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महिला प्रगति की उलटी दिशा

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inequality gender gap corona महिलाओं की जितनी कमजोर स्थिति राजनीति में है, उससे कहीं ज्यादा आम परिवारों के भीतर है। ये सूरत बीते दशकों में थोड़ी बदल रही थी। लेकिन अब बाजार के बिगड़ते हाल ने महिलाओं को फिर से घरों के अंदर बैठने और पुरुषवादी पारिवारिक व्यवस्था के दायित्वों को निभाने के लिए मजबूर कर दिया है।

लैंगिक समता की कसौटी पर भारत की स्थिति पहले भी बेहतर नहीं थी। लेकिन अब बने देश में माहौल और कोरोना महामारी के प्रभाव ने हालत और बिगाड़ दी है। इस बात की तरफ पहले भी ध्यान खींचा गया है। लेकिन हाल में आई 2021 की वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम की ‘ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स’ रिपोर्ट ने बताया है कि हाल कितनी तेजी से बिगड़ रहा है। फोरम के इस इंडेक्स में 156 देशों के बीच भारत अब नीचे 17वें स्थान पर है। मतलब साफ है। देश में महिलाओं की स्थिति लगातार खराब हो रही है।

हाल में केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई महिला मंत्री शामिल हुईं। इसके बावजूद महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत दक्षिण एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में से एक बना हुआ है। भारत से खराब स्थिति सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान की है। जबकि बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और भूटान सभी भारत से आगे निकल चुके हैं। महिलाओं के राजनीतिक रूप से सशक्त होने के मामले में भारत का रैंक इस साल 51 हो गया है। यह पिछले साल 18 था। इसका मतलब है कि जो भी कानून बनाए जाते हैं, उनके लिए होने वाली चर्चा में महिलाओं का पक्ष और उनके हित ठीक नहीं झलक पाते। मसलन जनसंख्या नियंत्रण कानून को लें। जनसंख्या नियंत्रण कानून असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में तैयार किया जा चुका है, जबकि कई अन्य भाजपा शासित राज्य ऐसे कानून बनाने की अभी तैयारी कर रहे हैं।

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इस कानून में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने पर चुनाव लड़ने से रोक और सरकारी सब्सिडी खत्म किए जाने का प्रावधान है। इस कानून से सबसे ज्यादा प्रभावित महिलाएं होंगी। जाहिर है, महिलाओं का बिना हित जाने पुरुषवादी सोच के तहत ऐसे कानून समाज पर थोपे जा रहे हैँ। ये गौरतलब है कि ज्यादातर राज्यों में कुल मतदाताओं की करीब 50 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेकिन इन चुनावों में महिला उम्मीदवार मात्र 10 फीसदी रही हैं। हाल के हुए विधानसभा चुनावों में केरल में 9 फीसदी और असम में 7.8 फीसदी महिलाएं ही उम्मीदवार थीं। तमिलनाडु, पुडुचेरी में करीब 11 फीसदी उम्मीदवार महिलाएं रहीं। बहरहाल, महिलाओं की जितनी कमजोर स्थिति राजनीति में है, उससे कहीं ज्यादा आम परिवारों के भीतर है। ये सूरत बीते दशकों में थोड़ी बदल रही थी। लेकिन अब बाजार के बिगड़ते हाल ने महिलाओं को फिर से घरों के अंदर बैठने और पुरुषवादी पारिवारिक व्यवस्था के दायित्वों को निभाने के लिए मजबूर कर दिया है।

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