हिंदुत्व इतना संकीर्ण तो नहीं

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने हिंदुत्व की नई परिभाषा दी है। उनका कहना है कि राज्य सरकार ने बार और रेस्तरां खोल दिए, लेकिन मंदिर नहीं खोले हैं इसलिए वह हिंदुत्ववादी नहीं रही, बल्कि सेकुलर हो गई। यह बात हिंदुत्व के प्रति बेहद सतही और बेकार सोच को तो प्रतीकित करती ही है, संविधान के प्रति अज्ञान को भी रेखांकित करती है। खुद राज्यपाल ने जिस संविधान की शपथ ली है उसकी प्रस्तावना में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया है। उन्होंने इसी संविधान की शपथ मुख्यमंत्री को भी दिलाई है और इसी शपथ को भूल कर वे मुख्यमंत्री से पूछ रहे हैं कि क्या वे सेकुलर हो गए हैं! सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में धर्मनिरपेक्षता को संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा माना है और कहा है कि इसे बदला नहीं जा सकता है। सो, यह संविधान के साथ-साथ सर्वोच्च अदालत की अवमानना भी है। मुख्यमंत्री के सेकुलर बरताव करने पर राज्यपाल का तंज करना संवैधानिक संस्थाओं की गिरावट का नया स्तर है।

महाराष्ट्र के राज्यपाल के हिंदुत्व का पैमाना बेहद दिलचस्प है। उनका कहना है कि बार, रेस्तरां खुल गए तो मंदिर क्यों नहीं खुले। यानी बार, रेस्तरां की तरह ही कोरोना वायरस की महामारी के बीच मंदिर खोल दिए जाएं तो हिंदुत्व का सम्मान बढ़ जाएगा। ध्यान रहे महाराष्ट्र देश का सबसे ज्यादा संक्रमित राज्य है। अभी कोरोना के जितने एक्टिव केसेज हैं उनमें से 25 फीसदी केस अकेले महाराष्ट्र के हैं। देश में कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हर पांच में से एक व्यक्ति महाराष्ट्र का है। महाराष्ट्र अगर एक देश होता तो कोरोना से दुनिया का चौथा सर्वाधिक संक्रमित देश होता। रूस का नंबर उसके बाद आता।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि ज्यादातर भाजपा शासित राज्यों में भी अगस्त तक मंदिर बंद ही थे। सितंबर में मंदिर खुलने शुरू हुए हैं और वह भी कम लोगों के दर्शन की अनुमति के साथ। सीधे केंद्र के शासन में आने वाले जम्मू कश्मीर में भी वैष्णो देवी का मंदिर भी 16 अगस्त से ही खुला है। हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थों में से एक अमरनाथ गुफा की जुलाई-अगस्त में होने वाली यात्रा भी इस साल नहीं हो सकी। पर किसी ने प्रधानमंत्री या जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल के हिंदुत्व पर सवाल नहीं उठाया। एक महीना पहले तक लगभग पूरे देश में ज्यादातर मंदिर और दूसरे धर्मस्थल बंद थे। पर किसी ने भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के हिंदुत्व पर तंज नहीं किया। देश के प्रधानमंत्री ने तीन मार्च को कह दिया था कि वे 10 मार्च को होने वाली होली नहीं मनाएंगे, फिर भी उनके हिंदुत्व पर कोई सवाल नहीं है। पिछले दिनों देश के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्री ने दशहरा, दिवाली से पहले लोगों से कहा कि कोई भी धर्म बड़े पैमाने पर त्योहार मनाने को नहीं कहता है। फिर भी उन पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का हिंदुत्व सवालों के घेरे में आ गया!

राज्यपाल के पीछे-पीछे एक बड़बोली अभिनेत्री ने, मंदिर नहीं खोलने के लिए शिव सेना को सोनिया सेना, बाबर सेना, गुंडा सरकार आदि सब कुछ कह दिया। यह भी रोचक तथ्य है कि महाराष्ट्र में सिर्फ मंदिर बंद नहीं हैं, बल्कि सारे धार्मिक स्थल बंद हैं। पर किसी मौलाना ने यह नहीं कहा कि शिव सेना के नेता उद्धव ठाकरे हिंदुत्ववादी हैं इसलिए उन्होंने मस्जिदें और दरगाहें बंद कर रखी हैं! ध्यान रहे मुंबई में माहिम की दरगाह से लेकर हाजी अली की दरगाह तक हर दिन हजारों पर्यटक या श्रद्धालु पहुंचते हैं। इनके बंद होने से हजारों लोगों के सामने रोजगार और रोजी-रोटी का संकट है। पर कोरोना की गंभीरता को समझते हुए लोग चुप हैं। इसी तरह मुंबई में जैन, पारसी, ईसाई आबादी भी बड़ी है और उनके धर्मस्थल भी बंद हैं, लेकिन किसी ने सरकार पर न तो तंज किया है और न आरोप लगाए हैं। हैरानी इस बात को लेकर भी है कि राज्यपाल ने सिर्फ मंदिरों की और हिंदुत्व की चर्चा की। अगर उन्होंने सभी धार्मिक स्थलों को खोलने की चर्चा की होती तो बात समझ में आती। परंतु तब वे मुख्यमंत्री के हिंदुत्व पर कैसे सवाल उठा पाते!

ऐसा लग रहा है कि भाजपा से अलग होने के बाद से ही उसके नेता और कुछ फिल्मी हस्तियां शिव सेना व उद्धव ठाकरे को हिंदुत्व विरोधी ठहराने लगी हैं। इसी योजना के तहत शिव सेना को सोनिया सेना और बाबर सेना कहा जा रहा है, मुंबई को पाक अधिकृत कश्मीर बताया जा रहा है और अवैध निर्माण की वजह से घर का छज्जा तोड़े जाने की तुलना मंदिर तोड़े जाने से की जा रही है। इसी एजेंडे के साथ भाजपा ने महाराष्ट्र में मंदिर खोलने का आंदोलन शुरू किया है। भाजपा ने कोरोना वायरस के पीक पर होने के समय भी राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन किया था। अब जब कोरोना पर काफी हद तक महाराष्ट्र सरकार ने काबू पा लिया है तो मंदिर खोलने का आंदोलन शुरू हो गया है। इसी राजनीति से प्रभावित होकर राज्यपाल महोदय ने हिंदुत्व की नई परिभाषा गढ़ ली।

यह हिंदुत्व की बेहद संकीर्ण परिभाषा है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए ही किया जा सकता है। असल में व्यापक, उदार और उदात्त हिंदुत्व किसी राजनीतिक पार्टी के काम का नहीं है, क्योंकि वहां नफरत के लिए, अलगाव के लिए, विभाजन के लिए, संकीर्णता के लिए कोई जगह नहीं है। वहां सबको सहज रूप से स्वीकार्य करने का उदात्त भाव होता है। इसके उलट संकीर्ण हिंदुत्व दुनिया के दूसरे राजनीतिक धर्म या पंथों की तरह विभाजन के काम आ सकता है। इसी मकसद से हिंदुत्व की नई व्याख्या हो रही है। तभी महामारी रोकने के लिए तमाम धार्मिक स्थलों के साथ साथ मंदिर बंद रखने को भी हिंदुत्व विरोधी कदम माना जा रहा है। तभी एक आभूषण बनाने वाली कंपनी का एक विज्ञापन हिंदुओं की भावनाओं को इतना आहत कर दे रहा है कि उनका खून उबलने लग रहा है और उस कंपनी पर ऐसा हमला होता है कि उसे विज्ञापन वापस लेना होता है। इस तरह खून का उबाल तो चीन के खिलाफ देखने को नहीं मिल रहा है, जिसने भारत की हजारों एकड़ जमीन कब्जा कर रखी है और अरुणाचल प्रदेश पर दावा करके देश की संप्रभुता को चुनौती दी है!

क्या हिंदू समाज अपनी सीमा को, अपने राज्य को, अपनी संप्रभुता को अपनी संपत्ति नहीं मानता है? उस पर किसी के कब्जे से उसकी भावनाएं आहत नहीं होती हैं? क्या वह सिर्फ स्त्री को ही संपत्ति और अपने सम्मान का प्रतीक मानेगा? आभूषण बनाने वाली कंपनी तनिष्क के जिस विज्ञापन पर देश के करोड़ों हिंदुओं का खून खौला है वह असल में स्त्री को संपत्ति और परिवार के सम्मान का प्रतीक मानने की सैकड़ों साल पुरानी संकीर्ण मानसिकता को ही दिखाता है। हालांकि वह एक बड़ी कंपनी का विवाद खड़ा करके अपने ब्रांड की मार्केटिंग का एक दांव था, जिसमें कामयाबी मिलते ही कंपनी ने अपना विज्ञापन वापस ले लिया पर इससे राजनीतिक हिंदुत्व का नया रूप और उसकी कमियां जाहिर हो गईं।

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