गुट्टों, टिम्मों, नाटों, निखर्वों की गिलगिली इंद्रसभा
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गुट्टों, टिम्मों, नाटों, निखर्वों की गिलगिली इंद्रसभा

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क्या आप को नहीं लगता कि अब हम गुलीवरों के देश में बौनों के आ जाने का नज़ारा देख रहे हैं? लिलिपुट के बौने तो तन से बौने थे। हमारी व्यवस्था के शिखर पर आ कर जम गए बौने मन से बौने हैं।… संसदीय व्यवस्था में गुट्टों की तादाद बढ़ती जा रही है। इन गुट्टों के चलते कार्यपालिका में टिम्मों की भरमार हो गई है।… लोकतंत्र के धारक-वाहक बने बैठे बाकी राजनीतिक दलों का क्या हाल है? क्या उनके गुलीवर अपने-अपने बौनों से घिरे नहीं बैठे हैं?… जब सियासत के पूरे कुएं में ही विजयाबूटी घुली हुई हो तो कौन किस से क्या कहे? ज़रा सोचिए, किसी टीले के कंगूरे पर अगर कोई गुलीवर धूनी रमाए बैठा भी हो तो बाकी के चप्पे-चप्पे पर तैनात बौने उस टीले की क्या गत बना देते होंगे?

गुलीवर के बौनों के देश में पहुंचने की कहानी हम सब ने बचपन में पढ़ी है। लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि अब हम गुलीवरों के देश में बौनों के आ जाने का नज़ारा देख रहे हैं? लिलिपुट के बौने तो तन से बौने थे। हमारी व्यवस्था के शिखर पर आ कर जम गए बौने मन से बौने हैं। लोकतंत्र के ताने-बाने को अपनी सलाइयों से उन्होंने इस तरह बुन लिया है कि गुलीवरों का देश चाहे-अनचाहे इन बौनों की मिजाज़पुर्सी में लगा हुआ है।

संसदीय व्यवस्था में गुट्टों की तादाद बढ़ती जा रही है। इन गुट्टों के चलते कार्यपालिका में टिम्मों की भरमार हो गई है। न्याय-व्यवस्था के अलग-अलग गलियारों में अल्पमूर्तियां विराजमान हैं। मीडिया के शिखर पर वामन काबिज़ हैं। धर्म-क्षेत्र नाटों के कमंडल में समा गया है। सामाजिक टेकरियों पर टिलवों का राज है। शिक्षा-जगत की कमान निखर्व संभाले बैठे हैं। स्वास्थ्य-क्षेत्र की लगाम खट्टनों के पास है। मन के छोटेपन ने सब लील लिया है। हमारे सारे कष्ट इसलिए हैं कि हम बौनों से चांद छूने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

हुक़ूमत उन लोगों के हाथ में चली गई है, जिन्हें अपने अलावा किसी और की कोई परवाह नहीं है; जिनके दिलों में इतनी जगह ही नहीं है कि कोई और समा सके; जिनके दिमाग़ में कोई खिड़की ही नहीं है; जिनकी सोच इतनी एकांगी है कि किसी भी मसले के दूसरे पक्ष पर विचार के लिए कहीं कोई गुंज़ाइश ही नहीं है। सो, साढ़े सात साल से गुलीवरों का देश बौनों के तैयार किए रास्ते पर भेड़-मुद्रा में सिर झुकाए चलता चला जा रहा है।

लेकिन सिर्फ़ सत्तारूढ़ों की ही क्या बात करें? लोकतंत्र के धारक-वाहक बने बैठे बाकी राजनीतिक दलों का क्या हाल है? क्या उनके गुलीवर अपने-अपने बौनों से घिरे नहीं बैठे हैं? कौन-सा राजनीतिक दल ऐसा है, जिसके छोटे मन वाले अपने से असहमत लोगों को परदे की आड़ में कच्चा चबा जाने का विरचन नहीं करते हैं? कौन-सा राजनीतिक दल ऐसा है, जिसके शिखर-व्यक्तित्व काबलियत को परे धकेल छुटकुओं के ज़रिए काम-धाम चलाने में ज़्यादा सहज महसूस नहीं करते हैं? कौन-सा राजनीतिक दल ऐसा है, जिस की ड्योढ़ी पर अक़्ल के बजाय भैंस नहीं बंधी हुई है?

सो, जब सियासत के पूरे कुएं में ही विजयाबूटी घुली हुई हो तो कौन किस से क्या कहे? ज़रा सोचिए, किसी टीले के कंगूरे पर अगर कोई गुलीवर धूनी रमाए बैठा भी हो तो बाकी के चप्पे-चप्पे पर तैनात बौने उस टीले की क्या गत बना देते होंगे? इसलिए यह और संजीदगी से सोचिए कि जिस टीले के शिखर पर ही बौना बैठ गया हो, उसका क्या हाल हुआ होगा? बौना अपने नीचे की परत पर ख़ुद से एक सूत कम क़द वाले को बैठाएगा। उस परत पर आसंदी पाने वाला अपने से नीचे वाली परत पर अपने से एक सूत कम क़द वाले को जगह देगा। परत-दर-परत यह प्रक्रिया मूलाधार तक पहुंचते-पहुंचते पूरी पर्वत-श्रंखला को कितना भुरभुरा बना देगी? यही हो रहा है। हर एवरेस्ट का यही हाल है।

ऐसों की कब कमी रही है, जिन्हें चौधरियों का चौआ बन कर जीने में ही अपना जीवन सार्थक लगता है? और, ऐसे चौधरियों की भी अब तेज़ी से कमी होती जा रही है, जिन्हें उन्नत नस्ल के घोड़ों को साधने का हुनर आता था। आज के तमाम चौधरी टट्टुओं पर चढ़ कर अपनी-अपनी पहाड़ी पर पहुंचे हैं। वे खच्चरों पर बैठ कर अपने-अपने टापू का राज चला रहे हैं। उनका बौद्धिक बल अज्ञान की खूंटी पर लटका हुआ है। उनका नैतिक बल शीघ्रपतन की नाली में बह गया है। उनके पास अब सिर्फ़ बाहुबल बचा रह गया है। वे इसी के बूते इतराते घूम रहे हैं। उनके चौए अपने आराध्यों के इसी शारीरिक सौष्ठव पर रीझ-रीझ का कुप्पा हैं।

यह दर्दनाक दृश्य देख कर भी अगर आप को अपने पर खीज नहीं आती है तो मैं इस धीरोदात्त नायकत्व के लिए आप को धिक्कारना चाहता हूं। यह बदक़िस्मत समां देख कर भी अगर आप को ख़ुद से घिन नहीं आती है तो मैं इस प्रतिरोधक क्षमता के लिए आप को लानत भेजता हूं। गुलीवरों को बौनों की चरण-पादुकाएं चमकाते देख कर भी अगर आप को घुटन नहीं होती है तो इतना शीतरक्तक होने के लिए मैं आप को दुर्वचन कहना चाहता हूं। अगर आप को इस सब से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो मैं आप के पापों का भागी बनने को तैयार नहीं हूं। मैं आप की गिलगिली इंद्रसभा का सदस्य बनने से इनकार करता हूं।

मैं तन से बौने रह गए लोगों के साथ हूं। लेकिन मैं मन में बौनापन लिए विचरण कर रहे कद्दावरों के खि़लाफ़ हूं। हमारे संसार का नाश बौने तन के नहीं, बौने मन के लोगों ने किया है। वे हमारी दुनिया को बहुआयामी विनाश की तरफ़ ले जा रहे हैं। हमारे रोकने से वे रुकेंगे नहीं। उन के हृदय परिवर्तन की प्रतीक्षा मत कीजिए। वे ऐसा ही हृदय ले कर जन्मे हैं। वे अपने धड़कनहीन हृदय पर गर्व करते हैं। वे ऐसे ही स्पंदनहीन हृदयों के सम्राट हैं। उन्हें अपने इस ठूंठ-साम्राज्य पर गुमान है।

इसलिए आप अपना संसार तलाशिए। आप अपना संसार बनाइए। आप का संसार आप के आसपास बिखरा हुआ है। आप का संसार आप के साथ रहना चाहता है। आप का संसार तब बनेगा, जब आप अपनी चारपाई छोड़ेंगे, जब आप अपने तस्मे कसेंगे, जब आप अपनी दीवारें लाघेंगे। डूबने से डरना छोड़े बिना यह संसार नहीं बनेगा। टहनी पर बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। बदन झटक कर फिर उठ खड़े होने का कोई तय व्याकरण नहीं होता है। यह व्याकरण तो अपने लिए आप को स्वयं ही लिखना होगा।

हमारे बुजु़र्ग कहा करते थे कि जीवन चार दीयों के प्रकाश से चलता है। शांति, विश्वास, प्रेम और आशा। मुझे लगता है कि आज के दौर में पहले तीन दीये बुझ गए हैं। हमारी ज़िंदगी से सुकू़न फ़ना हो गया है। हमारे आपसी भरोसे को पलीता लगा दिया गया है। हमारे प्रेम के झरने का जल सूख गया है। लेकिन लगता है कि अंतिम दीये में तेल अभी बाकी है। और, यह तेल जब तक बाकी है, हम इस दीये के बूते बाकी के तीनों दीयों को भी फिर रौशन कर लेंगे।

इस ख़याल को महज़ रूमानियत मत समझिए। अपने आसपास देखेंगे तो आप पाएंगे कि गुलीवरों का देश बौनों की टोली से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा है। ये छींटे अब इतने गहरा गए हैं कि झक्कू दे कर शिखर पर बैठ गई बौना-मंडली के हाथ-पैर कांपने शुरू हो गए हैं। सिर्फ़ एकाध धक्का और देने की बात है। उसके बाद ताशमहल झर-झर करता झर जाएगा। पिछले साढ़े सात बरस में उगे दरख़्तों के तने बेहद नाज़ुक हैं। जड़ें तो उनकी हैं ही नहीं। एक हलकी-सी आंधी आएगी तो सब-कुछ उड़ा ले जाएगी। और, यह आंधी चल पड़ी है। यह आंधी अपनी मंज़िल की तरफ़ दिन-ब-दिन बढ़ रही है। इस आंधी के लिए आरती की थाली सजाइए। आप की मुंडेर पर जलता एक अकेला दीया भी देश की दीपमालिका का सूत्रधार है। उसे जलाए रखिए। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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