत जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना समेत गांवों में संचालित कई योजनाएं शामिल हैं। तो ये सवाल भी उठा है कि क्या यह पहले से चल रही योजनाओं की ही नई पैकेजिंग है? ये सवाल इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि नई योजना के लिए कोई नया बजट नहीं दिया गया है।

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