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ऐसे पैकेजों से क्या होगा?

केंद्र सरकार की मानें तो उसने पिछले हफ्ते अर्थव्यवस्था के लिए तीसरा प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया। बताया गया कि यह 2,65,080 करोड़ रुपयों का पैकेज है। इसमें रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए एक नई योजना, तनाव से गुजर रहे 26 सेक्टरों के लिए कुछ कदम, और संपत्ति खरीदने वालों और रियल एस्टेट डेवलपरों के लिए कुछ कदम हैं। इसके तहत भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के साथ पंजीकृत कंपनियां अगर नए लोगों को या मार्च से सितंबर के बीच नौकरी गंवा चुके लोगों को नौकरी पर रखती हैं, तो उन्हें सरकार की तरफ से कुछ लाभ मिलेंगे। मगर सवाल यह है कि जिस वजह से लोगों को निकाला गया अगर वे कायम रहेंगी तो कौन सी कंपनी किसी को नौकरी पर रखेगी? साफ है कि सरकार ने पिछले दो पैकेजों और दूसरे छोटे छोटे कदमों से कोई सबक नहीं सीखा है। मार्च के अंत में केंद्र सरकार महामारी से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए पहले आर्थिक पैकेज लेकर आई थी, जिसे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना कहा गया था।

मई में कोविड-पैकेज की दूसरी किस्त आई। इसमें किसानों, प्रवासी श्रमिकों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए कुछ कदम थे। सरकार का दावा है कि तीसरे चरण के पैकेज के साथ वो अभी तक कुल 29,87,641 करोड़ रुपयों के प्रोत्साहन कदमों की घोषणा कर चुकी है। जबकि तमाम जानकारों का यह कहना रहा है कि अर्थव्यवस्था को जो घाटा हुआ है, उसकी भरपाई के लिए जितनी रकम के पैकेज की आवश्यकता थी, उतनी धनराशि कभी सरकार ने जारी ही नहीं की। फिर जिन कदमों की घोषणा सरकार ने की भी उनमें सरकारी खर्च का अनुपात बहुत कम था। ऐसे में इन पैकेजों से वास्तविक राहत मिलने की उम्मीद बहुत कम थी। अर्थव्यवस्था में मूल संकट मांग का है। मतलब लोग आवश्यक चीजों के अलावा और कुछ खरीद नहीं रहे हैं। लॉकडाउन हटने के बाद मांग कुछ हद तक बढ़ी है, लेकिन उतनी नहीं, जिससे की अर्थव्यवस्था में गति या खुशहाली आ सके। आम अनुभव है कि इस समय त्योहारों का मौसम होने के बावजूद बाजारों में उतनी खरीद-बिक्री नहीं हो रही है, जितनी इस सीजन में होती थी। इस समय सिर्फ टेलीकॉम, फार्मा, आईटी और एफएमसीजी जैसे चुनिंदा क्षेत्रों को छोड़ कर बाकी सब क्षेत्रों में गिरावट चल रही है। यानी यह नहीं कहा जा सकता कि पूरी अर्थव्यवस्था में सुधार आ गया है। मगर सरकार पैकेज के अपने नजरिए पर कायम है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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