जर्मनी में कट्टरपंथ को चुनौती

कट्टरपंथ से लड़ाई की राह में जर्मनी साहस के साथ आगे बढ़ रहा है। जर्मनी में स्कूलों में चेहरा या सर ढंकने को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। अब जर्मनी के राज्य बाडेन वुर्टेमबर्ग करी राज्य सरकार ने स्कूलों में इस पर पाबंदी लगा दी है। फरवरी में हैम्बर्ग की एक अदालत ने शहर में इसी तरह के एक कानून को अवैध बताया था। मगर अब इस राज्य की सरकार ने जरूरी वैधानिक प्रावधान कर दिए हैं। वहां की सरकार का कहना है कि जर्मनी एक स्वतंत्र समाज है और चेहरे को पूरी तरह से छिपाना इसका हिस्सा नहीं है। फिलहाल यह प्रतिबंध सिर्फ स्कूलों में लगाया गया है, कॉलेज या यूनिवर्सिटी में नहीं। वयस्कों पर इस तरह का प्रतिबंध लगाना पेचीदा मामला है। इस्लामी कट्टरपंथ के प्रसार के बाद जर्मनी सहित यूरोपीय देशों में मुंह और सिर ढ़कने की बहस काफी से तेज रही है।

बुर्का और नकाब के विरोधी इसे महिलाओं का दमन करने वाला बताते हैं और यह कहते आए हैं कि छोटी उम्र में ही लड़कियों को चेहरा ढंकने के लिए मजबूर करना उनके अधिकारों के खिलाफ है। चांसलर अंगेला मैर्केल की सीडीयू पार्टी के कुछ नेता देश भर में इस तरह का बैन लगाने की मांग करते आए हैं। लेकिन अब तक ऐसा कानून नहीं बन पाया है, क्योंकि बहुत से लोगों का मानना है कि इससे देश के मुसलमान हाशिए पर पहुंच जाएंगे। उनका कहना है कि पाबंदी लगाने पर बुर्के और नकाब का इस्तेमाल करने वाली महिलाएं अपने घरों में बंद हो जाएंगी और अधिक दमन का शिकार होंगी। कुछ महीने पहले हैम्बर्ग का एक मामला सामना आया था, जहां एक स्कूल ने एक बच्ची को बुर्का पहनने से मना किया था। इसके खिलाफ उसने अदालत में अपील की और अदालत ने स्कूल के आदेश को गलत बताया। अदालत ने कहा कि ऐसा तब ही मुमकिन है जब राज्य सरकार स्कूलों को लेकर कोई कानून बनाए। इसके बाद हैम्बर्ग में बुर्के की पाबंदी के कानून पर बहस छिड़ गई है। जर्मनी के पड़ोसी देशों फ्रांस, नीदरलैंड्स, डेनमार्क और ऑस्ट्रिया में बुर्के पर पूरी तरह पाबंदी है। लेकिन जर्मनी में इसे लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाता है। लेकिन 2019 में हुए एक सर्वे के अनुसार देश में 54 फीसदी लोग बुर्के और नकाब पर प्रतिबंध लगाने के हक में हैं। तो अब सरकारें जनमत का सम्मान कर रही हैं।

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