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गुजरात को ऐसे जीतना क्या जीतना?

नरेंद्र मोदी गुजरात जीतेंगे लेकिन योगी आदित्यनाथ के बूते यदि जीते तो मोदी-शाह के लिए क्या डूबने वाली बात नहीं? यदि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के वोटों के बंटने से जीते तो वह क्या जीते? लगभग हर दिन प्रधानमंत्री की रैलियों तीन महीने से लगातार प्रचार, पूरे देश के भाजपा नेताओं की कथित कॉरपेट बाम्बिंग, विपक्ष के उम्मीदवारों को तोड़ने से लेकर पानी की तरह पैसा बहाने के तमाम हथकंडों के बावजूद यदि कांग्रेस 40-50 सीट जीत जाए, भाजपा के वोट 40 प्रतिशत तक गिर जाएं और आप 20-25 प्रतिशत वोट पा जाए तो वह क्या नरेंद्र मोदी की वाहवाही वाली जीत होगी?

सोचें, कल्पना करें कि जिस गुजरात में 27 साल से हिंदू राज है। नरेंद्र मोदी का कथित विकास मॉडल है वहां अरविंद केजरीवाल की फ्री बिजली या हजार रुपए मुफ्त जैसी रेवड़ियों का शहरी गुजराती दिवाना दिखलाई दे। केजरीवाल से मोदी-शाह इतने घबराएं कि उसी वक्त में दिल्ली में एमसीडी के चुनाव करवाएं। और एक नगरपालिका के चुनाव में केंद्र के मंत्री से लेकर चार-चार मंत्री एक साथ प्रचार करते हुए दिखें। अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी को गुजरात छोड़ कर दिल्ली के चुनाव के लिए लौटना पड़े।

पर मेरा मानना है कि दिल्ली हो या गुजरात या हिमाचल प्रदेश हर तरफ नरेंद्र मोदी अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाने, साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ झोंकने के बावजूद चुनाव जीतते हुए भी हारेंगे। इसलिए कि असली हार-जीत तो तब होती है जब खेल ईमानदार हो। गुजरात और उसके प्रमुख गढ़ सूरत में क्या नौबत जो आप पार्टी को अपने उम्मीदवार के अपहरण की चिंता करनी पड़ी। ये चुनाव ऐसे ही हैं कि यदि फुटबॉल विश्व कप में मोदी की कप्तानी में शाह, जेपी नड्डा, योगी की टीम खेल रही होती तो दुनिया देखती कि इस टीम ने इग्लैंड के खिलाडियों को खरीद लिया, किसी को पैसे दिए, किसी का अपहरण किया, उनका खाना-पानी गायब कर दिया और हर खिलाड़ी को डरा दिया कि यदि तुमने खेला तो ईडी-सीबीआई छोड़ देंगे।

सचमुच नरेंद्र मोदी के लोकतंत्र में चुनाव, जबरिया चुनाव हो गए हैं। हर तरह की नौटंकी, जबरदस्ती का चुनाव। बस, जीतना है तो सब कुछ लुटा कर मतलब सत्य-संस्कार-चरित्र, ईमानदारी-खेल की भावना आदि को दांव पर लगा कर बस जीत जाओ। विपक्ष के पास नहीं रहने दो, उसके तैयार हुए खिलाड़ी को खरीद लो, उनका खर्चा-पानी खत्म कर दो, रेफरी को खरीदे रखो, एकतरफा नारेबाजी-तालियां बजवाओ और आखिर में रेफरी से घोषणा करवा दो कि नरेंद्र मोदी भारत केसरी, गुजरात केसरी, हिंदू केसरी!

हैरानी की बात है कि ऐसे खेले से मोदी-शाह उबते हुए नहीं हैं? कल्पना करें कि ब्रिटेन में चुनाव और राजनीति मोदी-शाह जैसी हो जाए, ऋषि सुनक चुनाव जीतने का फॉर्मूला मोदी का अपना लें तो क्या होगा? या दुनिया के ओलंपिक, विश्व फुटबॉल कप के मालिक मोदी-शाह बन जाएं वे अपनी हिंदू शैली में खेल-खिलाड़ियों के आयोजन करवाएं तो अपनी टीम को कैसे जितवाएंगे? पैसे से सौदे-धंधे करेंगे? खिलाड़ियों को खरीदेंगे? खिलाड़ियों के पीछे ईडी-सीबीआई को छोड़ेंगे मगर होगा वहीं, खेल उसी फिक्स अंदाज में जैसे भारत के चुनाव हो रहे हैं!

गुजरात से सुनाई दे रहा है कि जीतेंगे तो मोदी? क्यों? इसलिए क्योंकि वे हार नहीं सकते? क्या महंगाई है? हां, है! क्या बेरोजगारी है? हां, है? क्या तकलीफें हैं? बहुत ज्यादा? तब वोट किसको दोगे? भाजपा को, कमल को! मोदी जीतेगा। मतलब मानो सब पूर्व निर्धारित! मैदान में दूसरा कोई है ही नहीं! सामने न कांग्रेस और न आप किसी में खेलने, ताकत लगाने, उम्मीदवारों में दम फूंकने, मतदान के दिन तक जी जान से मेहनत करने की क्षमता है ही नहीं!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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