ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास! बेबाक विचार Repeat History of Pandemic
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ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

महामारी का सामना कैसे हो, वक्त की चुनौतियों से कैसे पार पाएं, कैसे भविष्य बनाएं, इन सवालों का हल हिंदू चेतना में न सन् 1918-20 में था और न सन् 2021-22 में है। जैसे पशुओं-भेड़-बकरियों को बीमारी, महामारी क्या और कैसे बचें का बोध नहीं होता है वैसे ही कलियुगी भारत को नहीं है।..हम ठहरे हुए हैं, कलियुगी हिंदू मानस न कंटेम्पररी है और न चैतन्य।..21 वीं सदी की सन् इक्कीस की महामारी ठहरे कलियुगी जीवन का रिपीटेशन है, भंडारण है, फ्लैशबैक है पिछले आचरण का।

कलियुगी भारत-12 वैश्विक मान्यता है इतिहास रिपीट नहीं होता। जगत में कुछ भी नहीं दोहराता। पुनरूक्ति नहीं हो सकती। लेकिन भारत और हम हिंदुओं के साथ क्या होता है? बार-बार वहीं होता है जो सदियों से चला आ रहा है। क्या आप नहीं मानते? तब जरा सन् 1918-20 बनाम सन् 2020-21 के दो महामारी काल की तुलना करें। जैसे 1918-20 में हिंदुओं ने बिना बुद्धि, बोध, अवैज्ञानिकता, लावारिस, भगवान भरोसे महामारी को झेला था वैसा क्या सन् 2020-21 में नहीं है? ऐसे मानो हमारी बुद्धि, हमारी चेतना सौ सालों में सोती हुई जड़ है, जो सन् इक्कीस के कोविड-19 के आगे भी वैसे ही बेसुध जैसे सन् अठ्ठारह में स्पैनिश फ्लू के सामने थे। हिंदू बुद्धि का आचरण जस का तस इतिहास दोहराता हुआ! विश्व की बाकी सभ्यताओं के सभ्य देशों बनाम प्राचीनतम हिंदू सभ्यता का यह फर्क है जो वे जहां इतिहास से आगे बढ़े हैं वहीं हम नहीं। वे अपने एक-एक नागरिक की चिंता में होते हैं। मतलब अमेरिका में लोग भेड़-बकरी की तरह ट्रीट होते हुए, लावारिस नहीं मरते हैं, जबकि भारत में वैसे ही मरे जैसे सन् 1918-20 में गंगा किनारे मरे थे।

कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

हां, जैसे 1918-20 में महामारी को समझा नहीं गया वैसे ही सन् 2020 में भारत के 140 करोड़ लोग और उनका राष्ट्र-राज्य, नियंता, व्यवस्था बेअक्ली की मारी मिली। 21 दिन में महामारी पर विजय पाने जैसी मूर्खता का वैश्विक शंखनाद हुआ। सन् 1918-20 में हमारे पास बैलगाड़ी-रेल थी अब हवाई जहाज, इंटरनेट है बावजूद इसके बुद्धि-संवेदनाओं का धीमापन बैलगाड़ी जैसा। न सत्य प्रचारित, न जागरूकता और न वैक्सीन सप्लाई जरूरत अनुसार। सन् 1918-20 में भी हम लोग गोरों के भरोसे थे और अब भी कटोरा लिए अमेरिका-ब्रिटेन से भीख मांगते हुए हैं। तब हिंदू धर्माधिकारी बचाव के टोटके-अंधविश्वास फैलाते हुए थे और 21वीं सदी के सन् इक्कीस में आधुनिक संचार तकनीक से टोटकों-मूर्खताओं को प्रचारित करते हुए एक तरफ विश्व गुरू होने का दंभ दर्शा रहे हैं तो दूसरी तरफ श्मशानों, गंगा में बहती लाशों के फोटो खिंचवाए हुए!

सोचने वाली बात है कि सन् 1918-20 की महामारी के दौरान काढ़े, गोमूत्र, गोबर, ताली-थाली बजाकर-दीया जलाने और वैद्य की दवा जैसी मार्केटिंग से इलाज का ज्यादा प्रचार था या 2020-21 में अधिक है? तब चिकित्सा व्यवस्था ज्यादा लूटती हुई थी या सन् 2020-21 में अधिक? कह सकते है सन् 2020-21 में मरने की संख्या व भुखमरी कम है इसलिए इतिहास रिपीट होने की जो बात है वह सही नहीं है।

कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

यह बात बेसुधी का अंधकार है। चीन भी 1918-20 और 2020-21 की महामारी का अनुभव लिए हुए है। जरा चीन के तब और अब के अनुभव पर सोचें। क्या प्रमाणित नहीं है कि चीन सौ सालों में सुपरफास्ट रफ्तार में आगे बढ़ा है। वह महामारी को हैंडल करने, इतिहास को रिपीट नहीं होने देने की ताकत-सामर्थ्य बना बैठा है। क्या वैसी हकीकत भारत से झलकती है? तब भी भारत महामारी की त्रासदी में मौतों की संख्या में नंबर एक था और इस दफा भी होगा। इतना फर्क जरूर है कि भारत राष्ट्र, लोग और व्यवस्था आधुनिक तामझामों में झूठ के शर्मनाक वैश्विक रिकार्ड में पारंगत बने दिख रहे हैं। मौत-बीमारी को जितनी तरह के झूठ से भारत ने छुपाया है उससे दुनिया ने समझा है कि गुलाम भारत पर राज करने वाले अंग्रेज ज्यादा सच्चे थे, जबकि आज के स्वराजी-हिंदुवादी महाझूठे! सचमुच हिंदुवादी मोदी सरकार ने सन् 2020-21 की वैश्विक महामारी में प्रमाणित किया है कि वैश्विक पैमाने पर सर्वाधिक असत्यवादी और गोबर ज्ञान वाले लोग यदि कोई हैं तो वे कलियुगी हिंदू हैं!

तभी 1918-20 की महामारी के वक्त दुनिया में हिंदुस्तान सांप-संपेरों का देश समझा जाता था और अब सन् 2021 की महामारी में झूठे और लावारिस मौतों के लावारिस श्मशानों की इमेज लिए बैठा है।

जैसा मैंने पहले लिखा पिछले तीन सौ सालों की आपदाओं-विपदाओं, महामारी-अकाल की तमाम मानवीय त्रासदियों के इतिहास पर गौर करें तो बेसुध-लावारिस कौम व नस्ल का इतिहास बार-बार रिपीट होता मिलेगा। इतिहास दोहराने का हिंदू मानस का अनुभव लगातार अनंत है। महामारी, अकाल, आक्रमणों, आपदा-विपदाओं के आगे हिंदू लगातार यदि भाग्य-नियति-रामभरोसे, किंकर्तव्यविमूढ़, रेत में मुंह गड़ाए शुतुरमुर्ग आचरण वाला है तो वजह कलियुगी अंधकार, ठहरा वक्त और अंधविश्वास है। बार-बार पहले जैसा पास्ट अनुभव और बार-बार पहले जैसा पास्ट आचरण, टोटके-गोबर ज्ञान!

सवाल है क्या ऐसा भूतकाल, पास्ट से चिपके होने से है? सतयुग के उजाले से क्योंकि कलियुग की अंधेरी गुफा का सफर है तो पिछले युग की कहानियां, यादें अवचेतन में चिपकी पड़ी हैं तो वह क्या सतयुग से है?

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

तो नोट रखें कलियुगी हिंदू के अवचेतन में चिपकी पड़ी बातें सतयुग की भरतवंशी विरासत नहीं हैं, बल्कि कलियुग का चला आ रहा सिलसिला है। दो हजार साल पहले सनातनी भरतवंशी बुद्धि-ध्यान-ज्ञान-कर्म से भटक जब कर्मकांडों और संसार असार-जगत मिथ्या के फेर में बुद्धि पर ताला लगा बैठे थे तो वह विषैले गोलाकार समय चक्र के अंधेरे भंवर में फंसना था। उस अंधेरे भंवर के दो हजार साल के अनुभव की बातें ही दिमाग पर चिपकी पड़ी हैं। कलियुग का वह पुराना वक्त है, जिसके अनुभव में बने झूठे गुरुडम में हम कलियुगी विश्वगुरू होने का दंभ बनाए हुए हैं।  

सो, कलियुग का भूतकाल सतयुग नहीं है, बल्कि सतयुग में वक्त में लकीर से नीचे उतरने, भंवर बनने के संक्रमण काल वाला पास्ट है। कलियुगी हिंदू का जन्म जीवन बेकार की छद्म आध्यात्मिकता के भंवर से है तो जो है वह भूत-वर्तमान-भविष्य के गोलाकार कलियुगी समय चक्र से है। सतयुग में भरतवंशी वक्त की लकीर पर भूत, वर्तमान, भविष्य की सच्चाई में सीधे चलते हुए थे। मतलब मानव विकास की डार्विन की इवोल्यूशनरी थ्योरी अनुसार बुद्धि-मनन-चुनौतियों के समाधान के खोजते सत्य, उपायों से विकासमान थे। उस पर ब्रेक लगा और वक्त की लकीर कर्मफल-जगतमिथ्या के गोलाकर जीवन चक्र, भंवर में फंसी तो वह समापन था अपने समय का, सतयुग का। बाद का वक्त और सफर अंधकार और सर्कल में घूमते हुए है। न मंजिल, न भविष्य। क्योंकि सर्कल तो गोल, एक कुंआ, भाग्य, नियति में ठहरा वक्त है। तभी 21वीं सदी की सन् इक्कीस की महामारी ठहरे कलियुगी जीवन का रिपीटेशन है, भंडारण है, फ्लैशबैक है पिछले आचरण का।

उस नाते भारत इक्कीसवीं सदी में नहीं है। हम ईसा बाद के सन् एक में जीते हुए हैं। हम ठहरे हुए हैं, कलियुगी हिंदू मानस न कंटेम्पररी है और न चैतन्य। हमारी चेतना सदियों से एक चक्कर में घूम रही है। बकौल आचार्य रजनीश- चेतना… एक ही काम कर रही है कि पुराने का गुणगान करो, पुराने को सिद्ध करो, पुराना ठीक है, और पुराने को ज्यादा पुराना सिद्ध करो।…. तभी बैलगाड़ी जब बनी थी, उस जमाने की समस्या भी मौजूद है, और जेट बन गया, उस जमाने की समस्या भी मौजूद है। वह सारी समस्याएं इकट्ठी होती चली गई हैं।…

भारत कलियुगी-7: कलियुग अपना पक्का, स्थायी!

भारत कलियुगी- 6: सतयुग से कलियुग ट्रांसफर!

तभी महामारी का सामना कैसे हो, वक्त की चुनौतियों से कैसे पार पाएं, कैसे भविष्य बनाएं, इन सवालों का हल हिंदू चेतना में न सन् 1918-20 में था और न सन् 2021-22 में है। जैसे पशुओं-भेड़-बकरियों को बीमारी, महामारी क्या और कैसे बचें का बोध नहीं होता है वैसे ही कलियुगी भारत को नहीं है। वक्त ही, दुनिया का ज्ञान-विज्ञान ही भारत को महामारी से उबारेगा। निश्चित ही हम जिंदा रहेंगे। आखिर पशु-पक्षी भी बचे और जिंदा रहते हैं। कलियुगी हिंदू मानस से कई बार यह सुनने को मिलता है कि हम जिंदा तो हैं। खत्म तो नहीं हैं। काम-धंधे चल रहे हैं, लोगों का जीवन चलते हुए है!…..ऐसी बातों पर क्या कहा जाए?…इतना ही सोचा जा सकता है कि कैसा मानस, कैसी बुद्धि जो बोध नहीं कि पृथ्वी जीवनधारक है तो जीव जगत में भेड़-बकरियां-हों या मानव सबका जिंदा रहना प्रकृतिवश है। इंसान का इतराना कि वह जिंदा तो है, खा-पी रहे है, काम-धंधा है, अबूझता का पागलपन है। ऐसे जिंदा रहना क्या कोई हिंदू वैशिष्टय है? क्या नरेंद्र मोदी या भारत की सरकार के चलते है? … पर ऐसे सच्चाई से सोचना कलियुगी हिंदू चेतनता में संभव नहीं है। फिर कलियुगी फलसफे में अपना यह गुरुडम अलग है कि ईश्वर है न हमें बचाने के लिए। जाको राखे साईयां, मार सके न कोय! तभी हम हर महामारी, हर सकंट, हर चुनौती, हर वक्त में भगवान अवतार बना लेते हैं और सुरक्षित समझते है। जैसे ताजा खबर है कि कोरोना की मूर्ति बन गई है और कोरोना देवी माता की पूजा होने लगी है। इस पर कल।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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