nayaindia Gujrat assembly election BJP गुजरात में भाजपा कितने भरोसे में?
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| Gujrat assembly election BJP गुजरात में भाजपा कितने भरोसे में?

गुजरात में भाजपा कितने भरोसे में?

भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि वह गुजरात में चुनावी जीत का पिछला सारा रिकॉर्ड तोड़ेगी। पार्टी का दावा डेढ़ सौ के करीब सीटें जीतने का है। बड़ी जीत का दावा इस वजह से काफी हद तक तार्किक दिख रहा है कि इस बार विपक्ष का वोट बंट रहा है। पिछले कई चुनावों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि त्रिकोणात्मक मुकाबला हो रहा है। अब तक भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता था। इस बार आम आदमी पार्टी भी पूरी ताकत से चुनाव लड़ रही है और हर सर्वेक्षण में उसे अच्छा खासा वोट मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। सो, भाजपा को दो कारणों से बहुत भरोसे में रहना चाहिए। पहला कारण यह कि विपक्ष यानी कांग्रेस का पारंपरिक वोट बंट रहा है और दूसरा कारण यह कि भाजपा के खिलाफ 27 साल के राज और आठ साल के डबल इंजन की सरकार की वजह से जो सत्ता विरोध वोट बना है वह एकमुश्त किसी पार्टी को नहीं जाएगा। दो पार्टियां उसकी दावेदार हैं।

यह भी ध्यान रखने की जरूरत आमतौर पर पिछले पांच-छह चुनावों से भाजपा को 50 फीसदी के आसपास वोट मिलते रहे हैं। पिछले चुनाव में यानी 2017 में जब कांग्रेस के साथ कांटे की टक्कर हुई थी तब भी भाजपा को 49 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे पार्टी 99 सीटों पर सीमित हो गई थी। उससे पहले यानी 2012 के चुनाव में भी भाजपा को 47 फीसदी वोट मिले थे और उसे 115 सीटें मिली थीं। इसका कारण यह था कि 2012 के चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी नाम से अलग पार्टी बना ली थी। उनकी पार्टी सिर्फ दो ही सीट जीत पाई लेकिन उसे चार फीसदी के करीब वोट मिले थे। वह वोट सत्ता विरोधी वोट था, जो कांग्रेस की ओर जाने की बजाय केशुभाई की पार्टी के साथ चला गया। इसका फायदा भाजपा को यह हुआ कि वह 115 सीटें जीत गई। दो साल के बाद केशुभाई की पार्टी का भाजपा में विलय हो गया। इसके अगले चुनाव में भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला था तो 49 फीसदी वोट हासिल करने को बाद भी भाजपा की सीटें तीन अंकों में नहीं पहुंच पाई। जाहिर है एक वोट काटने वाली पार्टी हो तो भाजपा को ज्यादा फायदा होता है। इस बार तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों पूरी ताकत से लड़ रहे हैं। सो, भाजपा को ज्यादा आत्मविश्वास में होना चाहिए।

लेकिन भाजपा जिस अंदाज में चुनाव लड़ रही है उससे कुछ दूसरी तस्वीर दिख रही है। वह बहुत भरोसे में नहीं लग रही है। तभी सवाल है कि क्या चुनाव को लेकर भाजपा के अंदरूनी सर्वेक्षण या जमीनी रिपोर्ट में कुछ निगेटिव फीडबैक मिली है या स्वाभाविक रूप से वह इस तरह से चुनाव लड़ रही है? ध्यान रहे भाजपा हर चुनाव में अपनी सारी ताकत झोंकती है। छोटे से छोटे राज्य के चुनाव में भी नरेंद्र मोदी पूरी ताकत लगाते हैं और करो या मरो के अंदाज में लड़ते हैं। उनके साथ साथ पूरी पार्टी प्रचार में उतरती है और हर तरह के साधन का इस्तेमाल चुनाव में किया जाता है। इसलिए हैरानी नहीं है कि पार्टी कारपोट बॉम्बिंग के अंदाज में प्रचार कर रही है। सारे मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री गांव गांव घूम रहे हैं और सभाएं कर रहे हैं।

भाजपा के इस अंदाज में प्रचार करने को लेकर हैरानी नहीं है। हैरानी यह है कि विकास के तमाम दावों के बावजूद इस बार भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नजरिए से चुनाव लड़ रही है। पिछले दो दशक साल में संभवतः पहली बार हो रहा है कि गुजरात के 2022 के चुनाव में 2002 के चुनाव के सूत्र दिखाई दे रहे हैं। राजनीति के जानकार गुजरात दंगों की छाया चुनाव पर देख रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पार्टी ने गुजरात दंगों में हुए नरोदा पाटिया नरसंहार में दोषी ठहराए गए मनोज कुकरानी की बेटी पायल कुकरानी को टिकट दिया है। पायल को नरोदा पाटिया नरसंहार वाली सीट से ही टिकट दिया गया है। उनके पिता मनोज कुकरानी 2015 से जमानत पर बाहर हैं और वे खुल कर बेटी के लिए प्रचार कर रहे हैं। इसी तरह बिलकिस बानो के बलात्कारियों की रिहाई पर उनको संस्कारी बताने वाले विधायक को भी पार्टी ने फिर से टिकट दिया है। पूरे चुनाव प्रचार में एक सांप्रदायिक अंडरटोन सुनाई दे रही है, जिससे आभास  हो रहा है कि भाजपा कहीं न कहीं घबराई हुई है। यह घबराहट आम आदमी पार्टी के हिंदुत्व प्लस मुफ्त की रेवड़ियों की घोषणा से हो सकती है।

अगर ऐसा नहीं होता तो गुजरात के चुनाव प्रचार में आफताब अमीन पूनावाला की एंट्री शायद नहीं होती। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने आफताब का डर दिखा कर गुजरात में वोट मांगा है। उन्होंने अपनी पहली सभा में कहा कि नरेंद्र मोदी को नहीं जिताया तो हर शहर में आफताब पैदा होगा। सरमा ने गुजरात चुनाव में वोट देने के साथ साथ लोगों से यह भी अपील कर डाली कि आफताब जैसों को रोकने के लिए मोदी को 2024 में भी जिताएं। अपनी लिव इन पार्टनर श्रद्धा वाकर की हत्या करने और उसके शव के 35 टुकड़े करने की घटना को सरमा ने ग्राफिक्स डिटेल में लोगों को समझाया। सो, दिल्ली की इस घटना के बारे में विस्तार से बता कर गुजरात के लोगों को आफताब जैसों का डर दिखाना और वोट मांगना मामूली नहीं है।

BJP followed arvind kejriwal

आफताब से पहले गुजरात के चुनाव में बुलडोजर की भी एंट्री हुई थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रचार के लिए गुजरात गए तो उनकी सभाओं में लोग बुलोडोजर पर सवार होकर पहुंचे। भाजपा ने बड़ी संख्या में बुलडोजर का इंतजाम किया। सभा की जगहों पर बुलडोजर के कटआउट लगाए गए और बुलडोजर का मॉडल बनवा कर लगवाया गया। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर का मॉडल विकसित किया है, जिसमें आरोपियों के घर बुलडोजर से गिराए जाते हैं। अगर आरोपी अल्पसंख्यक समुदाय का हो तो बुलडोजर की कार्रवाई तत्काल होती है। इस कार्रवाई के लिए दोषसिद्धी की जरूरत नहीं है। आरोप लगते ही बुलडोजर चलने लगता है। सोचें, जिस राज्य गुजरात को विकास का मॉडल बनाया गय और उसे दिखा कर पूरे देश में वोट मांगा गया वहां भाजपा को उत्तर प्रदेश के बुलडोजर मॉडल पर वोट मांगने की जरूरत पड़ रही है तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है।

सांप्रदायिक अंडरटोन के साथ साथ गुजराती अस्मिता का मुद्दा भी बहुत उछल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने मेधा पाटकर के कांग्रेस की यात्रा में शामिल होने का मुद्दा बनाया और कहा कि जिस महिला ने गुजरात को पूरी दुनिया में बदनाम किया, कांग्रेस नेता उसके साथ यात्रा कर रहे हैं। तभी अस्मिता की राजनीति भी कुछ अलग संकेत देने वाली है। हालांकि यह भी हो सकता है भाजपा अतिरिक्त सावधानी बरत रही हो क्योंकि गुजरात का महत्व सबको पता है। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य प्रचार के लिए गुजरात गए तो उन्होंने कहा कि गुजरात भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश से भी ज्यादा अहम है। गुजरात वह राज्य है, जिसमें भाजपा की जान बसती है। वह हिंदुत्व की प्रयोगशाला रही है। वह हिंदुत्व की राजनीति के दो सबसे बड़े आइकॉन- नरेंद्र मोदी और अमित शाह का गृह प्रदेश भी है। अगर वहां नतीजे ऊपर नीचे हुए तो हिंदुत्व के एजेंडे के अजेय होने की धारणा टूटेगी और तब उसकी नींव पर खड़ी भाजपा की इमारत को ढहते देर नहीं लगेगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

ten − nine =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
शिवराज का ‘इकबाल बुलंद’ फैसला प्रशासनिक संदेश ‘राजनीतिक’
शिवराज का ‘इकबाल बुलंद’ फैसला प्रशासनिक संदेश ‘राजनीतिक’