सोने की महंगाई संकट का संकेत!

भारत में सोने की कीमत आसमान छू रही है। इसकी कीमत 56 हजार रुपए प्रति दस ग्राम पहुंच गई है। आम आदमी को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि जब इतना भारी आर्थिक संकट है तो सोने के भाव इस कदर क्यों बढ़ रहे हैं? लोग घनघोर आर्थिक संकट में हैं, इस साल कोरोना वायरस की वजह से लाखों की संख्या में शादियां रद्द हुई हैं, महीनों तक आभूषणों की दुकानें बंद रही हैं, लॉकडाउन खत्म हो गया तब भी दुकानदार बैठ कर मक्खियां मार रहे हैं, फिर भी सोने के भाव में तेजी का क्या कारण है?

कहा जा रहा है कि सोने के आयात में कमी हुई है। सवाल है कि कोरोना वायरस के कारण अगर आयात कम हुआ है तो उसी वायरस के कारण आम लोगों ने खरीद भी कम की है, फिर कीमत क्यों बढ़नी चाहिए? फिर तो कीमत स्थिर रहनी चाहिए!

कीमत स्थिर रहने की बजाय बढ़ रही है तो उसका एक ही कारण समझ में आता है कि आम लोग भले सोना नहीं खरीद रहे हों पर जिनके पास बड़ी मात्रा में नकद पैसे हैं उन्होंने सोना खरीदा है। असल में जिन लोगों के पास पैसा है वे घनघोर आर्थिक मंदी की आहट सुन रहे हैं। उनको लग रहा है कि कारोबार, उद्योग में पैसा लगाना अब मुनाफे का सौदा नहीं है। उलटे पैसा डूबने का खतरा बढ़ा हुआ है। तभी उन्होंने सोने में पैसा निवेश करना शुरू किया है।

अगर ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि आठ नवंबर 2016 को रात आठ बजे नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही सोने की खरीद बढ़ने लगी थी और तभी से इसकी कीमत भी तेजी से बढ़ने लगी। पिछले चार साल में सोने की कीमत में 60 फीसदी से ज्यादा इजाफा हुआ है। जिनके पास नकद पैसे हैं उन्होंने अपने कारोबार को बढ़ाने में पैसा निवेश नहीं किया, बल्कि उसे सुरक्षित रखने के लिए सोने में निवेश किया।

नोटबंदी की वजह से लोगों का भरोसा अर्थव्यवस्था पर से उठने लगा। पूंजीपति के अंदर जो एक एनिमल इन्सटिंक्ट होता है वह मरने लगा। उसने पैसा निवेश करके कारोबार बढ़ाने की बजाय हाथ खींचना शुरू किया। इसकी वजह से काम धंधे बंद हुए और लोगों की नौकरियां गईं। बैंकों का एनपीए बढ़ने लगा। पैसे होने के बावजूद कर्ज नहीं चुकाने वाले विलफुल डिफॉल्टर्स की संख्या बढ़ने लगी। बैंकों में ब्याज दर लगातार गिरने लगी और तभी लोगों ने बैंकों से भी पैसे निकाले और उसे सोने में निवेश किया।

आठ नवंबर 2016 को जब नोटबंदी का ऐलान हुआ था तब बाजार में कुल 18 लाख करोड़ रुपए की नकदी थी, जिसमें से 15 लाख 28 हजार करोड़ रुपए पांच सौ और एक हजार के नोट की शक्ल में थे। जब उस फैसले से काले धन को खत्म करने का दावा विफल होने लगा तब कहा गया था कि इससे कैशलेस की अर्थव्यस्था फले-फूलेगी। पर आज हकीकत यह है कि बाजार में 27 लाख 32 हजार करोड़ रुपए की नकदी है, जिसका ज्यादातर हिस्सा पांच सौ और दो हजार के नोटों की शक्ल में है।

सोचें, नोटबंदी के बाद चार साल से कम समय में नकदी की मात्रा 50 फीसदी बढ़ गई। इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात है कि इतनी नकदी बाजार में होने के बावजूद चारों तरफ हाहाकार है। लोग पैसे के लिए तरस रहे हैं। न कहीं बाजार में भारी-भरकम खरीदारी होती दिख रही है और न नए कारोबार की आहट सुनाई दे रही है। 27 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा नकदी बाजार में होने के बावजूद उसके अर्थव्यवस्था में दिखाई नहीं देने के दो ही कारण समझ में आते हैं। पहला तो यह कि लोगों ने भविष्य की चिंता में पैसा दबा लिया है और दूसरा यह कि सोने में निवेश कर दिया।

वैसे यहां यह भी समझना जरूरी है कि सोने का महंगा होना हमेशा बड़े आर्थिक या किसी अन्य किस्म के वैश्विक संकट का संकेत होता है। सोने की कीमत को लेकर एक दिलचस्प तुलना पिछले दिनों देखने को मिली। आज सोने की कीमत 56 हजार प्रति दस ग्राम है परंतु अगर मुद्रास्फीति की दर को एडजस्ट करें तो 1980 की जनवरी में सोने की कीमत इससे ज्यादा बैठती है। वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल ने बताया है कि दुनिया में सोना अब तक की सर्वाधिक ऊंची कीमत पर 1980 की जनवरी में बिका था। गोल्ड कौंसिल के हिसाब से दूसरी बार सोने की कीमत में बड़ा इजाफा 2011 में हुआ था।

दो मौकों पर जब सोने की कीमत सर्वाधिक थी उस समय भी दुनिया में बड़ी उथलपुथल मची थी। सबको 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी का पता है। अमेरिका के सब प्राइम क्राइसिस ने वहां की अनके बड़ी वित्तीय संस्थाओं को कंगाल बनाया था, जिसका असर सारी दुनिया पर हुआ था। 2011 को उस संकट का चरम कह सकते हैं। उससे पहले 1980 में भी अनेक घटनाक्रम हो रहे थे। ईरान में तख्तापलट की घटना हुई थी, कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई थी और अफगानिस्तान में रूस ने हस्तक्षेप करके अमेरिका का वर्चस्व वहां से खत्म करने का प्रयास किया था। इसके अलावा भी कई घटनाएं हो रही थीं, जिनसे दुनिया प्रभावित हो रही थी। उसी तरह से आज कोरोना वायरस का वैश्विक संकट चल रहा है। भारत में यह संकट इसलिए ज्यादा हो गया क्योंकि यहां चार साल पहले नोटबंदी हुई थी।

सो, अब एक पूरी तस्वीर बनती है। पहले नोटबंदी हुई, जिससे अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा। लोगों का अपनी मुद्रा से भरोसा उठा। कारोबारियों और उद्यमियों का अर्थव्यवस्था पर से भरोसा उठा। उसी समय से लोगों ने पैसा दबाना शुरू किया और सोने में उसका निवेश शुरू किया। आठ नवंबर 2016 की रात आठ बजे के बाद अगले चार घंटे में रिकार्ड मात्रा में सोना खरीदा गया था। वह प्रक्रिया उसके बाद अनवरत जारी रही। जिनके पास बड़ी मात्रा में नकदी थी उन्होंने बुलियन बाजार से सोना खरीद लिया। तभी बाजार में ज्यादा नकदी होने के बावजूद संकट गहराता जा रहा है।

अब यहचर्चा, कयास है कि सरकार सोने को लेकर नोटबंदी टाइप की योजना पर विचार कर रही है। सरकार लोगों से कहने वाली है कि उनके पास आय से अधिक संपत्ति के रूप में अगर सोना है तो उसकी घोषणा करें और उस पर कर चुका कर उसे वैध बनवाएं। नकदी को लेकर वालंटरी डिस्क्लोजर स्कीम यानी वीडीएस के रूप में स्वैच्छिक आय की घोषणा की योजना पहले भी आई थी। इस किस्म की एक योजना ‘विवाद से विश्वास तक’ अब भी चल रही है। अगर सोने को लेकर ऐसी कोई योजना आती है तो नोटबंदी से शुरू हुआ बरबादी का चक्र सोनाबंदी पर जाकर पूरा होगा।

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