इतना तो अच्छा हिंदू यज्ञ!

हां, यह दूसरा पक्ष है! एक देशभक्त ने कहा, बहुत जरूरी थी जेएनयू में लेफ्टिस्टों की ठुकाई। वहां टुकड़े-टुक़ड़े गैंग ने राष्ट्रवादी छात्रों का जीना हराम किया हुआ था। अब लेफ्टिस्टों को हमेशा ठुकाई याद रहेगी। दूसरे देशभक्त ने बताया कि जामिया में यदि पुलिस घुस कर नहीं मारती तो सड़कों पर तांडव चलता रहता। इन सबसे बड़ा खुलासे वाला बयान अमित शाह का यह वाक्य है कि एक इंच पीछे नहीं हटेंगे!

सोचें इस वाक्य का अर्थ? न एक इंच घबराहट, न एक इंच संवाद, न विरोध-विपक्ष को एक इंच जमीन और न एक इंच पीछे हटना।

याद करें आजाद भारत के पिछले इतिहास को। इंदिरा गांधी और डॉ. मनमोहन सिंह के वक्त को। तब सत्तावान घबराते थे। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री आंदोलन-प्रदर्शनों का समाधान निकालते थे। ऐसा कुछ मामला नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के वक्त भी तब था जब किसान आंदोलन करने दिल्ली आते थे व आदिवासी मुंबई पहुंचते थे। मगर मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल क्योंकि हिंदू एजेंडे का है सो, जिस भी धरने, प्रदर्शन-आंदोलन-विरोध से हिंदू बनाम मुस्लिम और टुकड़े-टुकड़े गैंग की छवियां उभरीं उस पर इंच भर, रत्ती भर चिंता नहीं!

क्यों? इसलिए कि केरल की वामपंथी सरकार हो, जेएनयू-जाधवपुर-जामिया-हैदराबाद विश्वविद्यालय के वामपंथी छात्र हों या ममता बनर्जी, ओवैसी का हल्ला बोल हो या उत्तर प्रदेश में जुम्मे की नमाज के बाद सड़कों पर उतरे मुसलमान हों या दिल्ली के शाहीन बाग में कड़कड़ाती ठंड में दिन-रात बच्चों के साथ धरने पर बैठी महिलाएं हो ये सब हिंदू राष्ट्रवादियों के अश्वमेध यज्ञ की वे आहुतियां हैं, जिनके पीछे उद्देश्य बुझाना-दबाना नहीं है, बल्कि उनका लाइव नैरेटिव करवा कर अग्नि का भगवा रंग घर-घर पहुंचवाना है!

इसलिए जिनका सवाल है कि ऐसा कब तक चलेगा उनके लिए जवाब यह है कि जब हिंदुओं का अश्वमेघ यज्ञ है तो आनंद, संतोष की बात है या चिंता की? चिंता करने वाले राक्षस, देशद्रोही। इसलिए चलता रहे यज्ञ, फल अच्छा ही निकेलगा। अभी भले देश ठहरा-ठिठका हुआ है, आर्थिकी बरबाद है, बेरोजगारी सर्वत्र है, जीवन जीना मुश्किल है मगर हिंदू विरोधी नेता, वामपंथी, मुसलमान, जयचंद, देशद्रोही आदि सब ठिकाने तो लग रहे हैं। लेफ्टिस्टों की ठुकाई हो रही है। उपद्रवी मुसलमानों पर एफआईआर दर्ज हो रही है। संपत्ति जब्त करने की तैयारियां चल रही है। नागरिकता का सवाल उठ खड़ा हुआ है तो यह चिंता की नहीं सुकून की, उपलब्धि की बात है!

सो, तय मानें कि इंदिरा गांधी जैसे घबराती थी व आंदोलन खत्म करने के लिए इमरजेंसी लगाने तक चली जाती थीं वैसा कुछ मोदी-शाह तब भी नहीं करेंगे जब विरोधियों से सड़कें भर जाएं। डॉ. मनमोहन सिंह जैसे जंतर मंतर पर भीड़ देख लोकपाल कानून बनाने के लिए दौड़ पड़े थे, उनका कैबिनेट बाबा रामदेव के लिए एयरपोर्ट पर पलक पावंड़े बिछाए जैसे पहुंचा था वैसा कुछ मोदी-शाह नहीं करेंगे। इसलिए क्योंकि दोनों लौह हिंदू नायक हैं और अपने ख्यालों की भगवा सिद्धि, भगवा चमन बनता बूझ रहे हैं। तभी न सड़कों पर उतरी भीड़ को देख चिंता-घबराहट बननी है, न बात करनी है, न पीछे हटना है और न शाहीन बाग में बैठी बूढ़ी अम्माओं के चेहरे देख कर विचलित होना है! उलटे इनसे ही यह भरपेट संतुष्टि है कि मोदी-शाह की कमान में भारत हिंदू राष्ट्र बन रहा है और सुशासन का विश्व गुरू! क्या नहीं?

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