सेहत बचे तो कैसे?

अगर स्वास्थ्यकर्मियों को वेतन के लिए हड़ताल पर जाना पड़े, तो फिर उस देश में ये सोचना भी बेमतलब है कि हेल्थ केयर की एक उचित व्यवस्था वहां होगी। दुर्भाग्य से भारत ऐसा ही देश बन गया है। ये समस्या इस हफ्ते उभर कर सामने आई जब उत्तरी दिल्ली नगर निगम संचालित अस्पतालों के वरिष्ठ चिकित्सकों ने सोमवार को सामूहिक आकस्मिक अवकाश ले लिया। उस रोज म्युनिसिपल कॉरपोरेशन डॉक्टर्स एसोसिएशन (एमसीडीए) ने कहा कि अगर हमारी मांगें नहीं मानी गईं तो कल से हम अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाएंगे। गौरतलब है कि एमसीडीए निकाय के अस्पतालों के वरिष्ठ स्थायी चिकित्सकों का संघ है, जिसका गठन 1974 में हुआ थ। उसके करीब 1,200 सदस्य हैं। इसमें दो अन्य नगर निगमों के संचालित अस्पतालों के चिकित्सक भी शामिल हैं। एमसीडीए ने बीते हफ्ते धमकी दी थी कि अगर पिछले तीन महीने का बकाया वेतन जारी नहीं किया गया, तो उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) अस्पतालों के उसके सदस्य सामूहिक आकस्मिक अवकाश लेंगे। संघ ने कहा था कि उसने संबंधित अधिकारियों को मुद्दे के समाधान और वेतन के भुगतान के लिए पर्याप्त समय दिया था। ‘लेकिन उन्होंने समस्या के समाधान के लिए कुछ भी नहीं किया। इसके बजाय वे चिकित्सकों की पीड़ा से बिल्कुल भी प्रभावित नहीं दिखे। इसके पहले दिल्ली के बाड़ा हिंदूराव अस्पताल और कस्तूरबा अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर आंदोलन करने पर मजबूर हो चुके हैं।

बता दें कि पिछले तीन महीने से लंबित वेतन के भुगतान की मांग को लेकर हिंदूराव अस्पताल के पांच रेजिडेंट डॉक्टरों ने बीते 23 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टरों ने लंबित वेतन न दिए जाने के विरोध में कनॉट प्लेस पर विरोध प्रदर्शन भी किया था। उन्होंने अपनी मांग पर ध्यान आकर्षित करने के लिए दशहरे के दिन रावण का पुतला भी फूंका। एमसीडीए ने बीते 19 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी दी थी, लेकिन बाद में उसनै जन हित में हड़ताल का फैसला टालने का फैसला किया। लेकिन डॉक्टर आखिर उस हाल में कैसे अपना गुजारा चलाएं, जब उन्हें वेतन ना मिल रहा हो। तो आखिरकार उन्हें आंदोलन के रास्ते पर उतरना पड़ा है। जाहिर है, डॉक्टरों के पास जब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा, तो वे आंदोलन करने पर उतरे।

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