लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन! - Naya India
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लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

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तभी सदियों से चेतना का अपना ज्वालामुखी सोया हुआ, सुषुप्त है। असंख्य हमलावरों, तरह-तरह के अत्याचारों-गुलामी और सत्ता-हाकिमों की ज्यादतियों के बावजूद हिंदू चेतना का लावा कभी फटता नहीं। न बगावत, न कोई विद्रोह, न क्रांति-प्रतिक्रांति मतलब पूरी तरह अपना मृत्युलोक वह पाताल बनाए हुए है, जो हिमखंड में रचा-पका है। ऐसा बर्फीला, बेहोश दिमाग क्या तो रियलिटी बूझेगा, क्या सत्य स्वीकारेगा और क्या अपने और अपने देश को सुधारेगा। न व्यक्ति सुधर सकता है और न बाड़ा।

भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

भारत कलियुगी-15:  जैसे गुजरी सदियों में समझ नहीं थी वैसे इक्कीसवीं सदी में भी कलियुगी हिंदुओं को बोध नहीं है कि हमारा जो जीना है वह मर-मर कर जीना है। वह अपने ही बनाए मृत्युलोक का नारकीय जीवन है! कुछ लाख एलिट-शासक-हाकिम भले अलग जिंदगी जीते हों अन्यथा बतौर मनुष्य 140 करोड़ भारतीय बिना मानवीय गरिमा से जीते हुए हैं। भारत का वर्तमान, खासकर महामारी काल वह वक्त लिए हुए है, जो मानव सभ्यता के आधुनिक इतिहास में बतौर कलंक दर्ज रहेगा। एक ओर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी का इंसान अंतरिक्ष यात्रा करता हुआ तो दूसरी तरफ भारत के अमिट फोटो….शववाहिनी गंगा..गर्मी में लाखों-करोड़ों लोगों का तपती सड़कों पर पैदल घर जाना….कंक्रीट के ट्रक, रेल डिब्बों में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे हुए लोग…ऑक्सीजन की पल-पल धड़क को छटपटाते व मरते हुए लोग… इलाज-दवा-इंजेक्शन के लिए घर बेचते हुए लोग….श्मशान-कब्रिस्तान में लावारिस लाशों का अंबार….और गंगा किनारे दफनाई लावारिस लाशें…और लाशों की संख्या पर सफेद-काले झूठ…पांच किलो अनाज-एक किलो दाल के बांटे से पेट भरते अस्सी करोड़ लोग….क्या पृथ्वी पर ऐसा मृत्युलोक कहीं और, ऐसे फोटो, ऐसी अकल्पनीय बातें इक्कीसवीं सदी में कहीं और सुनी गईं?

कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर!

और इस सबके बावजूद भारत के 140 करोड़ लोग बेचैन याकि मनुष्य वृत्ति में त्रासद व्यथा को फील करते हुए नहीं हैं। ऐसी कोई सामूहिक पीड़ा नहीं कि ऐसे लावारिस मरना-जीना मनुष्य जीवन तो नहीं!

नहीं। न विचार, न भाव और न भंगिमा। मानो कलियुगी हिंदू उस मानसिक विकलांगता में जीते हुए है, जिसके शरीर में अनुभव, फील करने की इंद्रियां नहीं हैं। शरीर में भावना, संवेदना और विचारने का कोई सिस्टम नहीं! क्षण मात्र करंट लगता है और तुरंत खत्म।.. जिन लोगों, जिन परिवारों, जिन समूहों ने बीमारी, मौत के लावारिस-नारकीय अनुभव को झेला है शायद उनके भी यह करंट नहीं बना रहता है कि हमारे साथ इतना बुरा कैसे गुजरा! हर हिंदू बताता मिलता है कि अपने लोग सब भूल जाते हैं! मानो हिंदू शरीर में वह दिमाग है ही नहीं जो मेमोरी लिए होता है जो अनुभव के फ्लैशबैक से धड़कता है और सोचता है।

कलियुगी भारत-12: ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

उस नाते भारत दशा पर अंग्रेजीदां नीरद चौधरी का साठ के दशक में सोचा गया यह निष्कर्ष गलत नहीं है कि लगता है यह महाद्वीप सरसी नाम की डायन का अभिशप्त है! कोई ऐसा शाप है, जिससे हम पत्थर के बने हुए हैं और दिल-दिमाग दोनों से बेसुध! एक ही सत्य, एक ही चक्र लगातार है मरना..जीना… मरना और मृत्युलोक के अपने सत्य में जीवन को एनिमल फार्म में जीना!

यह हकीकत 21वीं सदी, 20वीं, 19वीं, 18वीं याकि सदियों से चले आ रहे हिंदू जीवन का सार है। तभी हम अभ्यस्त व आदी हैं उस जीवन के जिसे देख सन् 2020-21 में दुनिया भौंचक!

कलियुगी भारत-11: बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

सोचें, आधुनिकता, आधुनिक चिकित्सा, विज्ञान, वैश्विक गांव के परिवेश की हकीकत बावजूद इसके जीवन वैसा ही जैसे पहले। सब रामभरोसे और मृत्यु पर विचार प्रभु इच्छा का! न सड़क, न अस्पताल, न दफ्तर, न हवा, न पानी मतलब कहीं भी किसी भी के उपयोग व अनुभव में बूझना यह बेचैनी बनाने वाला होता ही नहीं है कि हम कितनी तरह के प्रदूषण-जहर-बाधाओं में घुटते, रेंगते, सरकते-घसीटते हुए हैं। कैसे हवाई जहाज का अपना सफर भी कैटल क्लास वाला है। कितनी तरह के पिंजरों-पाबंदियों-मूर्खताओं में अपना जीवन बंधा हुआ है। और जीवन जीना?… अस्सी करोड़-सवा सौ करोड़ लोग राशन और मनरेगा का चारा-बांटा, बेगारी, बेरोजगारी और बेसिक भौतिक जरूरतों की भूख में घुटते-सिसकते हुए!…जाहिर है एनिमल फार्म में जीव-जंतुओं वाला जीना और इंसान का कैटल क्लास के रूप में जीना निश्चित ही हमारे लिए सामान्य, सहज, रघुकुल रीत सदा चली आई वाली वह नियति है जो 21 वीं सदी में मानवता के लिए लज्जाजनक!

कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

पुरानी सभ्यता का मौजूदा अनुभव और घमंड चकरा देने वाला है। कैसे ऐसा कि वायरस-महामारी की चुनौती के आगे कलियुगी हिंदू अपने अंधविश्वास, गोमूत्र और गोबर लेपन का अनुभव दुनिया से शेयर करता हुआ है। ऊपर से यह अहंकार अलग कि हम अधिक समर्थ और हम विश्व गुरू!

भोली-नादान सभ्यता… ध्यान रहे न ब्रेन वाश है और न माइंड वाश। न आंखों पर पट्टी बंधी है और न कान-नाक में रूई ठूंसी हुई! शरीर मनुष्य वाला ही है। मगर दोष मष्तिष्क का है। मानसिक विकलांगता ने शरीर को कैटल क्लास, भोली-नादान भेड़ें बना डाला है। जैविक सत्य है कि दिमाग यदि विकलांग हुआ तो जीवन बेहोश, बेसुध रहेगा। देखते हैं लेकिन पहचानते नहीं। सुनते हैं लेकिन समझते नहीं। बस, सोना है और खाने-पीने जैसी जरूरी शारीरिक भूख की फिक्र का जुगाड़ करते हुए सपनों में खोए रहना है।

तो नंबर एक खूबी बेसुधी। तभी सदियों से चेतना का अपना ज्वालामुखी सोया हुआ, सुषुप्त है। असंख्य हमलावरों, तरह-तरह के अत्याचारों-गुलामी और सत्ता-हाकिमों की ज्यादतियों के बावजूद हिंदू चेतना का लावा कभी फटता नहीं। न बगावत, न कोई विद्रोह, न क्रांति-प्रतिक्रांति मतलब पूरी तरह अपना मृत्युलोक वह पाताल बनाए हुए है, जो हिमखंड में रचा-पका है। ऐसा बर्फीला, बेहोश दिमाग क्या तो रियलिटी बूझेगा, क्या सत्य स्वीकारेगा और क्या अपने और अपने देश को सुधारेगा। न व्यक्ति सुधर सकता है और न बाड़ा।

कलियुगी हिंदू की बेहोशी पर जितना सोचें कम होगा! यह बेहोशी कैसे बनी, कैसे घर-घर, व्यक्ति-व्यक्ति, जन्म-जन्मांतर से पैठी है इसकी थाह बूझना असंभव है।

कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त!

ऐसा तब है जब अपना कलियुगी कुआं वैश्विक गांव का हिस्सा हो चुका है। दुनिया गांव में बदली है। वैश्विक गांव, उसके भौतिक विकास की नई शराब अपने कुएं में है। उसके नशे-विकास से जहां अंधकार में जीते आए कबिलाई देशों में जोश, जीवतंता, सत्य-ज्ञान-विज्ञान का संस्कार बन गया है वहीं हम जैसे जीते हुए थे वैसा ही जीवन जी रहे हैं। चंद्रयान भले बना लिया हो लेकिन महामारी में मुकाबला जुगाड़-अंधविश्वासों से ही है।

भारत कलियुगी-8: समाज का पोस्टमार्टम जरूरी या व्यक्ति का?

कई बार सवाल उठता है कि आधुनिक विकास के छप्पन भोग वाली सभ्यताओं में घूमने वाले भारत के शासक-एलिट वर्ग के अफसर, नेता, मंत्री आदि क्यों नहीं भारत लौट कर 140 करोड़ लोगों की मुर्दनगी को खत्म करने का संकल्प बनाते हैं?..क्या जवाब सोचें?…लौट कर फिर वापिस कलियुगी मानिसकता में भटकना होगा? कलियुग के छद्म अध्यात्म ने हम सबको स्वकेंद्रित बनाया है। तभी 140 करोड़ लोग या तो अपने जीवन, निज स्वार्थ की चिंता करते हैं या कुनबे, जात-पांत के उस खांचे में जीते हैं, जिसमें मेमोरी, याददाश्त, सरोकार सिमटे हुए हैं। मतलब नहीं कि हम जानवर वाली कैटल क्लास हैं या मौत में भी हैं।… फिर जिन शासकों या गड़ेरियों पर कैटल क्लास का दायित्व है उस शासक-पुरोहित वर्ग को गुलामी के इतिहास से मालूम है कि लोगों की बेहोशी उनका भाग्य है, उनका कर्म फल है!।

सो, जो बेहोशी है वह कलियुगी धर्म-अध्यात्म से ले कर कर्म फल की कई जड़ें लिए हुए है। (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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