इतिहास ने सोखा हमारा शिकारीपना! - Naya India
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इतिहास ने सोखा हमारा शिकारीपना!

हम क्यों बचपन में, सिंधु घाटी के पालने में, ईसा पूर्व वाले हजार साल में निर्वाण की सोचने लगे, संन्यासी हो गए और होमो सेपियंस का शिकारी मिजाज गंवा बैठ? इन सवालों पर जितना सोचेंगे, उलझते जाएंगे। सोचें ईसा पूर्व सिंघु घाटी सभ्यता का बिना किसी ठोस वजह विलुप्त होना, अहिंसा परमो धर्म वाले जैन-बौद्ध धर्म का बनना क्या अर्थ बनवाता है? स्वर्ण काल आया नहीं और उससे पहले ही संन्यासी! राजवंश बना नहीं और राजा का बेटा वैराग्य में जंगल की और चल पड़ा! महाभारत के बाद नवनिर्माण हुआ नहीं, जीत का जश्न मना नहीं कि वेदव्यास शांति पर्व और राजा युधिष्ठर का वैराग्य बताने लगे। फिर चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने (बदले की भावना, शिकारी आदिम प्रवृत्ति में) लड़ाई करके राज सत्ता बनाई, साम्राज्य बनाया तो तीसरी पीढ़ी के अशोक महान ने कलिंग युद्ध में लाशों का ढेर देख बुद्धम् शरणम् का फैसला किया। चाणक्य के वंशज ब्राह्यणों को बौद्ध बनाने, वैराग्य, निवृति और निर्वाण में ऐसे धकेला कि न राजनीति बची और न युद्ध दर्शन आगे बढ़ा। बिना राज्येंद्रियों, बिना निज और सामूहिक राजनीतिक चेतना के सभ्यता हो गई। हम उस शून्य और वैक्यूम में पहुंचे, जिसके खालीपन में भारत को शिकारगाह, चरागाह बनना ही था।

वह कालखंड हमें सांसारिकता से, कर्मठता से, कर्तव्य से संन्यास की और ले जाने वाला था। समझ नहीं आता कि एक तरफ वेदव्यास ने श्रीकृष्ण के मुंह से कर्तव्यता में कर्म करने का संदेश दिया तो ज्योंहि युद्ध खत्म हुआ तो वैराग्य, सब व्यर्थ का शांतिपर्व, युधिष्ठर का वैराग्य दर्शाया। उस मनोभाव को अलग-अलग रूप में आगे अंहिसा परमो धर्म और अशोक महान के वैराग्य के रूप में भी दुनिया ने देखा। तभी विदेशियों का आना शुरू हुआ। सभ्यता में प्रतिरोध, प्रतिशोध सब खत्म! हम शिकारी नहीं रहे, संन्यासी-वनवासी हो गए। लड़ाई और पुरुषार्थ के पकवान से नहीं, बल्कि भिक्षा में जीवन जीया जाने लगा।

और मध्यकाल आते-आते वह हुआ जो दुनिया की किसी सभ्यता, कौम के साथ नहीं हुआ। खैबर पार से पांच सौ-हजार खानाबदोश-बर्बर शिकारी आते थे और दिल्ली की सत्ता को, भारत के लोगों की स्वतंत्रता को रौंदते हुए जीवन को मौजमस्ती से जीते थे। हम शिकार, वे शिकारी। हम गुलाम, वे मालिक! हम पर इतनी तलवार चली, हमारी सभ्यता-संस्कृति का इतना विध्वंस हुआ कि हमने वक्त को ही भूला दिया। हमारा इतिहास नहीं बना। मैं भी मानता रहा हूं कि हम इतिहास याद नहीं रखते लेकिन सोचें, अंडमान की जेल में, सलाखों में दस-तरह की यातनाओं में जिसने सालों-साल जीवन जीया हुआ है वह अपना क्या इतिहास याद रखेगा? इतिहास है कहां जो इतिहास याद रखें या उसे लिखता जाए। तभी हम इतिहास में, राजनीति में, सभ्यताओं, तलवार की प्रतिस्पर्धा में नहीं जीये बल्कि भक्ति में, कोऊ नृप हो हमे का हानि जैसे भावों में जीये।

अपनी यह थीसिस सहस्त्राब्दियों के कालखंड, इतिहास के परिप्रेक्ष्य में, कौम के अनुभवों का सार है। इसमें घटनाओं के क्रम, सिलसिले, तारीख-तथ्य से किंतु, परंतु या गलत-सही की बहस की जा सकती है। लेकिन सभ्यताओं की वैश्विक तुलनाओं और अपने खुद के मनोविश्व में हम यदि झांकें तो इस सत्य से साक्षात्कार दो टूक है कि हमारा गुलामी का कालखंड सर्वाधिक लंबा है। विश्व के इतिहासजन्य, सभ्यतागत योद्धाओं की दस-पच्चीस लोगों की सूची में हम लोगों का एक भी नाम नहीं है तो न ही लड़ाकू-बर्बर, बहादुर कौम की लिस्ट में अपने किसी समाज-समूह का नाम मिलेगा। मगर हां, प्राचीन, मध्य, आधुनिक काल का इतिहास उन बुद्ध, महावीर, कबीर और गांधी के वे नाम जरूर लिए हुए हैं, जिससे दुनिया हमें जानती है कि हमारी बुनावट क्या है और हमारा जीना और जीने का दर्शन कैसा है!

तो सार की बात? पहली बात ‘हम, भारत के हमलोग’ में ‘हम’ का अर्थ, ‘हम’ की तासीर की थाह पाना नामुमकिन सा है। यों हम कैसे हैं यह हमारा इतिहास है! और वह इतिहास बिना राज्येंद्रियों, राज की नासमझी का है इसलिए उसके यथा राजा तथा प्रजा व यथा प्रजा तथा राजा की जुगलजोड़ी सनातनी है। भारत का राजा कोई भी हो, किसी भी युग का है वह विश्व चेतना मतलब विश्व की हकीकतों के माफिक व्यवहार करने, दो-दो हाथ करने में समर्थ, सक्षम नहीं रहा है। हमारी राज्येंद्रियां बिना शिकारी किलिंग इंस्टींक्ट के हैं, जिसके चलते आज सवा सौ करोड़ की आबादी भी यह नियति लिए हुए है कि सब चलता है! ऐसे ही चलता है। इसी के माफिक फिर जीवन पद्धति है और उसके जुगाड़ हैं!

अब यहां फिर कोर बात ले कर आ रहा हूं कि जुगाड़ वह करता है, जो शिकारी नहीं होता। जो मौलिक, निडर, निर्भय नहीं होता? मौलिक, सृजक वह हो ही नहीं सकता जो निडर-निर्भय नहीं हो! जब हम हिंदुओं के लिए समुद्र यात्रा ही वर्जित रही है, पशु मारना भी अहिंसा है तो भला हममें अमेरिका को खोजना या बर्बर लड़ाइयों के साथ, महायुद्धों के बीच, ओलंपिक मैदान में कंपीटिशन कर सकना कैसे संभव है?

अपना मानना था, है और दुनिया के कई सुधी ज्ञानियों की थीसिस है कि आदि मानव से आधुनिक मानव के सफर का निचोड़ है कि प्रकृति, विपरीत स्थितियों से सतत संर्घष, लड़ाई और लड़ते-लड़ते मानव चेतना का प्रखरतम बनना ही तीन लाख साला अनुभव का, विकास का सार तत्व है। अपन को होमो सेपियंस याकि आदि मानव के मानवशास्त्र को पढ़ने से जितना समझ आया है उसका सार बीज अफ्रीका की इथियोपियाई गुफा से तीन लाख साल पहले आदि मानव की खोपड़ी की वह कुनबुनाहट थी कि चलो, चलें गुफा से बाहर! वह इंसान के लड़ने (प्रकृति से, जीव-जंतुओं से, परिवेश से, विपरीत स्थितियों, चुनौतियों से) का प्रथम संस्कार प्रस्फुटन था। वह हिंसा थी अंहिसा नहीं। वह भेड़, बकरी, बंदर के समूह से चिंपाजी का बाहर निकल कर आदि मानव बनना था। वह गुफा से बाहर निकल, शेर को डराने और उससे लड़ते हुए, विजय पाते हुए महाद्वीपों को लांघने, डर,-भय से लड़-लड़ कर सात समुंदर पार की विजय पताका का, मानव विकास का प्रारंभ था जो लगातार अनवरत सहस्त्राब्दियों, लक्षास्त्राब्दियों से निर्बाध जारी है! जान लें वर्तमान में भविष्य का लक्ष्य यदि ब्रह्मांड में, किसी दूसरे ग्रह में हम होमो सेपियंस का गुफा बनाना है तो वह भी आदिम शिकारी प्रवृत्ति से है!

मैं भटक गया हूं। मूल प्रासंगिक मसला है कि अफ्रीका की गुफा से निकले मानव के चरण पृथ्वी के जिन कोर भूभागों में पड़े और फिर वहां विकास याकि जीत की चाहना, किलिंग इंस्टींक्ट में मानव बनाम मानव में लड़ाई होने लगी तो हम वह आदिम शिद्दत, हौसला, स्वतंत्रता कैसे गंवा बैठे? एलेक्जेंडर महान के सिंधु नदी पार आ जाने के बावजूद भारत भूमि के जाग्रत इतिहास के हिंदू होमो सेपियंस में यह चेतना क्यों नहीं बनी कि हम भी वहीं जीवटता दिखाएं (मूल होमो सेपिंयस के दिमाग का कीड़ा कि चलो निकलो गुफा से बाहर, पिंजरे से बाहर) जो यूनानियों ने इतने दूर से आ कर दिखाई है। हमें भी अपनी खोल से बाहर निकल कर विश्व पताका के लिए कांधार पार चल पड़ना चाहिए।

जो हो दास्तां को यहीं खत्म किया जाए। सवा सौ करोड़ लोगों में से कितने लोगों को अपने पूर्वज होमो सेपियन और उनके वंशजों में मां भारत की बुनावट को एंथ्रोपोलॉजी से जांचने, जानने का कौतुक है। हमारा होना ही, हमारा जीना ही, हमारा सांस लेना ही बहुत है! इसलिए विषय पर फिलहाल विराम।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. Sir,
    In my opinion due to this comfortable land of indian subcontinent . Human become of such nature. AT all other places human have to struggle with nature to survive , but here in Indian subcontinent fooding was never a problem. This has made us lazy and less aggressive

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