जिम्मेदारी तो सरकार की है

पेगासस सॉफ्टवेयर के जरिए सैकड़ों मोबाइल फोनों की जासूसी के लिए जिम्मेदार कौन है? भारत सरकार ने मीडिया में आई इन खबरों का तुरंत संज्ञान लिया। उसने ह्वाट्सऐप से इस बारे में जवाब देने को कहा है। केंद्रीय सूचना तकनीक मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि सरकार अपने नागरिकों की निजता को लेकर चिंतित है। ह्वाट्सऐप से कहा गया है कि वह इस मौजूदा घटना का ब्यौरा देने के साथ ही यह भी बताए कि वह भारतीय लोगों की निजता की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठा रही है। लेकिन क्या इस घटना में सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है? पेगासस सॉफ्टवेयर बेचने वाली इजराइली कंपनी साफ कर चुकी है कि वह सिर्फ सरकारों को इसकी बिक्री करती है। ऐसे में क्या यह शक जायज नहीं है कि जासूसी असल में सरकारी एजेंसियों ने ही की है? विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों का भी कहना है कि पहली नजर में ऐसा लग रहा है कि ये जासूसी सरकार के ही कहने पर हुई।

यानी अगर किसी को जवाब देना है, तो ऐसा खुद भारत सरकार को करना होगा। चूंकि इजराइली कंपनी एनएसओ ये सॉफ्टवेयर सिर्फ सरकारों को बेचती है, जिससे यह आरोप लग रहे हैं कि इन 1400 लोगों की जासूसी अलग-अलग देशों की सरकारों ने ही करवाई है। कांग्रेस ने सीधे सीधे आरोप लगाया कि भारत सरकार की एजेंसियां नागरिकों की गैर-कानूनी और असंवैधानिक तौर से जासूसी कर रही हैं। पार्टी ने सरकार से पूछा है कि वो बताये कि भारत सरकार की कौन सी एजेंसी ने एनएसओ से पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा, इसे खरीदने की अनुमति किस ने दी और जासूसी करने वालों के खिलाफ सरकार क्या कार्यवाई करेगी? जाहिर है, ये सभी वाजिब सवाल हैं, जिन पर सरकार को अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए। वरना वह संदेह से घिरी रहेगी। कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से भी आग्रह किया है कि वो स्वयं इस पूरे मामले का संज्ञान ले और अपनी निगरानी में जांच शुरू कराए। इन खुलासों से साफ है कि अनेक लोग इस जासूसी का शिकार बने थे। इनमें से अधिकतर लोग मानवाधिकार एक्टिविस्ट, वकील और पत्रकार हैं। इन लोगों से ह्वाट्सऐप और कनाडा के साइबर सुरक्षा समूह सिटीजन लैब ने संपर्क किया था और इनके फोन के हैक हो जाने की जानकारी दी थी। क्या ये जानकारी भारत सरकार को नहीं मिली और अगर मिली तो उसने मामले के खुलासे के पहले कार्रवाई क्यों नहीं शुरू की?

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