मोदी कोच, अमित शाह कप्तान!

यों नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री सरकार के मुखिया है। बावजूद इसके सोचे कि अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने क्यों अमित शाह को नागरिकता बिल का खलनायक करार दे कर उन पर पाबंदी की बात की? क्या अमेरिका में इतनी समझ नहीं है कि सरकार के मुखिया जब नरेंद्र मोदी हैं तो वे ही सरकार के विधेयक के जिम्मेवार हैं? लेकिन सबको समझ आ रहा है कि भारत की मौजूदा सरकार की पारी में खेल का बल्ला किसके हाथों में है। नरेंद्र मोदी ने बहुत समझदारी से सरकार और उसकी दूसरी पारी खेलने की कप्तानी अमित शाह को दी हुई है।

क्यों? एक कारण मोदी सरकार के पहले कार्यकाल का फ्लॉप एजेंडा है। आर्थिकी का सत्यानाश है। लोगों में अच्छे दिन का ख्याल भी दुस्वप्न है तो क्लीन इंडिया, शौचालय इंडिया, योग इंडिया से ले कर मन की बात से ऐसा कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ जिस पर इतराया जाए।

सो ले दे कर हिंदू इंडिया है और उसकी तासीर सिर्फ अमित शाह की है। इसलिए मई 2019 में शपथ के बाद संसद के बजट, मानसून और शीतकालीन तीनों सत्रों का लबोलुआब यदि कोई है तो उन तमाम मसलों पर काम है जिससे यह नैरेटिव पुख्ता होता जा रहा है कि अमित शाह असली लौह पुरूष हंै! इससे नरेंद्र मोदी को कोई नुकसान नहीं होना है। गुजरात में भी गृह मंत्री रहते हुए हिंदू गुजरात की मशाल में अमित शाह काम करते रहे थे तो केंद्र सरकार में भी उनकी बहादुरी से नरेंद्र मोदी को ही फायदा है। फालतू बात है कि अमित शाह की कीर्ती से नरेंद्र मोदी खटकेंगे या अमित शाह की महत्वाकांक्षा को पंख लग रहे हैं।

दरअसल अमित शाह साबित कर दे रहे हैं कि भारत राष्ट्र-राज्य, उसकी संस्थाओं, संसद, कार्यपालिका से वे तमाम काम चुटकियों से हो सकते हैं जिन्हे कभी असंभव माना जाता था। यह बड़ी बात है और अमित शाह की नंबर एक उपलब्धि यह है कि वे असंभव को संभव कर दिखा रहे हैं। राज्यसभा में जिस तरह बहुमत मैनेज है वह बानगी है कि दो-तीन साल में संसद के दोनों सदनों में भाजपा का कितना जबरदस्त बहुमत होगा और तब वे काम भी कराए जा सकेंगे जिनकी कल्पना भी नहीं है। यदि संविधान को बदल कर उसमें से सेकुलर शब्द हटाना हुआ या हिंदू राष्ट्र घोषित करना हुआ तो वह काम भी चुटकियों में आगे वैसे ही हो जाएगा जैसे अनुच्छेद-370 को खत्म करने का या एनआरसी का होने वाला है। अमित शाह की इस बात को हल्के में न लिया जाए कि 2024 तक एनआरसी और घुसपैठियों को निकाल बाहर करेंगे। मतलब कानून बनना, संस्थागत काम होना निश्चित ही होगा। और यदि वहा तक पहुंचे तो संविधान में शब्दों को हटाना या लाना या व्यवस्था में परिवर्तन भला कौन सा मुश्किल काम है?

सोचें यदि संसद के हर सत्र के साथ ऐसे काम होता गया तो 2019-24 की पंचवर्षीय सियासी योजना में क्या-क्या होगा? और जान लें उन सबसे लोगों को रोजी-रोटी की चिंता भी नहीं बनेगी। न ही कांग्रेस व विपक्ष हिंदू वोटो के बीच खड़ा हो पाएगा। वह सब फिर अमित शाह की कप्तानी की छाप भी लिए हुए होगा।

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