हिंदुत्व का सकारात्मक एजेंडा

हिंदुत्व का जो एजेंडा अब तक सिर के बल खड़ा था उसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने सीधा करके अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है। इन दोनों नेताओं के राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर उभरने से पहले यह कहा जाता था कि भाजपा दंगों की पार्टी है और दंगों से उसे लाभ मिलता है। यह माना जाता रहा है कि गुजरात के 2002 के दंगों से नरेंद्र मोदी की राजनीति फली फूली और उनके दिल्ली कूच करने से ठीक पहले 2012 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों से उनके लिए देश खास कर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक मुफीद बनी। पर मोदी और शाह के देश और पार्टी की कमान संभालने के बाद छिटपुट सांप्रदायिक तनाव को छोड़ दें तो कहीं भी दंगा नहीं हुआ। किसी किस्म का विध्वंस नहीं हुआ। एकाध अपवादों के अलावा किसी नकारात्मत एजेंडे पर प्रचार नहीं किया गया। गौरक्षा के नाम पर लिंचिंग शुरू हुई तो खुद मोदी ने ऐसे लोगों को आपराधिक तत्व बताया।

इस तरह मोदी और शाह ने हिंदुत्व के सकारात्मक एजेंडे के जरिए हिंदुओं को संगठित करना शुरू किया। उनको यह पता था कि गुजरात अपवाद है। वहां हिंदू-मुस्लिम की जैसी ऐतिहासिक ग्रंथि थी, उसमें दंगों से हिंदू ध्रुवीकरण हुआ। परंतु यह अपवाद था। आम हिंदू दंगों से घबराता है। उसे हिंसा पसंद नहीं है। वे अमन चाहता है। अपना कारोबार या नौकरी करते हुए परिवार के साथ शांति से जीवन बिताना उसे पसंद है। वह किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहता है। तभी विपक्ष चाहे कुछ भी कहे पर दंगे कभी भी भाजपा की जीत की गारंटी नहीं बने।

याद करें बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद के दंगों को। क्या उसके बाद भाजपा बहुमत हासिल कर सकी? उलटे उसकी सीटें कम हो गईं। विवादित ढांचा ढहाए जाने के बाद चार राज्यों में भाजपा की सरकारें बरखास्त की गई थीं। बाद में जब चुनाव हुए तो मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में भाजपा हार गई और कांग्रेस की सरकार बन गई। उत्तर प्रदेश में उसके बाद के हार चुनाव में भाजपा की सीटें घटती गईं, तब तक जब तक मोदी और शाह का राष्ट्रीय राजनीति में प्रादुर्भाव नहीं हुआ। कायदे से तो विवादित ढांचा टूटने के बाद हिंदुओं को उमड़ कर भाजपा के पक्ष में वोट करना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ था।

मोदी और शाह इस समकालीन राजनीतिक इतिहास से परिचित हैं। तभी इन्होंने हिंदुत्व का सकारात्मक एजेंडा बनाया। छोटी छोटी बातों से यह धारणा बनवाई कि अब हिंदुओं की बात सुनी जा रही है। अयोध्या में दीपावली मनाने और लाखों दीपों से उसे सजाने या राम के अयोध्या आगमन को बडा इवेंट बनाने का काम कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं था। विपक्ष ने इसे नौटंकी बताया पर यह हिंदुओं को पसंद आया। बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में अपने हिसाब से दुर्गापूजा करने और मूर्तियों के विसर्जन को भाजपा ने मुद्दा बनाया। गौरक्षा करने और गौशाला बनाने के एजेंडे को कई राज्यों में राजनीति का केंद्र बिंदु बनाया।

अपने इसी सकारात्मक एजेंडे के तहत भाजपा ने इतिहास से ऐसे महापुरुषों को खोज निकाला, जो हिंदुत्व के प्रति नरम रुख रखते थे। हिंदू महासभा के नेता मदन मोहन मालवीय का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में इतनी बार जिक्र किया, जितना पहले कभी नहीं हुआ होगा। मोदी ने उनके पोते को अपने नामांकन का प्रस्तावक बनाया। मोदी की सरकार ने देसी रियासतों को विलय कराने और सोमनाथ मंदिर का पुनरूद्धार करने वाले सरदार पटेल की दुनिया में सबसे ऊंची मूर्ति बनाई। छत्रपति शिवाजी को रोजमर्रा के राजनीतिक विमर्श में शामिल किया। विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की।

मुसलमानों से लड़ कर उनको सबक सिखाने की बजाय उनके समाज में सुधार का एजेंडा बनाया। एक साथ तीन तलाक बोले जाने पर अदालत ने रोक लगाई तो सरकार ने आगे बढ़ कर उसे अपराध बनाने का कानून पास किया। अब मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुविवाह और निकाह हलाला को खत्म करने की तैयारी है। इस तरह मुस्लिम महिलाओं के हितों के लिए लड़ते हुए यह मैसेज दिया गया कि मुसलमानों को ठीक किया जा रहा है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म करना भी इसी सकारात्मक एजेंडे का विस्तार है।

इस एजेंडे के तहत जब जरूरत पड़ी तब मोदी और शाह दोनों संवैधानिक संस्थाओं की अनदेखी करने से भी नहीं हिचके। सुप्रीम कोर्ट ने भगवान अयप्पा के मंदिर महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दी तो सत्तारूढ़ दल ने इसके खिलाफ स्टैंड लिया और नीचे उसके समर्थकों ने महिलाओं के मंदिर प्रवेश को रोकने का काम किया। इन सारे कामों में हिंसा कही भी शामिल नहीं है पर हिंदुओं के बीच मैसेज पहुंच गया है। बहुत बारीकी से इस मैसेजिंग का तानाबाना बुना गया और हिंदुओं को समझाया गया कि सरकार उनके हितों की रक्षा भी कर रही है और मुसलमानों को सबक भी सिखाया जा रहा है।

मोदी और शाह की कमान में भाजपा ने हिंदू पोलराइजेशन की बजाय हिंदू कंसोलिडेशन पर ध्यान दिया। यह कहा गया कि अगर सरकार कब्रिस्तान बना रहा है तो श्मशान भी बनाए या वे अली वाले हैं और हम बजरंग बली वाले हैं तो इससे कोई दंगा नहीं भड़काया गया पर हिंदुओं में यह मैसेज गया कि हमारी रक्षा करने वाली सरकार आ गई है। हमारा मसीहा आ गया है। पाकिस्तान पर दो बार सर्जिकल स्ट्राइक भी सकारात्मक एजेंडे का ही हिस्सा है। मोदी और अमित शाह ने राष्ट्रवाद और हिंदुवाद को मिलाने का काम किया है। तभी आज कांवड़ लेकर चल रहे नौजवान भगवान शंकर की फोटो के साथ साथ तिरंगा भी हाथ में लिए होते हैं।

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