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ग्लासगो का लक्ष्य हासिल करने की चुनौती

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ग्लासगो का संयुक्त राष्ट्र महासंघ का जलवायु सम्मेलन कई मायने में ऐतिहासिक है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद से हटने के बाद यह पहला जलवायु सम्मेलन था और दुनिया के लिए अच्छी बात यह रही कि जो बाइडेन के नेतृत्व वाला अमेरिका एक बार फिर पेरिस समझौते में लौटा है। यह सबको पता है कि अगर जलवायु परिवर्तन को रोकने और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के किसी समझौते का अमेरिका के बगैर कोई मतलब नहीं है क्योंकि हर पैमाने पर सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन अमेरिका में होता है। सो, अमेरिका का पेरिस समझौते में लौटना और दुनिया के देशों के साथ मिल कर जलवायु परिवर्तन को रोकने का संकल्प करना बड़ी बात है। हालांकि रूस और चीन दोनों के राष्ट्रपति इस समझौते में शामिल नहीं हुए और ग्लासगो की भावना से पूरी तरह से नहीं जुड़े। इसका क्या असर होता है यह आगे पता चलेगा। लेकिन यह कहा जा सकता है कि भारत सहित दुनिया भर में मौसम के अतिरेक के बीच सुधार की गाड़ी पटरी पर लौटी है। glasgow cop26 achieving goal

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन में कई बड़े लक्ष्य घोषित किए, इस तथ्य के बावजूद कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में अमेरिका और चीन जैसे देशों के मुकाबले भारत बहुत पीछे है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2070 तक नेट जीरो यानी कार्बन उत्सर्जन शून्य करने के लक्ष्य का ऐलान किया। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने 2050 तक कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए दोनों देशों ने भारी भरकम फंड की व्यवस्था भी की है। लेकिन उनके साथ भारत की तुलना नहीं की जा सकती है। इसका कारण यह है कि अमेरिका और ब्रिटेन आदि देशों ने कई दशक पहले ही कार्बन उत्सर्जन घटाने और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था। दूसरे, वे विकास और औद्योगिकीकरण के उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां उन्हें बहुत कुछ नया नहीं करना है। इसके उलट भारत अभी तेज गति से विकास के दौर में है, जहां नए उद्योग लगने हैं और करोड़ों लोगों के लिए रोजगार की व्यवस्था करनी है। दूसरे, भारत अब भी बिजली की अपनी जरूरतों का 73 फीसदी थर्मल पावर प्लांट यानी कोयले से चलने वाले संयंत्रों से पूरा करता है और इस सेक्टर में सात लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। इसे हरित ऊर्जा में शिफ्ट होने में बहुत समय लगेगा। तीसरी बात यह है कि दुनिया के अमीर देश भारत जैसे विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई बड़ी आर्थिक मदद नहीं दे रहे हैं, जबकि उनको पता है कि इसकी कीमत बहुत बड़ी है। उनको समझना चाहिए कि दुनिया आज मौसम का अतिरेक झेल रही है तो इसके लिए विकसित और अमीर देश ही जिम्मेदार हैं।

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बहरहाल, तमाम सीमाओं और मुश्किलों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2070 तक भारत में कार्बन उत्सर्जन शून्य करने का संकल्प जाहिर किया। इस तरह भारत के पास इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 50 साल का समय है। यह काफी लंबा समय होता है। अगले कुछ दिन में भारत इस लक्ष्य तक पहुंचने की रूपरेखा तैयार कर लेगा और उस पर अमल शुरू करेगा तो संभव है कि संकल्प, साधन और तकनीक के सहारे इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा। भारत इस संकल्प को हासिल कर लेगा, यह बात प्रधानमंत्री के भाषण से और भारत की तैयारियों से भी जाहिर होती है। प्रधानमंत्री ने ग्लासगो में कुछ और लक्ष्यों की घोषणा की, जिसमें एक संकल्प नवीनीकृत ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाने का है। भारत ने 2030 तक भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का 40 फीसदी हिस्सा नवीनीकृत ऊर्जा यानी हरित ऊर्जा से पूरा करने का संकल्प जताया है। ध्यान रहे भारत में सौर ऊर्जा, पनबिजली, पवन चक्की, परमाणु ऊर्जा आदि की परियोजनाओं अच्छा खासा निवेश हो रहा है और संभवतः इसी वजह से प्रधानमंत्री ने ग्लासगो में ऐलान किया कि भारत अपनी कुल बिजली उत्पादन क्षमता के 50 फीसदी को नवीनीकृत ऊर्जा में तब्दील कर देगा। उन्होंने 2030 तक पांच सौ गीगावाट नवीनीकृत ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय कर दिया है। भारत बहुत आसानी से यह लक्ष्य हासिल कर लेगा क्योंकि अभी भारत की नवीनीकृत ऊर्जा उत्पादन की क्षमता 36 से 38 फीसदी पहुंच गई है। अगले नौ साल में इसे 10 फीसदी बढ़ाना बहुत बड़ी बात नहीं होगी।

प्रधानमंत्री के भाषण की दो बातें और अहम हैं। उन्होंने एक लक्ष्य उत्सर्जन की तीव्रता को कम करने का भी तय किया। उत्सर्जन की तीव्रता को जीडीपी की प्रति ईकाई उत्सर्जन के रूप में भी जाना जाता है। भारत अब तक इसमें कमी करने की ही बात करता रहा है। तभी जब प्रधानमंत्री ने इसे 45 फीसदी तक कम करने का ऐलान किया तो हैरानी नहीं हुई। लेकिन प्रधानमंत्री ने इसके साथ ही हैरान करने वाली घोषणा यह कर दी कि भारत अभी से लेकर 2030 तक एक अरब टन कार्बन उत्सर्जन कम करेगा। यह पहली बार हुआ है, जब भारत ने मात्रा के रूप में कार्बन उत्सर्जन कम करने का इतना बड़ा लक्ष्य घोषित किया है। भारत को अपनी विकास गतिविधियों से समझौता किए बगैर इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बढ़ना है। यह माना जा सकता है कि उत्सर्जन की तीव्रता और एक अरब टन कार्बन उत्सर्जन कम करना एक दूसरे से जुड़े हैं।

भारत ने ग्लासगो में दो प्रस्तावों पर दस्तखत नहीं किए। एक प्रस्ताव जंगल की कटाई से जुड़ा है और दूसरा मिथेन के उत्सर्जन को कम करने का है। चूंकि भारत की बड़ी आबादी कृषि और पशुपालन पर आश्रित है इसलिए जंगल की कटाई और मिथेन के उत्सर्जन को रोकने के किसी भी समझौते में शामिल होने से भारत की बड़ी आबादी प्रभावित होती। गौरतलब है कि मिथेन गैस का उत्सर्जन मुख्य रूप से पशुओं की वजह से होता है और कृषि योग्य भूमि तैयार करने या औद्योगिकीकरण व आवास की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी वनों की कटाई हो रही है। भारत को इस बड़ी आबादी की आजीविका का ध्यान रखते हुए विकास करना है और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को रोकना है। प्रधानमंत्री के तय किए लक्ष्य के लिहाज से भारत के पास पर्याप्त समय है और वह एक ठोस, सुनियोजित और हर क्षेत्र का ध्यान रखने वाली योजना के तहत इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में बढ़ सकता है।

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By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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