चीन को डराना है जरूरी!

भारत क्या चीन से डर रहा है या उसकी सैनिक, कूटनीतिक और आर्थिक ताकत को लेकर वह आशंकित है, जिसकी वजह से टकराव मोल लेने की बजाय जल्दी से जल्दी समझौते की पहल कर रहा है? भारत के उलट चीन समझौते को अपना विशेषाधिकार मान रहा है और भारत के साथ गैर-बराबरी का बरताव कर रहा है। लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा, एलएसी पर चीन के साथ दो महीने चले विवाद को सुलझाने के लिए चल रही वार्ताओं के बीच चीन के राजदूत का बयान उसकी मानसिकता को दिखाता है। चीनी राजदूत ने कहा है कि भारत किसी गलतफहमी में  न रहे और चीन के सहयोगी की तरह काम करे। दुनिया के किसी देश की कूटनीतिक भाषा ऐसी नहीं हो सकती है, जैसी चीन बार बार भारत के लिए इस्तेमाल कर रहा है।

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा क्यों है कि चीन इस भरोसे में है कि वह उत्तर और पूर्वी दोनों सीमा पर भारत की जमीन का अतिक्रमण कर लेगा और भारत लड़ने की बजाय उससे समझौते की बात करेगा? चीन क्यों यह सोच रहा है कि वह ट्रेड वार में भारत को दबा देगा और फिर भी भारत उसके साथ ट्रेड वार शुरू नहीं करेगा? चीन इस भरोसे में भी क्यों है कि वह कूटनीतिक दांव में भारत को मात दे देगा, जैसा कि उसने ईरान के साथ मिल कर किया है फिर भी भारत दुनिया के मंच पर उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाएगा? चीन की इस सारी सोच के पीछे भारतीय नेतृत्व की कमजोरी है। निर्णायक नेतृत्व और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भारत किसी भी मोर्चे पर चीन के खिलाफ तन कर खड़ा नहीं हो रहा है। प्रतीकात्मक रूप से कुछ चाइनीज एप्स को प्रतिबंधित करके भारत सरकार ने सिर्फ फेस सेविंग की है।

अब तक सारी सरकारों का चीन के प्रति ऐसा ही रुख रहा है। चीन संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर का मुद्दा उठा चुका है और उसकी शह पर पाकिस्तान अक्सर यह मुद्दा उठाता है। चीन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, एनएसजी में भारत का रास्ता रोके हुए है। इसके बावजूद किसी सरकार में हिम्मत नहीं हुई है कि वह किसी बहुपक्षीय मंच पर चीन को लेकर सवाल उठाए। पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि सरकार को वन चाइना पॉलिसी को चुनौती देनी चाहिए। हांगकांग, तिब्बत और ताइवान का मसला उठाना चाहिए। भारत इशारों में भी इन मुद्दों का जिक्र करे तो चीन को चिंता होगी। चीन में मुसलमानों की स्थिति को लेकर भारत सवाल उठा सकता है, इस पर भी भारत को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का समर्थन मिलेगा। पहली बार ऐसा हुआ है कि अमेरिका ने भारत से चलने वाली तिब्बत की निर्वासित सरकार को एक मिलियन डॉलर की मदद दी है। पहली बार ही ऐसा हुआ है कि दक्षिण चीन सागर पर बने ट्रिब्यूनल के फैसले का अमेरिका ने समर्थन किया है और चीन के वर्चस्व बढ़ाने की सोच का विरोध किया है। सो, भारत के लिए यह मुफीद समय है कि वह चीन को सामरिक, कूटनीतिक और आर्थिक तीनों मोर्चे पर डराए।

मुश्किल यह है कि भारत की मौजूदा सरकार चीन की किसी भी दुखती रग पर हाथ रखने से डरती है। चीन की एक दुखती रग दलाई लामा हैं, जिनको लेकर नरेंद्र मोदी की सरकार ने हमेशा यह ध्यान रखा है कि कोई ऐसा काम नहीं हो, जिससे चीन नाराज हो। तभी प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने एक बार भी दलाई लामा को उनके जन्मदिन की बधाई नहीं दी। पिछले दिनों दलाई लामा का जन्मदिन गुजरा पर देश और दुनिया के हर छोटे-बड़े नेता को बधाई देने वाले प्रधानमंत्री ने उनको बधाई नहीं दी। उनकी सरकार ने चीन की संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए दलाई लामा की सारी राजनीतिक गतिविधियां एक तरह से बंद करा दी हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार ने ही चीन के दबाव में आकर ताइवान को चाइनीज ताइपेई कहने की हामी भरी। एयर इंडिया की उड़ानों में ताइवान को चाइनीज ताइपेई कहा जाता है। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने ही 2003 में तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था।

वन चाइना पॉलिसी, दलाई लामा, मुस्लिम गुलग ये ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें भारत उठा सकता है और उसके बाद चीन की आंखों में आंखें डाल कर, बराबरी में उससे बात कर सकता है। चीन इन मुद्दों पर बैकफुट पर है। कोरोना वायरस का संक्रमण फैलाने में उसकी भूमिका को लेकर दुनिया के देश वैसे भी उससे नाराज हैं। अगर भारत पहल करता है तो कूटनीतिक मोर्चे पर चीन को घेरा जा सकता है। भारत का दूसरा हथियार ट्रेड वार है। दुनिया के जिस भी देश के साथ चीन को ट्रेड एडवांटेज है उसके खिलाफ वह हमेशा इसका इस्तेमाल करता है। भारत के साथ चीन के कारोबार में एडवांटेज भारत के पास है। लेकिन भारत अपने इस एडवांटेज का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। महज दिखावे के लिए और लोगों के तात्कालिक गुस्से को ठंडा करने के लिए भारत ने कुछ चाइनीज एप्स पर पाबंदी लगा दी। यह सिर्फ प्रतीकात्मक कदम है।

जहां तक चीन की सैन्य ताकत का सवाल है तो भारत के संदर्भ में यह एक अतिरंजित धारणा है। चीन मजबूत है इसमें कोई संदेह नहीं है पर भारत कमजोर नहीं है। ध्यान रहे युद्ध सिर्फ सैनिकों की संख्या और हथियारों की मात्रा से नहीं लड़ा जाता है। युद्ध रणनीति से लड़ा जाता है और उसमें मनोवैज्ञानिक ताकत सबसे बड़ी ताकत होती है। इसी ताकत के दम पर वियतनाम जैसे छोटे से देश ने अमेरिका, फ्रांस और चीन तीनों को लंबे चले युद्ध में बहुत गहरे घाव दिए और इन देशों को थक-हार कर पीछे हटना पड़ा। भारत भी चीन को ऐसे घाव दे सकता है। ऊंचे पहाड़ों पर और घने जंगलों के युद्ध, जिसे हाइब्रीड माउंटेन वारफेयर कहा जाता है, उसमें भारत की सेना चीन के मुकाबले ज्यादा दक्ष है। भारत की वायु और थल सेना दोनों चीन से बेहतर कौशल और दक्षता वाली है। गलवान घाटी की लड़ाई में भारत ने 1962 में भी चीन के छक्के छुड़ाए थे और इस बार भी 15 जून की रात को भारतीय सैनिकों ने चीन को गहरे घाव दिए।

भारत की एकमात्र कमजोरी यह है कि देश में जोखिम लेने वाला नेतृत्व नहीं है और राजनीतिक इच्छाशक्ति भी नहीं है। तभी दुनिया में यह धारणा बनी है कि भारत एक ‘लैंब’ स्टेट है, जिसके एक तरफ ‘वूल्फ’ चीन है और दूसरी ओर ‘जैकाल’ पाकिस्तान। भारत को यह धारणा बदलनी होगी। लेकिन उसके लिए भारत को निर्णायक नेतृत्व और राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी। सरकार को डर के साथ साथ कारोबारी मानसिकता भी छोड़नी होगी। अन्यथा चीन एक के बाद एक रणनीतिक बढ़त हासिल करता जाएगा, जैसा उसने डोकलाम में हासिल किया, वह भी बिना कोई गोली चलाए। लद्दाख में भी अभी ऐसा ही हो रहा है, जिसे पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन ने एक खतरनाक पैटर्न कहा है। अगर सरकार इसी तरह से चीन को एडवांटेज देती गई तो बड़ा नुकसान होगा। यह सही है कि युद्ध से समस्याएं नहीं सुलझती हैं लेकिन युद्ध कई समस्याओं का समाधान है, खास कर चीन जैसे वर्चस्ववादी देश के लिए।

One thought on “चीन को डराना है जरूरी!

  1. हकीकत ये चीन जब चाहे भारत की बंजर जमीन पर कब्जा कर सकता हैं और वो कब्जा इतना बड़ा नहीं है की जंग की जाए ।भारत को जब दबाव में लाना होता है वो कब्जा करता हैं अगर भारत उसकी बात मान जाता हैं तो वो पीछे हट जाता हैं । इस लिए भारतीय नेता डरे रहते हैं कि चीन नाराज न हो जाए ।

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