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हादसे का सच जानना जरूरी

Politics General Bipin Rawat

भारत ने अपनी तीनों सेनाओं के लिए एक प्रमुख का पद पहली बार बनाया और जनरल बिपिन रावत को उस पद पर नियुक्त किया। उस सर्वोच्च सैन्य पद पर आसीन एक फोर स्टार जनरल का हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारा जाना जितना दुखद है उससे ज्यादा चिंताजनक है। भारत में हेलीकॉप्टर या विमान हादसे में दो-दो मुख्यमंत्रियों की मौत हुई है, लोकसभा के स्पीकर का निधन हुआ है, माधवराव सिंधिया जैसे बड़े नेता की मृत्यु हुई है, ये सब दुखद घटनाएं हैं लेकिन सेना के सर्वोच्च जनरल को लेकर उड़ान भर रहे सेना के हेलीकॉप्टर का क्रैश होना बेहद चिंताजनक है और बेहद खतरनाक भी है। Bipin Rawat Chopper Crash

देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी वायु सेना के इसी हेलीकॉप्टर से उड़ान भरते हैं। इसलिए जनरल बिपिन रावत के हेलीकॉप्टर हादसे का सच जानना बेहद जरूरी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के जरिए देश को बताया है कि तीनों सेनाएं साझा तौर पर इसकी जांच करेंगी। हर पहलू से इसकी जांच होनी चाहिए और जांच के नतीजों के आधार पर कुछ जरूरी प्रोटोकॉल्स तय किए जाने चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह के हादसे रोके जा सकें।

तकनीकी खराबी और मानवीय भूल इन दो पहलुओं से आमतौर पर इस तरह के हादसों की जांच होती है। सोचें, क्या इस हादसे में इन दो में से कोई एक या ये दोनों कारण हो सकते हैं? तीनों सेनाओं के पहले प्रमुख, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ को उस हेलीकॉप्टर से उड़ान भरना था तो निश्चित रूप से उड़ान से पहले उसकी अच्छी तरह से जांच हुई होगी या उसी हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया होगा, जिसका रख-रखाव सबसे बेहतर होगा। दूसरे, ग्रुप कैप्टेन स्तर के पायलट विमान उड़ाने के लिए तैनात थे और पांच सदस्यों का जो चालक दल था उसमें सब एक के एक दक्ष पायलट थे। हादसे में अकेले जीवित बचे ग्रुप कैप्टेन वरुण सिंह की दक्षता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल लड़ाकू विमान एलसीए तेजस के इंजन में गड़बड़ी के बावजूद उन्होंने विमान को सकुशल लैंड करा दिया था। इसके लिए उन्हें इस साल स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। सो, ऐसे पायलट से मानवीय भूल की संभावना भी नहीं के बराबर होती है।

एक तीसरा पहलू लापरवाही या उड़ान भरने वाले वीआईपी की मनमानी का होता है। इससे पहले हेलीकॉप्टर हादसे में जितने नेताओं की मृत्यु हुई है, सबके बारे में यह खबर आई कि उन्होंने खराब मौसम और दूसरी बाधाओं के बावजूद पायलट पर उड़ान भरने का दबाव डाला। आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का हेलीकॉप्टर 2009 के सितंबर में कुन्नूर के इलाके में ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। बाद में जांच में पता चला था कि उन्होंने खराब मौसम के बावजूद पायलट पर उड़ान भरने के लिए दबाव डाला था। दो साल के बाद 2011 में अरुणाचल के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू ने भी पहाड़ों में बेहद खराब मौसम के बावजूद उड़ान भरी थी। इन दोनों घटनाओं से पहले सितंबर 2001 में माधवराव सिंधिया का विमान भी खराब मौसम में उड़ा था और बारिश के बीच ही दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। अगले ही साल मार्च 2002 में लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी का हेलीकॉप्टर भी बारिश के बीच दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। इन सारी दुर्घटनाओं में एक कॉमन बात थी कि मौसम खराब था और उड़ान भरने वाले वीआईपी ने पायलट पर दबाव डाला था। पर सवाल यह है कि इतनी दुर्घटनाओं में एक जैसे कारण के बावजूद ऐसा प्रोटोकॉल क्यों नहीं बना कि फिर वैसी दुर्घटना न हो?

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देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी और उनके साथ 11 अन्य सैन्य अधिकारियों को लेकर उड़ान भरने वाले हेलीकॉप्टर के क्रैश होने की जांच हर पहलू से होनी चाहिए। क्या भारतीय वायु सेना के इन हेलीकॉप्टरों के रख-रखाव में कोई कमी है, किसी तकनीक को अपग्रेड करने की जरूरत हो, जिसमें कोताही हुई है, मौसम को लेकर सूचना सही नहीं थी, कोई मानवीय भूल हुई या खराब मौसम की सूचना के बावजूद यह मान कर उड़ान भरी गई कि 20 मिनट की उड़ान है, क्या फर्क पड़ता है? बताया जा रहा है कि खराब मौसम की सूचना पहले से थी। मौसम विभाग ने बादलों के नीचे होने और उमस व बारिश की भविष्यवाणी की थी। आमतौर पर बादलों के नीचे होने पर पहाड़ी और घने जंगलों में उड़ान नहीं भरी जाती है क्योंकि बादल नीचे होते हैं तो हेलीकॉप्टर को उनसे नीचे उड़ान भरनी होती है, जिसमें दुर्घटना की संभावना ज्यादा रहती है। तभी यह सवाल भी है कि क्या खराब मौसम के बीच किसी दबाव में पायलट ने उड़ान भरी थी?

अंत में साजिश और बाहरी हाथ होने के पहलू से भी घटना की जांच होनी चाहिए। ध्यान रहे जनरल रावत भारतीय सेना के प्रमुख रहे हैं और उनके प्रमुख रहते भारत ने पाकिस्तान और म्यांमार में सर्जिकल स्ट्राइक की थी। जनरल रावत ने ही चीन को जवाब देते हुए ढाई मोर्चे पर भारतीय सेना के लड़ने की बात कही थी। सीडीएस बनने के बाद वे भारतीय सेना के आधुनिकीकरण में लगे थे और स्टूडियो कमांड बनाने की पहल उन्होंने की थी। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित होने के बाद से वे सेना की कमांड का नया ढांचा तैयार कर रहे थे, जो अभी विकास के शुरुआती चरण में था। ऐसे समय में एक हादसे में उनकी मौत होने को सामान्य दुर्घटना मान कर खारिज नहीं किया जा सकता है।

ताइवान में इसी तरह पिछले साल यानी 2020 के शुरू में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में वहां के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ जनरल शेन यी मिंग की मौत हो गई थी। उनके साथ दो मेजर जनरल सहित कुल सात सैन्य अधिकारी मारे गए थे। बिल्कुल उसी अंदाज में जनरल बिपिन रावत और 11 अन्य सैन्य अधिकारी हेलीकॉप्टर हादसे में मारे गए हैं। ध्यान रहे चीन ताइवान को हड़पने की योजना पर काम कर रहा है और भारत से भी अपनी दुश्मनी साध रहा है। पिछले 20 महीने से भारत की सीमा पर उसने तनाव पैदा किया हुआ है। ऐसे में यह संयोग है कि दोनों देशों के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी, जो चीन का विरोध करते थे, उनकी हेलीकॉप्टर हादसे में मौत हो गई! हालांकि इसका अनिवार्य रूप से यह अर्थ नहीं है कि दोनों दोनों घटनाओं में कोई समानता है या कोई साजिश है। लेकिन इस पहलू से भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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