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कालम लिखने की हिम्मत व विश्वास डाक्टर से मिला!

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दो साल पहले जब कनाडा गया था हाथ से लिखकर बेटे से उसका व्हाटसएप करवाता था। पहला लेख भेजने के बाद इसे टाइप करने वाले विकास और मोहन को फोन करके पूछा कि मेरा लेखन समझ तो जाओगे कि नहीं। मेरी लिखने की क्षमता पर बहुत असर पड़ा है व मेरी लेखनी बहुत खराब हो गई है। कई बार तो अपना लिखा हुआ भी नहीं पड़ पाता हूं।

मेरे साथ एक बड़ी समस्या यह है कि जीवन में जो कुछ भी अहम व यादगार चीजें पढ़ी है उन्हें आज तक याद रखे हुए हूं पर जीवन में शायद ही मैं उनसे कुछ सबक लिया हो या उन पर अमल किया हो। जब मैं बाबा खड़कसिंह मार्ग पर रहता था तो मेरे घर के पास एक बहुत बड़ा चर्च था। उसके प्रांगण में एक बोर्ड लगा हुआ था। उस पर हर दिन एक वाक्य लिखा जाता था जैसे कि मैंने एक बार पढ़ा कि why to worry it may not happen मतलब यह कि आप कुछ बातों को सोच कर परेशान क्यों होते हैं, हो सकता है कि वो कभी सच साबित न हो।’’ मैं इस वाक्य से काफी प्रभावित भी हुआ।

आज भी जब कभी किसी सोच से प्रभावित होता हूं तो बुरे की आशंका से घबराने लगता हूं। मुझे बहुत अच्छा लगने के बाद भी मैं उस पर अमल नहीं कर पाया। न तो कभी बुरे की आशंका से घबराना बंद किया और न खुद को चिंता मुक्त कर जीना सीखा। वही स्थिति आज भी है। मैंने खुद अनुभव किया है कि हम लोग अक्सर अपने जीवन में उन संकटों की संभावनाओं से घबराते है जो कि वास्तव में हमारे सामने आती ही नहीं और हम लोग बेवजह परेशान रहते हैं। पर क्या करुं कि ऐसी आदत है जो कि मिटती ही नहीं है। जैसे-जैसे उमर बढ़ती जा रही है मेरा बेवजह घबराना भी बढ़ता जा रहा है।

मैंने दूसरी यह बात भी याद रखी है कि हमारी छोटी सी लापरवाही भी हमारे लिए बहुत मंहगी साबित होती है। जब बचपन में कभी कभार रेलवे स्टेशन जाया करता था तो वहां रेल की पटरियों के पास लगा यह बोर्ड देखा करता था जिस पर लिखा होता था कि ‘‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’’ यह वाक्य मुझे आज भी याद है और मैं उस पर अमल करने के बजाए उसे आज भी भूल रहा हूं।

यह भूलना कितना मंहगा साबित हो सकता है इसका मुझे हाल ही में अहसास हुआ। करीब 20-22 साल पहले मेरे दिल का आपरेशन हुआ था व डाक्टर ने दिल में वाल्व लगाया था तब उन्होंने कुछ बातों से आगह किया था कि दाढ़ी बनाते समय सावधानी बरतना क्योंकि वाल्व लगाए जाने के कारण तुम्हें खून पतला करने वाली दवा दी जा रही है। इस कारण अगर कहीं कुछ कट गया तो खून का थक्का जमने में काफी देर लगेगी।

मैंने यह बात याद रखी व शेव करने के लिए काफी मंहगे व उच्च कोटि के जिलेट रेजर का इस्तेमाल करने लगा पर हाल ही में शेव करते समय मेरा अपर ओंठ कट गया। बड़ी तेजी से खून निकलने लगा। काफी देर तक घाव को दबाए रखने व फिटकरी से लेकर सरसों का तेल तक लगाने के बाद भी जब खून नहीं रूका तो हालात की गंभीरता को देखते हुए पड़ौसियों की मदद से घर के पास स्थित धर्मशिला अस्पताल गया।

वहां इमरजेंसी में डाक्टरों ने घाव की सफाई कर मेरी पट्टी कर दी मगर रात भर धीरे धीरे खून बहता रहा। सुबह पुनः पत्नी अस्पताल लेकर गई। रातवाला डाक्टर वहीं मौजूद था। कुछ और डाॅक्टर बुलाए गए। एक महिला डाक्टर ने यह पता चलने पर कि मेरे दिल का आपरेशन हो चुका है मेरे घाव की सैलफोन पर तस्वीर लेकर उन्हें मेरे दिल के विशेषज्ञ डाॅक्टर को भेज दिया जो कि उसी अस्पताल में काम करते थे। मुझे सुखद आश्चर्य तब हुआ जब कि कुछ देर बाद में दिल के विशेषज्ञ डाक्टर सजल गुप्ता वहां आए और प्यार से मेरा हाल चाल पूछते हुए मुझे न घबराने की सलाह दी।

उनका कहना था कि क्योंकि मैं खून पतला करने की दवाएं ले रहा था अब उसका थक्का नहीं जम पा रहा था व ओंठ के ऊपर हिस्से में खून की काफी नसें होने के कारण खून बह रहा था। उन्होंने कुछ दिनों तक अपने खून पतला करने वाली दवाएं नहीं लेने की सलाह दी। डाक्टरों ने नए सिरे से इलाज शुरु किया कुछ इंजेक्शन लगाए जाने व मरहम पट्टी के बाद मैं घर लौट आया। हालांकि यही डर लगा रहा कि कहीं फिर से खून न बहने लगे। अंततः खून का बहना बंद हो गया व मैंने चैन की सांस ली।

अस्पताल ने जांच के बाद बताया कि चूंकि घाव गहरा नहीं था व मैंने दवा बंद कर दी थी इसलिए अब कोई खतरा नहीं है। खून बहना पूरी तरह से रूक गया था। सच कहूं तो डा. सजल गुप्ता को आते देखते हुए मुझे लगने लगा था कि अब मेरी समस्या दूर होने में देर नहीं लगेगी। वे बेहद प्यार से व विश्वास के साथ बात करते हैं। उन्होंने वहां मौजूद डाक्टरों को मेरे बारे में बताया कि मैं एक पत्रकार हूं। इसके साथ ही मुझ से पूछा कि तुमने कालम लिखना शुरु किया या नहीं?

सच कहूं तो दोबारा कालम लिखने के लिए मेरे मन में हिम्मत व विश्वास पैदा हुआ उनमें उनका बड़ा हाथ है। उनका व्यवहार देखकर मुझे याद आया कि 1999 में मेरे दिल का आपरेशन करने वाले विशेषज्ञ डॅ. वेणु गोपाल ने मुझसे कहा था कि डाक्टर और मरीज का रिश्ता बहुत खास किस्म का होता है। डाक्टर का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि उसके व्यवहार से ही मरीज के दिल में यह विश्वास पैदा हो जाए कि यह डाक्टर मुझे पूरी तरह से ठीक कर देगा। संयोग से डा. सजल गुप्ता के व्यवहार को देख कर कुछ ऐसा प्रतीत होता है।

जब कनाडा से लौटने के बाद मैंने उनसे कहा कि मैं वहां जब रहा तो लंबे अरसे तक अपने कुछ परीक्षण न होने के कारण बहुत डरा था कि कहीं कोई गड़बड़ न हो जाए। तब उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था कि तुम्हारा आपरेशन हुए इतना समय बीत गया जब अब तक कुछ नहीं बिगड़ा तो अब गड़बड़ी क्यों होगी? कनाडा में तो आप को आपात हालात के अलावा डाक्टर देखता ही नहीं है। वहां मेरे जैसे लोगों के लिए सबसे बड़ी समस्या तो डाक्टरों की उपलब्धता है।

यह सब देख कर लगने लगा कि इस मामले में हिंदुस्तान तो मानो स्वर्ग है। जब पंडारा रोड सरीखा वीवीआईपी इलाका छोड़ा तो लगता था कि कहां रहने आ गया हूं। पर हाल ही में धर्मशिला सरीखे अस्पताल की मौजूदगी व डाक्टरों के स्वभाव को देखकर लगता है कि कुछ गलत नहीं किया। वक्त भी क्या चीज है कि उम्र बढ़ने के साथ साथ हमारी सोच भी बदलती जाती है।

हमारे नानाजी न्यायाधीश थे वह कहते थे कि भगवान न करें कि कभी दुश्मन को भी अस्पताल या अदालत से सामना हो। बाकी बचा हुआ कोविड संक्रमण के दौरान देखने को मिला। जब अस्पताल तक में कोई किसी की सुनता तक नहीं था। अब डाक्टर व भगवान का नाम लेकर दोबारा लिखना शुरु किया है। सच कहूं तो मेरा लिए लिखना मानो एक तरह की तलब है। बिना लिखे लगता है कि जीवन में कुछ बहुत जरुरी छूट गया है।

दो साल पहले जब कनाडा गया था हाथ से लिखकर बेटे से उसका व्हाटसएप करवाता था। पहला लेख भेजने के बाद इसे टाइप करने वाले विकास और मोहन को फोन करके पूछा कि मेरा लेखन समझ तो जाओगे कि नहीं। मेरी लिखने की क्षमता पर बहुत असर पड़ा है व मेरी लेखनी बहुत खराब हो गई है। कई बार तो अपना लिखा हुआ भी नहीं पड़ पाता हूं। भगवान से यही प्रार्थना है कि वह मेरी लिखने की क्षमता में बढ़ोत्तरी करे ताकि मुझे जिंदा रहने की वजह मिलना जारी रहे।

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