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गुजरात में कम मतदान, क्या अर्थ?

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गुजरात में पहले चरण की 89 सीटों पर 62.89 फीसदी मतदान हुआ है। यह पिछली बार के मुकाबले करीब पांच फीसदी कम है। यह बहुत असामान्य परिघटना है क्योंकि पिछले कई सालों से चुनाव में मतदान का प्रतिशत आमतौर पर बढ़ता है या बराबर रहता है। पिछले चुनाव से कम मतदान होना अब पुराने जमाने की बात है। चुनाव आयोग इतने तरह की सुविधाएं देता है कि स्वाभाविक रूप से हर चुनाव में मतदान का प्रतिशत बढ़ता है। ऊपर से जब किसी चुनाव में कोई नई पार्टी उभरती है या ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ती है तब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ता है।

गुजरात में कम से कम तीन दशक से भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला होता रहा है। पिछली बार यानी 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था और 67 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था। इस बार राज्य की 182 में से लगभग सभी सीटों पर आम आदमी पार्टी भी चुनाव लड़ रही है। यानी हर सीट पर तीन उम्मीदवारों के बीच त्रिकोणात्मक मुकाबला है। इसकी वजह से भी मतदान का प्रतिशत बढ़ना चाहिए थी लेकिन हैरानी की बात है कि गुजरात में पहले चरण में पिछली बार के मुकाबले करीब पांच फीसदी कम मतदान हुआ है। यह पिछले 10 साल का सबसे कम मतदान है। इस बार किसी भी सीट पर पिछली बार के बराबर या उससे ज्यादा मतदान नहीं हुआ है।

पारंपरिक विश्लेषण के मुताबिक कम मतदान का मतलब होता है कि जनता यथास्थिति की पक्ष में है। वह बदलाव नहीं चाहती है। कम मतदान का फायदा सत्तारूढ़ दल को होता है। पिछली बार भी पहले चरण की इन 89 सीटों में जहां भी 70 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था उनमें से ज्यादातर सीटों पर बदलाव हुआ था और कांग्रेस के उम्मीदवार जीते थे और जहां 60 फीसदी से कम मतदान हुआ था वहां ज्यादा जगहों पर भाजपा जीती थी। लेकिन सवाल है कि क्या इस बार भी कम मतदान का यही मतलब है कि भाजपा को फायदा होगा? कम मतदान का फायदा सत्तापक्ष को इसलिए होता है क्योंकि उसके पास साधन होते हैं कि वह अपने कोर वोटर को मतदान केंद्रों तक पहुंचा दे। उसके प्रतिबद्ध वोटर होते हैं और वह अपने साधनों से उनका वोट डलवा लेता है, जबकि विपक्षी पार्टियां ऐसा नहीं कर पाती हैं। मतदाताओं में जब बदलाव की तीव्र इच्छा होती है तो वे स्वंय मतदान के लिए जाते हैं, तब सत्तापक्ष को नुकसान होता है।

ध्यान रहे गुजरात भाजपा की और हिंदुत्व की प्रयोगशाला है। पिछले 27 साल से राज्य में भाजपा की सरकार है। प्रदेश के शहरी इलाकों और मध्यवर्गीय बस्तियों में उसका प्रतिबद्ध मतदाता समूह है। इसके अलावा भाजपा की केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभार्थी वर्ग है, जिनको संघ और भाजपा के कार्यकर्ता मतदान केंद्रों तक ले जाते हैं। सो, पारंपरिक नजरिए से देखें तो कम मतदान का फायदा भाजपा को होना चाहिए। पर इस बार के पहले चरण के मतदान के आंकड़ों से कुछ अलग तस्वीर दिख रही है। सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के जिन इलाकों में गुरुवार को मतदान हुआ है वो इलाका भाजपा के मजबूत असर वाला है। पाटीदार, ओबीसी और आदिवासी इन इलाकों में बड़ी संख्या में हैं।

एक अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र की 89 सीटों में से 32 सीटों पर पटेल मतदाताओं की बहुलता है, जबकि 16 सीटें आदिवासी बहुल हैं। भारतीय ट्राइबल पार्टी का आधार भी इधर है और पहले चरण में छोटू भाई बसावा की सीट पर भी मतदान हुआ है। पहले चरण में 19 जिलों में मतदान हुआ, जिसमें से सिर्फ दो जिलों नर्मदा और तापी में 70 फीसदी से ज्यादा वोट पड़े, जबकि बाकी जिलों में 50 से 60 फीसदी के करीब मतदान हुआ। पिछली बार यानी 2017 में इन सीटों पर उससे पहले के यानी 2012 के मुकाबले चार फीसदी कम मतदान हुआ था और भाजपा अपनी जीती हुई 15 सीटें हार गई थी। तब कांग्रेस को इसका फायदा हुआ था। इस बार आम आदमी पार्टी भी हर सीट पर चुनाव लड़ रही है।

गुजरात ही नहीं देश के हर हिस्सों में शहरी इलाकों में भाजपा का आधार है और वहां वह जीतती है। इस बार गुजरात के शहरी इलाकों में आम आदमी पार्टी उसके वोट में सेंध लगा रही है और पहले चरण की शहरी सीटों पर मतदान पिछली बार के मुकाबले बहुत कम हुआ है। मीडिया में आए आंकड़ों के मुताबिक पहले चरण की शहरी सीटों में 11 फीसदी तक कम मतदान हुआ है। मोरबी में पुल हादसे की वजह से सभी पाटियों का फोकस था। वहां 67 फीसदी वोट पड़े हैं लेकिन पिछली दो चुनाव से वहां 74 और 75 फीसदी वोटिंग होती रही है। इस बार छह सात फीसदी वोट कम होने से भाजपा को नुकसान हो सकता है। इस तरह शहरी इलाकों में कम मतदान हुआ है, जहां आम आदमी पार्टी भाजपा के वोट में सेंध लगा रही है। उधर आदिवासी और पाटीदार बहुल इलाकों में भी कम मतदान हुआ है, जहां कांग्रेस पारंपरिक रूप से मजबूत है पर आम आदमी पार्टी के उसका वोट काटने से लड़ाई त्रिकोणात्मक हो गई है। सो, कुल मिल कर तस्वीर उलझ गई है। भाजपा का वोट प्रतिशत कम हो रहा है लेकिन उसका विरोधी वोट दो पार्टियों में बंटने से उसको सीटों का फायदा भी हो सकता है।

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By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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