भारत में हिन्दू—मुसलमानों के साथ आए बिना अच्छा या बुरा कोई काम नहीं हो सकता
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लड़ते हैं बाहर जाके ये शेख ओ बिरहमन . . .

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ऐसे उदाहरणों की भरमार है जहां कृत्रिम बनाया हुआ हिंदूमुसलमान का विभाजन जरा भी नहीं चला। हिंदू मृतक को श्मशान ले जाने के लिए परिवार वाले नहीं आए तो पड़ोसी मुसलमानों ने अपना कंधा दिया। हिंदू संस्कारों के हिसाब से मृतक का अंतिम संस्कार किया। उधर मुसलमान का अस्पताल में दम अटका था कि कोई उसके कान में कलमा सुना दे तो वह इत्मीनान से आंखें मूंद ले तो हिंदू डाक्टर ने उसके कान में कलमा पढ़ दिया।

संघ भी काम संघ मुसलमानों के साथ मिलकर करता है, बस हिंदूओं को बेवकूफ बनाता है कि मुसलमानों ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं! यह ज्ञान अयोध्या और फैजाबाद के हिंदू-मुसलमान दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने पर हुआ। राम मंदिर के जमीन खरीद घोटाले पर हुई बातों के दौरान एक दोस्त की टिप्पणी सबसे मजेदार थी की हिंदू मुसलमान के बिना मिले इस देश में कुछ नहीं हो सकता। न अच्छा काम न बुरा काम!

सही बात है। एक गलत काम के जरिए सही संदेश। घोटाला हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। मगर इसमें दो बातें खास हैं। एक राम मंदिर में भी घोटाला दूसरे मुसलमान के साथ मिलकर। मुसलमान के साथ मिलकर देश निर्माण का जो अच्छा काम चल रहा था उसे तो घर वापसी, लव जेहाद, गाय, लिंचिंग, तीन तलाक, नागरिकता कानून, कश्मीर का विभाजन और श्मशान, कब्रिस्तान जैसे बवाल फैलाकर रोक दिया और जब माल कमाने का मामला आया तो एक हो गए।

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बहुत पुराना शेर है-

लड़ते हैं बाहर जाके ये शेख ओ बिरहमन

पीते हैं मयकदे में प्याले बदल बदल कर!

हिंदू-मुसलमान इस देश की समस्या कभी नहीं रही। दोनों तरफ से अपने निहित स्वार्थों के लिए इसे बनाया जाता है। असली समस्या पहले भी अमीरी, गरीबीऔर खासतौर पर हिन्दी बेल्ट के लिए बड़ी जात, छोटी जात ही थी। और अब भी है। इन दोनों वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए हिंदू मुसलमान किया जाता है।

अभी कोरोना के समय फिर साबित हो गया कि महामारी ने हिंदू मुसलमान में कोई भेद नहीं किया। मगर अमीर और गरीब में किया। देश के सबसे बड़े अमीर अंबानी बीमारी से बचने के लिए अपने पूरे परिवार को लेकर विदेश चले गए। और भी पूंजीपति गए। लेकिन गरीब घीसू, माधो गांव में ही मौसमी बुखार समझ कर पड़े रहे और दलित होने के कारण गंगा में भी नहीं बहाए गए। गांव के बाहर का गड्डा ही उनकी अंतिम शरणस्थली बना जहां चील कौवे पहले से मंडरा रहे थे।

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ऐसे जाने कितने उदाहरण हैं जो बताते है कि महामारी के समय प्राइवेट अस्पतालों ने तो किया ही सरकारी अस्पतालों ने भी अमीर गरीब, सामाजिक समर्थ और सामाजिक असमर्थ में खूब भेदभाव किया। और भर्ती करने में ही नहीं, मरने के बाद भी। जैसे दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने घोषणा की थी कि कोरोना से मरने वाले फ्रंट लाइन वर्करों डाक्टरों और सफाई कर्मियों को एक – एक करोड़ रु. का मुआवजा दिया जाएगा। इसमें डाक्टरों के परिवारों को तो कोई समस्या नहीं आई, मगर सफाई कर्मियों को कोई मानने को तैयार नहीं है कि वे कोरोना से मरे। सफाईकर्मियों के परिवारों को जिन्हें सबसे आसानी से मुआवजा मिल जाना चाहिए था उन्हें सबसे ज्यादा जटिलताओं में फंसाया गया।

दूसरी तरफ ऐसे उदाहरणों की भरमार है जहां कृत्रिम बनाया हुआ हिंदू-मुसलमान का विभाजन जरा भी नहीं चला। हिंदू मृतक को श्मशान ले जाने के लिए परिवार वाले नहीं आए तो पड़ोसी मुसलमानों ने अपना कंधा दिया। हिंदू संस्कारों के हिसाब से मृतक का अंतिम संस्कार किया। उधर मुसलमान का अस्पताल में दम अटका था कि कोई उसके कान में कलमा सुना दे तो वह इत्मीनान से आंखें मूंद ले तो हिंदू डाक्टर ने उसके कान में कलमा पढ़ दिया।

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कोरोना के कठिन समय में भी हिंदू-मुसलमान नरेटिव (छद्म धारणाएं) बनाने की बहुत कोशिश की गईं, मगर इस काल की अगर सबसे अच्छी कोई बात रही तो वह यही कि नफरत और विभाजन की इस धारणा में कई दरारें आईं। पिछले साल कोरोना शुरू होते ही सारा दोष तबलीगी जमात पर रखने की साजिश की गई। मीडिया बेशरमी के साथ इस काम में लग गया। केजरीवाल ने भी इसे हवा देने में कोई कसर नहीं रखी। मगर अदालतों ने सारे मामलों में जमात को बेकसुर पाया। सारे मुकदमे खारिज हो गए।

संयम हिंदू-मुसलमान दोनों ने खूब दिखाया। पूरे कोरोना काल में एक दूसरे की मदद की। मीडिया कोशिशें करके हार गया कि उसे दोनों के द्वारा एक दूसरे की मदद न करने की खबरें मिलें। उसे डांट भी पड़ी कि तुम नायालक हो, गोदी में चढ़े चढ़े एकदम निकम्मे हो गए हो। एक आक्सीजन सिलेंडर के लिए दोनों लड़े जैसी कोई स्टोरी भी प्लांट नहीं कर पा रहे हों। मगर गोदी मीडिया बस यही सफाई देता रह गया कि हमने हिंदू को जरूरत थी तो मुसलमान द्वारा उसे सिलेंडर देने की खबर रोक दी। और मुसलमान को जरूरत थी तो हमने हिंदू द्वारा मंगा कर रखे रेमडेसिवियर के इंजेक्शन उसे देने की खबर नहीं दिखाई।

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पिछले साल से लेकर अब तक का कोरोना काल का यह पूरा दौर एक युग के बराबर के अनुभव वाला रहा। जहां सरकार की ऐसी अक्षमता और गैर-जिम्मेदाराना रवैया पहली बार देखा वहीं इंसानियत को कोई नहीं मार सकता का विश्वास और प्रबल हुआ। पता नहीं राजनीति और ये सरकार चलाने वाले इसे समझेंगे कि नहीं लेकिन अगर जनता समझ जाए कि असली झगड़ा हिंदू मुसलमान नहीं तो इस आपदा से हम कुछ सकारात्मक सीख सकते हैं। आपदा को अवसर बनाने वालों ने तो इसमें विभाजन और नफरत के कई अवसर बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसा कि इकबाल ने कहा कि – “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी”, वह बात सिद्ध हो गई।

देश में भाईचारे की जड़ें इतनी गहरी है कि उन्हें खोदना किसी के बस की बात नहीं है। पिछले सात सालों से बहुत प्रयास किए गए। इस कोरोना महामारी के समय तो जब सबको मदद की जरूरत थी किसी विवाद की नहीं उस समय भी हिंदू मुसलमान मुद्दे लाने के बहुत कोशिश की गई। मगर जनता के आपसी प्रेम भाव, अमन- चैन से रहने की कामना के सामने सब नाकामयाब हुए। कहते है कि इंसान की परीक्षा आपतकाल में ही होती है। आपतकाल परखिए . . .! तो इससे बड़ा आपतकाल और कौन सा होगा?  लोग कीड़े मकौड़ों की तरह मरे। चिता भी नसीब नहीं हुई। और ऐसे में राम मंदिर की जमीन खरीदने में पैसे बनाना! करोड़ों का घोटाला! वह पैसा जो देश भर से आस्थावान लोगों ने दिया है। इसमें हिंदूओं का योगदान तो बहुताय से था ही, मुसलमानों ने भी इकबाल के इन शब्दों के साथ खुद को जोड़ते हुए –

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“ है राम के वजूद पे हिंदूस्तां को नाज

अहले नजर समझते हैं उसको इमामे हिन्द!”

 

अपना सहयोग दिया। भाईचारा बना रहे, विवाद खत्म हो की उसी भावना के साथ जिसके तहत उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का फैसला माना। तो बात इस उम्मीद के साथ खत्म करते हुए कि जब घोटाले में साथ हो सकते हैं

तो देश को जोड़ने, मजबूत बनाने और भेदभाव मिटाने में एक क्यों नहीं हो सकते!

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