राष्ट्र का व्यवहार, कौम की हकीकत

अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की ही बात है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय में नीति निर्माण की डायरेक्टर किरोन स्कीनर ने कुछ महीने पहले चीन और अमेरिका की प्रतिस्पर्धा पर बोलते हुए कहा- लड़ाई अब भिन्न सभ्यता और भिन्न विचारधारा से है।…शीत युद्ध के वक्त की लड़ाई.. पश्चिम के अपने परिवार में थी लेकिन चीन से झगड़े में पहली बार वह स्थिति है जब हमारा पावर प्रतिस्पर्धी काकेशियन (याकि यूरोपीय होमो सेपाइन वंशज) से नहीं है।.. अब चीन हमारा आर्थिक प्रतिस्पर्धी है, वैचारिक प्रतिस्पर्धी है। वह अपना ऐसा वैश्विक दबदबा बना रहा है, जिसकी कुछ दशक पहले कल्पना नहीं थी। विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ की सलाहकार रही स्कीनर अब वापिस प्रोफेसरी के काम में लौट गई हैं लेकिन ट्रंप सरकार में रहते हुए उन्होंने चीन को ले कर अमेरिका की जो नई सोच बताई तो चीन उससे बहुत बिलबिलाया।

हकीकत है पिछले तीन वर्षों से अमेरिका और चीन में रिश्तों का पुनर्निर्धारण हो रहा है। वाशिंगटन में चीन को आर्थिक, सामरिक कंपीटिटर नहीं, बल्कि विरोधी सभ्यता वाला दुश्मन माना जाने लगा है। अमेरिका और यूरोप में याकि पश्चिमी सभ्यताओं का चीन के प्रति व्यवहार सभ्यताओं के संघर्ष की हटिंगटन थ्योरी के माफिक हो रहा है। मोटे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन को जैसे कसा है उसे अमेरिकी लोगों का भी समर्थन है। तभी मतलब हुआ कि पश्चिमी सभ्यताओं (ईसाई-यूरोप-अमेरिका) में इस्लाम और चीन से सभ्यतागत खतरा पैठ गया है। उससे दो-दो हाथ करने की रीति-नीति शक्ल पाती जा रही है?

इसका क्या अर्थ निकालें? एक, इस पृथ्वी पर मानव की अलग-अलग बुनावट से अलग-अलग सभ्यता-संस्कृति एक हकीकत है! दो, हर सभ्यता की सामूहिक चेतना, लोगों का सामूहिक-निजी व्यवहार वह फर्क लिए होता है, जिससे कंपीटिशन है, मतभेद है और दुश्मनी है। फिर सबसे बड़ा तथ्य यह है कि हर कौम याकि क्षेत्र विशेष का जनसमूह धर्म, आचार-विचार-व्यवहार में वे विशिष्ट संस्कार-स्वभाव लिए होता है, जिसमें उसके विकास, उसकी ताकत, उसकी ऊर्जा, उसके जुनून के पंख छोटे या बड़े, आक्रामक या रक्षात्मक बनते हैं। कोई कौम ओलंपिक खिलाड़ी होती है तो कोई लल्लू, कोई वैश्विक लीडर-उद्यमी तो कोई पैदल सेना-बैंक ऑफिसकर्मी। कोई लीडर तो कोई फॉलोवर, कोई मौलिक तो कोई नकलची, कोई शोषक तो शोषित, कोई निर्भय तो कोई डरपोक!

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हां, जैसे हम अपने समाज, अपने परिवेश में छोटे-बड़े, सफल-असफल या खरगोश-कछुए का फर्क बूझते हैं वैसे वैश्विक पैमाने पर राष्ट्र और कौम का भी मानव शास्त्र, एंथ्रोप़ोलॉजी में तुलनात्मक अध्ययन बनता है। इस सबमें हम भारतीय, हम हिंदू किस अवस्था में हैं, यह एक विचारणीय मसला है और उसकी मोटी समझ का आदर्श उदाहरण भारत व चीन का समानांतर सफर है। चीन से तुलना हमें जल्दी समझ आ सकती है क्योंकि एक तो वह पड़ोसी है। दूसरे उसकी और हमारी आजादी का वक्त आसपास का है। हम हिंदू भी सभ्यतागत पहचान लिए हुए हैं तो चाइनीज भी लिए हुए हैं। दोनों सभ्यताओं का 1947-1950 से साथ-साथ, समानांतर आधुनिक सफर शुरू हुआ। तब से दोनों देश, उसके नागरिक एक-दूसरे का आईना लिए हुए दुनिया को अपनी-अपनी हकीकत दिखाए हुए हैं।

पिछले सत्तर सालों में भारत जैसा बना और चीन जैसा बना वह दोनों देशों के नागरिकों के अलग-अलग तरह के स्वभाव से भी है। माओ-देंग-शी जिनफिंग बनाम गांधी-नेहरू-मोदी की लीडरशीप में तुलना करें तो चीन के तीनों नेताओं ने वक्त की सच्चाई को बहुत निर्ममता से, दो टूक ध्येय से साधा जबकि तीन नेताओं का भारत का प्रतिनिधि नेतृत्व 1947 में भी रामधुन, बुद्धम शरणम् गच्छामि लिए हुए था, अपनी ब्रांडिंग, अपनी फितरत में जी रहा था तो आज भी अपनी फितरत, अपनी ब्रांडिंग में सपने देखते-दिखाते जी रहा है। माओ-देंग-शी जिनफिंग ने खैरात, धर्मादे नहीं खोले। इन्होंने कठोरता से, सभ्यता की अपनी अनुशासित तासीर में लोगों को भट्टी में झोंका। भट्टी साम्यवाद की हो या लाल पूंजीवाद की, सबमें कौम ने बली दी और बली ली। हमें यह बात समझ में नहीं आती है कि माओ ने चीन का क्या गजब इतिहासजन्य एकीकरण बनवाया। निर्ममता से तिब्बत को भी हड़पा तो मुस्लिम आबादी को वहाबी इस्लाम की हवा नहीं लगने दी। मंगोलिया, विएतनाम जैसे पड़ोसियों को दबाए रखने की हर संभव कोशिश की तो भीड़ और भूगोल से प्रतिस्पर्धी के नाते खटकने वाले भारत पर भी दस तरह की धौंस बनाई।

क्या इस तरह कभी आपने विचार किया है कि माओ-देंग-शी जिनफिंग तीनों भारत को आंखें दिखाते रहे और नेहरू-नरसिंह राव-मोदी याकि भारतीय लीडरशीप जैसे को तैसे के बजाय लगातार कैसे चीनियों को झूला झुलाते रहे। तभी सत्तर साला सफर में चीन खरगोश है तो भारत कछुआ! चीन बाधक है और भारत याचक! चीन विश्व की धुरी बना तो हम कभी सोवियत संघ की धुरी पर लटके तो कभी अमेरिका की धुरी में चक्कर लगाते हुए। चीन ईस्ट इंडिया कंपनी बना और भारत उसका बाजार!

सत्य बहुत निर्मम है। पर हम हिंदुओं की बुद्धि पर ताला ही कुछ ऐसा लगा है जो यह बेसिक बात भी समझ नहीं पा रहे हैं कि चीन के हाथों ही पिछले 70 सालों में हमारी सर्वाधिक लुटाई-पिटाई हुई है। अपनी थीसिस है कि 1947 से लेकर अब तक भारत के संगठित-असंगठित क्षेत्र के औद्योगिक विकास का 70-75 प्रतिशत हिस्सा चीन ने खत्म किया है। एक तरह से 21वीं सदी में ईस्ट इंडिया कंपनी का अनुभव भारत को वापिस आज चीन से है। जैसे अंग्रेजों ने, ईस्ट इंडिया कंपनी ने ढाका की मलमल जैसे भारत के छोटे-बड़े हुनर, भारत के उत्पादों को खत्म किया और इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के लिए भारत का बाजार बनवाया वहीं अनुभव पिछले 30 सालों में क्रमशः चीन की ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत को प्राप्त है। फिरोजबाद की चूड़ियां हों या हाथ में बांधने का लाल डोरा, राखी हो या बिजली उत्पादन के टरबाइन, फोन आदि सभी में मेड इन इंडिया को चीन के ड्रैगन ने निगला है और सवा सौ करोड़ लोगों के विशाल देश को सिर्फ रिपैकेजिंग का देश बना डाला है।

किसी ने हिसाब नहीं लगाया लेकिन जनता पार्टी के राज में अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त की पहल, राजनयिक रिश्तों की बहाली के बाद से धीरे-धीरे और फिर 2001 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधि के सदस्य बनने के बाद चीन ने भारत में सस्ता-कचरा सामान फेंक कर भारत के उद्योगों को जैसे बरबाद किया उसके बीस साल का भी यदि हिसाब लगाएं तो ईस्ट इंडिया कंपनी से कई गुना अधिक भारत की लुटाई चीन के हाथों हो चुकी है। पिछले साल, उससे पहले के साल याकि साल-दर-साल चीन हमें साठ अरब डॉलर औसत का व्यापार घाटा देता है। मतलब हमसे वह जितना खरीदता है उससे साठ अरब डॉलर (भले एक डॉलर को सत्तर रुपए बराबर ही रखें) ज्यादा का सामान हर साल भारत को बेचता है। सोचें, प्रति वर्ष छह-सात लाख करोड़ रुपए के औसत में भी चीन अब तक हमें कितना चूना लगा चुका होगा? हमारे काम-धंधों को कितना बरबाद कर चुका है? उससे कितने करोड़ भारतीय बेरोजगार हुए होंगे?

और हमारी क्या नीति है? चीन के दुश्मन के साथ खड़े होने और बात-बेबात आंखें दिखाने के बावजूद कहेंगे कि मतभेद को विवाद नहीं बनने देंगे! भारत का प्रधानमंत्री चीन के प्रधानमंत्री को झुला झुलाएगा! मगर प्रधानमंत्री ही क्यों दोषी हम सब दोषी! यह हमारा सभ्यतागत संकट है, हमारी वैसी बुनावट है जो हमें ईस्ट इंडिया कंपनी की लूट, बरबादी और गुलाम बनाने का मिशन समझ नहीं आया था तो आधुनिक चीन का वह मिशन भी समझ नहीं आया, जिसका जिक्र करते हुए ट्रंप प्रशासन की पूर्व नीति-निर्माता स्कीनर ने कहा है कि- लड़ाई भिन्न सभ्यता और भिन्न विचारधारा से है।… चीन हमारा आर्थिक प्रतिस्पर्धी है, वैचारिक प्रतिस्पर्धी है।

उफ! ‘प्रतिस्पर्धी’! इस शब्द को सुनते ही हमें ओलंपिक स्टेडियम में फुरफुरी छूट जाती है तो उद्योग, व्यापार की प्रतिस्पर्धा में तो कछुआ गर्दन भी बाहर नहीं निकालती। जान लिया जाए तथ्य कि भारत के ऩंबर एक खरबपति अंबानी में कभी हिम्मत नहीं हुई जो वह अमेरिकी शेयर बाजार में अपनी कंपनी को लिस्ट कराएं या दुनिया के किसी भी कोने में जा कर अपने धंधे का सामान बेचें।

तो पूरा मामला हुआ सभ्यतागत संस्कार, व्यवहार में लोगों की सामूहिक चेतना, उसकी ऊर्जा के मानवशास्त्रीय फर्क से! मैं नस्ल शब्द का नहीं, बल्कि मानव, कौम, मानव शास्त्र में अलग-अलग मानव समूह और सभ्यता शब्द को उपयोग में रहा हूं तो यह धर्म के परिप्रेक्ष्य में कुछ अधिक सटीक है। इस पर कल।

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